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समझिएकृषि

फार्मर आईडी क्या है: 11 करोड़ किसानों की डिजिटल पहचान किस काम आएगी, और कौन छूट सकता है

केंद्र का कहना है कि उसने 11 करोड़ फार्मर आईडी बना ली हैं, मार्च 2027 की समय सीमा से पांच महीने पहले। यह आईडी क्या है, किसान इसे कैसे बनवाएं, किन कामों के लिए यह ज़रूरी होगी, और बटाईदार व वनवासी किसान क्यों चिंतित हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

फार्मर आईडी आधार पर आधारित एक डिजिटल पहचान है, जो किसान को राज्य के सत्यापित भू-अभिलेखों, उसकी बोई गई फसलों और उसके लाभ वाली योजनाओं से जोड़ती है। यह एग्रीस्टैक का मुख्य हिस्सा है, जो सितंबर 2024 में मंज़ूर ₹2,817 करोड़ के डिजिटल कृषि मिशन का अंग है, और केंद्र ने 24 अक्टूबर 2026 को बताया कि 11 करोड़ आईडी बन चुकी हैं। पीएम-किसान और दूसरी योजनाओं के लिए यह आईडी तेज़ी से ज़रूरी होती जा रही है, इसलिए बटाईदार और आदिवासी किसानों के बीच काम करने वाले संगठन चेताते हैं कि जिनके नाम पर ज़मीन दर्ज नहीं है, वे बाहर रह सकते हैं।

फार्मर आईडी क्या है?

यह किसान की एक विशिष्ट डिजिटल पहचान है, जिसे सरकार खेती के लिए आधार कार्ड जैसी पहचान बताती है।

हर आईडी किसान के आधार नंबर से जुड़ी होती है और राज्य के पास मौजूद सत्यापित रिकॉर्ड से जोड़ी जाती है: किसान के नाम की ज़मीन, हर मौसम में उस पर बोई गई फसल, पशुधन, परिवार का ब्योरा और वे सरकारी योजनाएं जिनका उसने लाभ लिया है। आईडी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बनाते और संभालते हैं। सोच यह है कि किसान एक बार साबित कर दे कि वह कौन है और क्या उगाता है, फिर उससे जुड़ा हर दफ्तर उसी रिकॉर्ड पर भरोसा कर सके।

यह आई कहां से?

यह एग्रीस्टैक का केंद्र है, जो 2 सितंबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंज़ूर डिजिटल कृषि मिशन का हिस्सा है।

मिशन का कुल परिव्यय ₹2,817 करोड़ है, जिसमें केंद्र का हिस्सा ₹1,940 करोड़ है। सरकार एग्रीस्टैक को “किसान की पहचान” नाम देती है। यह राज्यों की तीन रजिस्ट्रियों से बना है: किसान रजिस्ट्री, जो आईडी जारी करती है; हर गांव के भू-संदर्भित नक्शे; और फसल बुवाई रजिस्ट्री, जो मोबाइल फोन पर खेत-दर-खेत होने वाले मौसमी डिजिटल फसल सर्वे से भरी जाती है। दूसरा स्तंभ, कृषि निर्णय सहायता प्रणाली, इसके ऊपर फसल, मिट्टी, मौसम और पानी का उपग्रह डेटा जोड़ता है।

इस व्यवस्था को छह पायलट ज़िलों में परखा गया: उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद, गुजरात का गांधीनगर, महाराष्ट्र का बीड, हरियाणा का यमुनानगर, पंजाब का फतेहगढ़ साहिब और तमिलनाडु का विरुधुनगर।

11 करोड़ का आंकड़ा अहम क्यों है?

क्योंकि पूरे कार्यक्रम के लिए केंद्र ने यही लक्ष्य रखा था, और वह समय से पहले पूरा हो गया है।

मूल योजना थी 2024-25 में 6 करोड़, 2025-26 में 3 करोड़ और 2026-27 में 2 करोड़ आईडी। शुरुआत धीमी रही। 2025 की शुरुआत में लोकसभा में दिए गए जवाबों के मुताबिक लगभग 2.06 करोड़ आईडी बनी थीं। फरवरी 2026 में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा को बताया कि 8.47 करोड़ से कुछ ज़्यादा आईडी जारी हो चुकी हैं। 24 अक्टूबर को उन्होंने कहा कि पिछली रात 11 करोड़ का आंकड़ा पार हो गया, 31 मार्च 2027 की समय सीमा से पांच महीने पहले। मंत्रालय का कहना है कि 6 करोड़ से ज़्यादा किसान आईडी-आधारित व्यवस्था से लाभ पा चुके हैं।

मंज़ूरी से 11 करोड़ आईडी तक

  1. 2 सितंबर 2024मंत्रिमंडल ने ₹2,817 करोड़ के डिजिटल कृषि मिशन को मंज़ूरी दी
  2. 2025 की शुरुआतलगभग 2.06 करोड़ फार्मर आईडी बनीं, लोकसभा को बताया गया
  3. फरवरी 2026संख्या 8.47 करोड़ के पार, चौहान ने राज्यसभा को बताया
  4. 23 अक्टूबर 2026मंत्री के मुताबिक 11 करोड़ का आंकड़ा पार
  5. 31 मार्च 202711 करोड़ के लक्ष्य की मूल समय सीमा

किसान को इसकी ज़रूरत किसलिए होगी?

सरकार किसानों को जो कुछ देती है, उसके बढ़ते हिस्से के लिए।

सरकार की सूची लंबी है: कम कागज़ी काम के साथ फसल ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दावों का दर्ज फसल डेटा से आकलन और सीधे बैंक खाते में भुगतान, आपदा राहत में तेज़ी, और बिचौलियों के बिना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बिक्री। फसल सर्वे का डेटा खरीद की योजना और खाद वितरण में भी काम आना है।

व्यवहार में यह आईडी विकल्प से दरवाज़ा बनती जा रही है। केंद्र ने 2025 की शुरुआत में किसानों की आय सहायता योजना पीएम-किसान के नए आवेदकों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया। खबरों के मुताबिक अगस्त 2026 तक 14 राज्यों में पीएम-किसान के लिए यह ज़रूरी थी, छत्तीसगढ़ में धान बेचने के लिए इसकी मांग थी और मध्य प्रदेश की खाद वितरण व्यवस्था में भी यह चाहिए थी।

किसान इसे कैसे बनवाए?

आमतौर पर गांव के शिविर या कॉमन सर्विस सेंटर पर, आधार और ज़मीन के कागज़ों के साथ।

तरीका राज्य के हिसाब से अलग है। मिसाल के तौर पर असम में किसान को आधार कार्ड, ज़मीन के मालिकाना हक या पट्टे का सबूत, बैंक पासबुक का पहला पन्ना और आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर चाहिए। पहचान आधार ई-केवाईसी से जांची जाती है, ज़मीन राज्य के रिकॉर्ड से, और कुछ मामलों में फसल के साथ किसान की तस्वीर से। पंजीकरण शिविरों में कृषि विभाग के कर्मचारी मदद करते हैं, और सत्यापन पूरा होने पर आईडी जारी होती है।

कौन छूट सकता है?

हर वह व्यक्ति जो ऐसी ज़मीन पर खेती करता है जो उसके नाम दर्ज नहीं है।

रजिस्ट्री भू-अभिलेखों पर बनी है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसमें ज़मीन मालिक आते हैं। बटाईदार, साझे में खेती करने वाले और वन अधिकार पट्टे वाले कई आदिवासी किसान इसमें आसानी से नहीं आते। असम की वही सूचना साफ कहती है: “भूमिहीन किसान पात्र नहीं।” मंत्रालय इस कमी को मानता है और कहता है कि राज्य अपने नियमों के तहत बटाईदारों और असल काश्तकारों को प्लेटफॉर्म पर लाने के कदम उठा रहे हैं।

ज़मीन पर काम करने वाले संगठन इतने धैर्यवान नहीं हैं। अगस्त में विशाखापत्तनम में हुए एक परामर्श में हैंड्स ऑफ ट्रांज़िशन के रोहिन कुमार ने कहा: “एग्रीस्टैक की समस्या यह है कि यह केवल ज़मीन मालिकों को दिया जाता है।” शोध समूह लिब टेक के सह-संस्थापक चक्रधर बुद्धा ने दावा किया कि आंध्र प्रदेश में वन पट्टा धारकों में से लगभग 48% किसान के रूप में पंजीकृत नहीं हैं, और कहा: “यह एक बहुत बड़ी हाशिये की आबादी है।”

निजता का क्या?

सरकार का कहना है कि डेटा राज्यों के पास रहता है और व्यवस्था डेटा संरक्षण कानून का पालन करती है।

एग्रीस्टैक को संघीय ढांचे में बनाया गया है, इसलिए हर राज्य अपनी रजिस्ट्री का मालिक है। संसद में दिए जवाबों में मंत्रालय ने कहा है कि यह डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी), 2023 का पालन करता है। आलोचक कहते हैं कि यह आईडी फिर भी किसान की पहचान, ज़मीन, फसल और लाभ को एक जुड़े हुए रिकॉर्ड में ले आती है, ऐसे देश में जहां गांवों में इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता अब भी अधूरी है। जैसे-जैसे यह आईडी किसानों तक पहुंचने वाले पैसे की चाबी बनेगी, ये सवाल और अहम होंगे। अक्टूबर 2026 तक केंद्र ने यह राज्यवार ब्योरा जारी नहीं किया है कि 11 करोड़ आईडी किनके पास हैं।

मूल दस्तावेज़