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बिटचैट पर रोक क्यों? केरल हाईकोर्ट ने केंद्र, एपल और गूगल से जवाब मांगा

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन की अगुवाई वाली पीठ ने तीन केंद्रीय मंत्रालयों और दोनों ऐप स्टोर कंपनियों को चार हफ्ते में हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि बिना इंटरनेट चलने वाला यह ब्लूटूथ मैसेजिंग ऐप भारत में क्यों हटाया गया।

संपादकीय डेस्क से · कोच्चिप्रकाशित
कोच्चि में केरल हाईकोर्ट की इमारत (फ़ाइल फ़ोटो)
कोच्चि में केरल हाईकोर्ट की इमारत (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY 4.0

मुख्य बातें

  1. केरल हाईकोर्ट ने बिटचैट पर रोक को लेकर तीन केंद्रीय मंत्रालयों, एपल और गूगल से हलफनामा मांगा है।
  2. जवाब के लिए चार हफ्ते का समय दिया गया है, मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को होगी।
  3. बिटचैट बिना इंटरनेट, ब्लूटूथ से चलता है और दिल्ली में इंटरनेट बंदी के दौरान प्रदर्शनकारियों में लोकप्रिय हुआ।

केरल हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने केंद्र सरकार, एपल और गूगल से पूछा है कि बिना इंटरनेट, ब्लूटूथ के सहारे चलने वाले मैसेजिंग ऐप बिटचैट को भारत में क्यों ब्लॉक किया गया। डिजिटल अधिकार संगठनों का कहना है कि यह रोक प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाकर लगाई गई थी, और अब पहली बार इस पर अदालत में सवाल उठा है।

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी एम की खंडपीठ ने एर्णाकुलम की संस्था एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी प्रमोशन सोसाइटी की जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। पीठ ने गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ एपल इंडिया और गूगल इंडिया को चार हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने को कहा है। फिलहाल जवाब केवल बिटचैट को ब्लॉक करने के फैसले तक सीमित रहेंगे। याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, यह सवाल अदालत ने खुला रखा है। मामला 11 नवंबर को फिर सूचीबद्ध है।

याचिका में क्या कहा गया

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह रोक समानता और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकारों का उल्लंघन है, और प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष प्रक्रिया और आनुपातिकता के सिद्धांतों की अनदेखी करती है। उनका कहना है कि अधिकारियों ने आईटी अधिनियम के तहत ब्लॉकिंग आदेशों से जुड़े 2009 के नियमों का पालन नहीं किया। उन्होंने आदेश को सार्वजनिक करने और रद्द करने की मांग की है।

ब्लॉकिंग का कोई आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया है। एपल और गूगल ने अक्टूबर की शुरुआत में ऐप को अपने भारतीय स्टोर से हटा दिया और कहा कि वे आईटी अधिनियम के तहत सरकारी निर्देशों का पालन कर रहे हैं। इस ओपन-सोर्स ऐप के पीछे ट्विटर के सह-संस्थापक जैक डॉर्सी हैं। उन्होंने 3 अक्टूबर को पोस्ट किया था कि ऐप को आधिकारिक तौर पर ऐप स्टोर से हटा दिया गया है।

प्रदर्शनकारियों के लिए बिटचैट क्यों अहम

बिटचैट में फोन ब्लूटूथ के जरिए एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाते हैं, इसलिए मोबाइल डेटा बंद होने पर भी यह काम करता है। जुलाई में जंतर-मंतर पर नीट यूजी विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में इंटरनेट बंदी के समय यह खूब इस्तेमाल हुआ। 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान फिर इंटरनेट बंद हुआ, और उसके कुछ ही दिन बाद ताजा रोक लगी।

इससे पहले जुलाई में गृह मंत्रालय के साइबर अपराध समन्वय केंद्र ने गिटहब को तीन घंटे के भीतर बिटचैट का कोड हटाने का आदेश दिया था। उस आदेश में कहा गया था कि ऐप में बिना फोन सत्यापन और बिना केंद्रीय लॉग के गुमनाम संदेश भेजे जा सकते हैं, जिससे वैध निगरानी में बाधा आती है और इंटरनेट बंदी के दौरान भी बातचीत संभव रहती है। खबरों के मुताबिक अधिकारियों ने 24 जुलाई को कंपनियों से मौखिक रूप से कहा था कि इस आदेश पर अमल न करें।

इस चुनौती का समर्थन कर रहे डिजिटल अधिकार संगठन एसएफएलसी.इन ने कहा कि पूरे संचार ऐप पर ब्लॉकिंग की शक्ति का इस्तेमाल बेहद गैर-आनुपातिक है। संगठन ने कहा, “प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद को संभव बनाना किसी भी हालत में किसी ऐप को ब्लॉक करने का वैध आधार नहीं हो सकता।”

इंटरनेट नीति पर लंबे समय से लिखने वाले निखिल पाहवा ने और सीधे शब्दों में कहा, “बिटचैट ने खुद कोई कानून नहीं तोड़ा है।”

आगे क्या

केंद्र के हलफनामे में पहली बार सरकार को अदालत के सामने इस रोक के कानूनी और तकनीकी आधार बताने होंगे। यह मामला ऐसे समय आया है जब कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के प्रदर्शनों से जुड़ी इंटरनेट पाबंदियों पर दखल दिया था। इन प्रदर्शनों ने इंटरनेट बंदी, और उससे बचने के तरीकों, को एक अहम सवाल बना दिया है।