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छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर क्या हैं: अमेज़न को 12 क्यों चाहिए, और भारत की योजना कहां तक पहुंची
अमेज़न इंडियाना के एक पुराने कोयला संयंत्र की जगह 12 छोटे परमाणु रिएक्टरों वाला प्लांट बनवाएगा, और भारत 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी रिएक्टर चालू करना चाहता है। रिएक्टर 'छोटा' कैसे होता है, कंपनियां और सरकारें इन पर दांव क्यों लगा रही हैं, और दिक्कत कहां है।
संक्षेप में
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) ऐसा परमाणु रिएक्टर है जो प्रति यूनिट करीब 300 मेगावाट तक बिजली बनाता है और जिसे ज़्यादातर कारखाने में बनाकर मॉड्यूल के रूप में जोड़ा जाता है। 19 अक्टूबर को अमेज़न ने कहा कि वह इंडियाना में एक्स-एनर्जी के 12 एक्सई-100 रिएक्टरों वाले 960 मेगावाट के प्लांट का खर्च उठाएगा, जिसकी बिजली ग्रिड और उसके डेटा सेंटरों को मिलेगी। भारत का परमाणु ऊर्जा मिशन, जिसकी घोषणा 2025-26 के बजट में एसएमआर शोध के लिए ₹20,000 करोड़ के साथ हुई, 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी एसएमआर चालू करना चाहता है, और 2025 के शांति अधिनियम ने परमाणु बिजली निजी कंपनियों के लिए खोल दी है। दिक्कत यह है कि एसएमआर अभी महंगे हैं और व्यावसायिक स्तर पर ज़्यादातर आज़माए नहीं गए।
छोटा मॉड्यूलर रिएक्टर क्या है?
इतना छोटा परमाणु रिएक्टर कि उसका ज़्यादातर हिस्सा कारखाने में बन सके और यूनिट दर यूनिट जोड़ा जा सके।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर यानी एसएमआर को प्रति मॉड्यूल 300 मेगावाट तक बिजली बनाने वाला रिएक्टर बताती है। सामान्य बड़ा रिएक्टर 1,000 मेगावाट या उससे ज़्यादा बनाता है। सोच यह है कि छोटी यूनिटें असेंबली लाइन पर बनें, साइट तक भेजी जाएं और चरणों में चालू हों, ताकि बड़े परमाणु संयंत्रों को घेरने वाली लंबी निर्माण अवधि और बढ़ती लागत से बचा जा सके।
काम वही है जो किसी भी रिएक्टर का होता है: यूरेनियम के परमाणु तोड़कर गर्मी बनाना, जिससे टर्बाइन चलती हैं। कई डिज़ाइन ‘पैसिव’ सुरक्षा पर टिके हैं, यानी आपात स्थिति में बिना पंप या ऑपरेटर के खुद ठंडे हो जाते हैं। समर्थकों के मुताबिक इससे संयंत्र के आसपास का सुरक्षा क्षेत्र काफी छोटा रखा जा सकता है।
अमेज़न ने क्या घोषणा की है?
इंडियाना के टेरे हॉट के पास, एक ढहाए जा चुके कोयला संयंत्र की जगह 12 रिएक्टरों वाला 960 मेगावाट का प्लांट।
इसमें अमेरिकी कंपनी एक्स-एनर्जी का एक्सई-100 डिज़ाइन होगा, हर यूनिट करीब 80 मेगावाट की। इसे बिजली कंपनी अमेरिकन इलेक्ट्रिक पावर चलाएगी और अमेज़न इसका पहला ग्राहक होगा। बिजली सार्वजनिक ग्रिड में जाएगी और अमेज़न के मुताबिक उसके डेटा सेंटरों को भी मिलेगी।
दोनों कंपनियों का यह दूसरा सौदा है और 2024 में घोषित पहले सौदे का तीन गुना है। उसी साल अमेज़न ने एक्स-एनर्जी में 70 करोड़ डॉलर के निवेश दौर की अगुवाई की थी। दोनों ने 2039 तक अमेरिका में 5 गीगावाट नई परमाणु क्षमता का लक्ष्य रखा है। अमेज़न ने इंडियाना प्लांट की लागत नहीं बताई।
टेक कंपनियां ऐसा क्यों कर रही हैं?
क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चौबीसों घंटे बिजली पर चलता है। डेटा सेंटरों को ऐसी स्थिर बिजली चाहिए जो धूप या हवा पर निर्भर न हो, और कंपनियों ने कार्बन उत्सर्जन घटाने के वादे किए हैं। परमाणु बिजली दोनों ज़रूरतें पूरी करती है। पुराने कोयला संयंत्रों की जगहें इसलिए आकर्षक हैं क्योंकि वहां ग्रिड कनेक्शन, ठंडा करने का पानी और बिजलीघर के लिए तय ज़मीन पहले से है।
भारत की योजना क्या है?
2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी एसएमआर, 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु बिजली की मुहिम के हिस्से के रूप में।
2025-26 के केंद्रीय बजट में परमाणु ऊर्जा मिशन की घोषणा हुई, जिसमें एसएमआर के शोध और विकास के लिए ₹20,000 करोड़ रखे गए। अगस्त में परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा को बताया कि भारत 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी एसएमआर विकसित कर चालू करने की योजना बना रहा है। उन्होंने कहा कि 700 मेगावाट के बड़े रिएक्टर नई जगहों पर लगेंगे, जबकि एसएमआर मौजूदा औद्योगिक जगहों पर, बंद हो रहे जीवाश्म ईंधन संयंत्रों की जगह, ज़्यादा बिजली खाने वाले उद्योगों की अपनी बिजली के लिए और दूरदराज़ इलाकों में लगाए जाएंगे।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) तीन डिज़ाइनों पर काम कर रहा है।
भारत के छोटे रिएक्टर डिज़ाइन
क्या निजी कंपनियां इन्हें बना सकती हैं?
अब हां। 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम ने परमाणु बिजली सरकार के हाथ में रखी थी। 2025 का शांति अधिनियम (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) सरकारी और निजी, दोनों तरह की संस्थाओं को भागीदारी की इजाज़त देता है और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्जा देता है। टाटा पावर, जेएसडब्ल्यू, जिंदल स्टील और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसे कई बड़े औद्योगिक समूहों के अपनी जगहों पर रिएक्टर लगाने में रुचि दिखाने की खबरें हैं।
दिक्कत क्या है?
लागत, और कोई आज़माया हुआ व्यावसायिक मॉडल न होना। दुनिया में बहुत कम एसएमआर चल रहे हैं, और एक्स-एनर्जी ने टेक्सास में डाउ केमिकल की साइट पर अपने पहले प्लांट का काम भी शुरू नहीं किया है, जो अभी निर्माण परमिट का इंतज़ार कर रहा है। मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के विश्लेषकों के मुताबिक 2023 में परमाणु बिजली की लागत करीब 110 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा थी, जबकि सौर की करीब 55 और पवन की 40 डॉलर।
समर्थकों का तर्क है कि दर्जनों यूनिटें बनने के बाद कारखाना उत्पादन से लागत घटेगी। अमेज़न इंडियाना में यही दांव लगा रहा है, और भारत अपने डिज़ाइनों के साथ: कि छोटे रिएक्टर एक-एक बार के विशाल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक उत्पाद बन सकते हैं।