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समझिएभूकंप

तिब्बत बार-बार क्यों कांपता है, और गुरुवार का भूकंप भारत के अपने खतरे के बारे में क्या बताता है

इस हफ्ते तिब्बत के बाचेन काउंटी में 7 तीव्रता के भूकंप से कम से कम 16 लोगों की मौत हुई, एवरेस्ट के पास 126 लोगों की जान लेने वाले भूकंप के 21 महीने बाद। पठार इतना सक्रिय क्यों है, हिमालय कैसे अलग है, और भारत के सख्त भूकंप नक्शे का क्या हुआ।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

तिब्बत भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की धीमी टक्कर के ऊपर बसा है, जिसने पठार को मोटा और ऊंचा किया है और उसे लगातार पूरब से पश्चिम की ओर खींच रही है, इसलिए वह उन दरारों पर टूटता है जिनसे अक्सर तेज़ भूकंप आते हैं। इस टक्कर की भारतीय तरफ का हिमालय 8 से ज़्यादा तीव्रता के भूकंप पैदा कर सकता है, और वैज्ञानिक चेताते हैं कि इसके कुछ हिस्सों में बड़ा भूकंप बकाया है। पूरे हिमालयी चाप को नए सबसे ज़्यादा जोखिम वाले ज़ोन में रखने वाली नई भवन संहिता नवंबर 2025 में जारी हुई, लेकिन मार्च 2026 में वापस ले ली गई, और 2016 की संहिता ही लागू है।

इस हफ्ते तिब्बत में क्या हुआ?

गुरुवार 22 अक्टूबर की देर रात बाचेन काउंटी के एक दूरदराज़ इलाके में 7.0 तीव्रता का उथला भूकंप आया, जिसमें कम से कम 16 लोगों की मौत हुई।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के मुताबिक भूकंप स्थानीय समय रात 10:33 बजे ल्हासा से करीब 390 किमी उत्तर-पूर्व में मारू कस्बे में करीब 10 किमी की गहराई पर आया। चीनी सरकारी टेलीविज़न ने बताया कि 46 लोग घायल हुए और 339 घर ढह गए या क्षतिग्रस्त हुए। काउंटी मुख्यालय में बिजली और फोन लाइनें ठप हो गईं। भारत या नेपाल में किसी नुकसान की खबर नहीं आई।

दो साल से कम समय में तिब्बत में यह 7 तीव्रता का दूसरा भूकंप था। 7 जनवरी 2025 को नेपाल सीमा और माउंट एवरेस्ट के पास टिंगरी काउंटी में 7.1 तीव्रता के भूकंप में आधिकारिक गिनती के अनुसार 126 लोग मारे गए थे, और तिब्बती स्रोतों ने यह संख्या ज़्यादा बताई।

तिब्बत में इतने भूकंप क्यों आते हैं?

क्योंकि भारत उसे दबा रहा है।

भारतीय प्लेट उत्तर की ओर यूरेशियाई प्लेट में धंस रही है। इसी टक्कर ने हिमालय बनाया और तिब्बत के नीचे की परत को मोटा किया, जिससे पठार इतना ऊंचा उठा कि टिंगरी के आसपास का इलाका करीब 4,500 मीटर पर है। दबाव थमा नहीं है, और पठार को उसके लिए जगह बनानी पड़ती है।

इसका एक तरीका है बगल में फैलना। दक्षिणी तिब्बत का बड़ा हिस्सा पूरब से पश्चिम की ओर खिंच रहा है, और वह उत्तर से दक्षिण चलने वाली दरारों (फॉल्ट) पर टूटता है। जब ऐसी दरार के दोनों ओर की चट्टान खिसकती है, तो भूवैज्ञानिक जिसे नॉर्मल फॉल्टिंग भूकंप कहते हैं, वह आता है। टिंगरी का भूकंप ऐसा ही था। पठार पर दूसरी जगहों पर परत के बड़े खंड लंबी स्ट्राइक-स्लिप दरारों पर एक-दूसरे के बगल से सरकते हैं, और तिब्बत के सबसे बड़े, करीब 8 तीव्रता के भूकंप इन्हीं पर आए हैं।

उथले भूकंप इतना नुकसान क्यों करते हैं?

क्योंकि ऊर्जा सतह के करीब निकलती है। टिंगरी और बाचेन, दोनों भूकंप ज़मीन से सिर्फ करीब 10 किमी नीचे शुरू हुए। उथला भूकंप बड़े इलाके में ज़मीन को ज़ोर से हिलाता है। बाचेन में 300 से ज़्यादा घर गिर गए, कुछ छतें धंस गईं और कस्बे के दफ्तर की दीवारों में दरारें आ गईं।

तिब्बत के दो भूकंप, 21 महीने के अंतर पर

टिंगरी, जनवरी 2025बाचेन, अक्टूबर 2026
तीव्रता (यूएसजीएस)
7.1
7.0
कहां
शिगात्से क्षेत्र, नेपाल सीमा के पास
नागचू क्षेत्र, ल्हासा से करीब 390 किमी उत्तर-पूर्व
मौतें
आधिकारिक गिनती में 126
कम से कम 16
तिब्बत के बाहर असर
नेपाल, और बिहार में हल्का नुकसान
कोई खबर नहीं

क्या तिब्बत का भूकंप भारत को नुकसान पहुंचा सकता है?

भारत में यह महसूस हो सकता है, लेकिन बड़ा खतरा घर के ज़्यादा करीब है।

टिंगरी भूकंप में नेपाल में 13 लोग घायल हुए और करीब 400 किमी दूर काठमांडू के लोग घरों से बाहर भागे। भारत में बिहार के समस्तीपुर में कई घरों को हल्का नुकसान हुआ और असम व पश्चिम बंगाल में झटके महसूस हुए। कहीं ज़्यादा उत्तर और पूरब में आए बाचेन भूकंप का भारत पर असर नहीं बताया गया।

ज़्यादा गंभीर खतरा टक्कर की भारतीय तरफ है। जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक फैला हिमालयी चाप 8 से ज़्यादा तीव्रता के भूकंप पैदा कर सकता है। 2015 का नेपाल भूकंप टिंगरी से करीब 171 किमी दक्षिण में आया था।

वैज्ञानिक क्यों कहते हैं कि हिमालय के कुछ हिस्सों में बड़ा भूकंप बकाया है?

क्योंकि मुख्य दरार के कुछ हिस्से बहुत लंबे समय से जकड़े हुए हैं।

देहरादून के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलौत कह चुके हैं कि पहाड़ों के नीचे की बड़ी दरार, हिमालयन मेगाथ्रस्ट, के लंबे समय से जकड़े हिस्सों में करीब दो सदियों से कोई बड़ा टूटना नहीं हुआ है और उनमें तनाव जमा होता जा रहा है। मध्य हिमालय के कुछ हिस्से, खासकर उत्तराखंड और पश्चिमी नेपाल के बीच, सतह तक दरार डालने वाले बड़े भूकंप के लिए बकाया बताए गए हैं। पहाड़ों में घनी बसावट और भवन नियमों का ढीला पालन खतरा और बढ़ाते हैं।

भारत के नए भूकंप नक्शे का क्या हुआ?

वह जारी हुआ, फिर वापस ले लिया गया।

नवंबर 2025 में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने नए भूकंप नक्शे के साथ संशोधित भूकंप डिज़ाइन संहिता, आईएस 1893 (2025), जारी की। इसमें पूरे हिमालयी चाप को, जो पहले ज़ोन IV और V में बंटा था, एक नए सबसे ज़्यादा जोखिम वाले ज़ोन VI में रखा गया और भारत के करीब 61% हिस्से को मध्यम से ऊंचे खतरे वाले ज़ोन में। दो ज़ोन की सीमा पर बसे कस्बों को ऊंचे ज़ोन में रखा जाना था।

करीब तीन महीने बाद संहिता वापस ले ली गई; ब्यूरो ने 3 मार्च 2026 की राजपत्र अधिसूचना में इसकी पुष्टि की। आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी कि पर्याप्त परामर्श नहीं हुआ, और निर्माण की लागत बढ़ने तथा इस चिंता पर सवाल थे कि जब मौजूदा नियमों का पालन ही कम है तो ज़ोन VI के नियम ज़मीन पर कैसे उतरेंगे। संहिता का 2016 वाला संस्करण लागू है।

इससे क्या बचता है?

खतरे को जानने और उसके हिसाब से निर्माण करने के बीच वही फासला। वापसी से नक्शा बदला, भूगर्भ नहीं। पहाड़ का कोई कस्बा किसी भी ज़ोन में हो, सुरक्षा इसी से आती है कि उसके घर, स्कूल और अस्पताल मौजूदा संहिता के हिसाब से सच में बने और जांचे गए हैं या नहीं। गुरुवार का भूकंप तिब्बत के कम आबादी वाले इलाके में आया। हिमालय के किसी भीड़ भरे कस्बे के नीचे ऐसा ही झटका एक अलग कहानी होता।