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समझिएभू-राजनीति

मक्का रक्षा समझौता: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने एक-दूसरे से क्या वादा किया है, और भारत की नज़र क्यों है

अगस्त में हुए तीन देशों के समझौते पर अब तुर्किये की संसद विचार करने वाली है, और पाकिस्तानी व तुर्की सेनाएं हूती हमलों से सऊदी अरब की रक्षा के लिए तैयार हो रही हैं। समझौते में क्या है, क्या नहीं है, और इसका भारत के लिए क्या मतलब है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त 2026 को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दस्तखत किए। इसके तहत तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सब पर हमला माना जाएगा। यह सितंबर 2025 के सऊदी-पाकिस्तान समझौते का विस्तार है, हर सदस्य खुद तय करेगा कि कितनी मदद भेजनी है, और परमाणु हथियारों के बारे में सार्वजनिक रूप से इसमें कुछ नहीं कहा गया है। भारत, जिसके करीब 27.4 लाख नागरिक सऊदी अरब में हैं और जो वहां से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है, कह चुका है कि वह इस समझौते पर करीबी नज़र रख रहा है।

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता क्या है?

यह सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच आपसी रक्षा की संधि है, जिस पर 7 अगस्त 2026 को मक्का में दस्तखत हुए।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अल-सफ़ा पैलेस में “मक्का अल-मुकर्रमा संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन” में इस पर हस्ताक्षर किए। उनके संयुक्त बयान में कहा गया कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमले को “उन सब पर हमला माना जाएगा”, और यह समझौता “रक्षा सहयोग के हर पहलू को बढ़ाने” का प्रावधान करता है।

यह सऊदी अरब को परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान और नाटो के सदस्य तुर्किये के साथ जोड़ता है। इसी मेल की वजह से कुछ टिप्पणीकार इसे “इस्लामी नाटो” कह रहे हैं, हालांकि तीनों में से कोई सरकार यह नाम इस्तेमाल नहीं करती।

इसमें असल में क्या वादा किया गया है?

युद्ध में मदद का, लेकिन कितनी मदद, यह हर देश खुद तय करेगा।

16 अनुच्छेदों वाली संधि के मसौदे के मुताबिक, अनुच्छेद 1 में सदस्य देश एक-दूसरे की ज़मीन पर खतरे को दूर करने के लिए “सभी ज़रूरी साधन” इस्तेमाल करने का वादा करते हैं। अनुच्छेद 2 कहता है कि अगर किसी एक पर हमला होता है तो बाकी “हमले के शिकार पक्ष को तुरंत सहायता देंगे”। लेकिन यह सहायता किस दायरे और किस रूप में होगी, यह हर देश अपने संसाधनों के हिसाब से खुद आंकेगा।

बाकी अनुच्छेद रक्षा उद्योग, खुफिया जानकारी साझा करने, लॉजिस्टिक्स, संयुक्त प्रशिक्षण और आतंकवाद से निपटने से जुड़े हैं। तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों की एक समिति समझौते की निगरानी करेगी। कोई नया देश तभी शामिल हो सकता है जब तीनों संस्थापक सदस्य राज़ी हों। संधि 10 साल के लिए है, उसके बाद कोई भी सदस्य बाहर निकल सकता है। फिलहाल किसी संयुक्त कमान, साझा बजट या स्थायी सेना का कोई सार्वजनिक संकेत नहीं है।

यह 2025 के सऊदी-पाकिस्तान समझौते से कैसे अलग है?

इसमें तुर्किये जुड़ गया है और ज़्यादा ब्योरा कागज़ पर आया है।

17 सितंबर 2025 को मोहम्मद बिन सलमान और शहबाज़ शरीफ़ ने रियाद के अल-यमामा पैलेस में रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते (एसएमडीए) पर दस्तखत किए थे। उसमें कहा गया था कि “दोनों में से किसी भी देश के खिलाफ आक्रमण को दोनों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा”। उस समझौते में ब्योरा कम था। मक्का समझौता उसी पर आगे बढ़ता है। यह करीब एक साल की बातचीत के बाद हुआ, और उस क्षेत्रीय युद्ध के बाद आया जो फरवरी 2026 में ईरान को लेकर शुरू हुआ था और जिसमें खाड़ी देशों पर बार-बार मिसाइल और ड्रोन हमले हुए।

गठबंधन कैसे बना

  1. 17 सितंबर 2025सऊदी अरब और पाकिस्तान ने रियाद में रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते पर दस्तखत किए।
  2. 7 अगस्त 2026सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर दस्तखत किए।
  3. अक्टूबर 2026हूती हमलों के बीच तीनों ने प्रतिरोधक कदम सक्रिय करने और सऊदी अरब में सेनाएं भेजने पर सहमति दी।
  4. 19 अक्टूबर 2026पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने कहा कि किसी सदस्य पर हमले का जवाब सामूहिक होगा।
  5. 20 अक्टूबर 2026तुर्किये ने संधि को मंज़ूरी के लिए अपनी संसद में पेश किया।

यह अभी खबरों में क्यों है?

क्योंकि इसकी परीक्षा हो रही है, और तुर्किये इसे कानूनी रूप देने की ओर बढ़ रहा है।

यमन के हूती सऊदी तेल ठिकानों और रियाद के मुख्य हवाई अड्डे पर मिसाइलें और ड्रोन दाग रहे हैं। इसी महीने तीनों साझेदारों ने समझौते के तहत “प्रतिरोधक कदम” सक्रिय करने और सऊदी अरब में सेनाएं भेजने पर सहमति दी। 19 अक्टूबर को पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ़ चौधरी ने चेतावनी दी: “अगर आप इन तीनों में से किसी भी देश के खिलाफ सीधे या परोक्ष रूप से यह युद्ध छेड़ते हैं, तो जवाब सामूहिक होगा।”

20 अक्टूबर को अंकारा ने संधि संसद को भेज दी। इसकी मंज़ूरी के लिए साधारण बहुमत चाहिए, जो एर्दोआन के गठबंधन के पास है। लेकिन मंज़ूरी अपने आप में तुर्की सैनिकों को कहीं नहीं भेजेगी: तैनाती के लिए अलग कानून चाहिए। तुर्किये के राष्ट्रपति कार्यालय के संचार निदेशक बुरहानेत्तिन दुरान ने कहा कि यह साझेदारी “सामूहिक प्रतिरोध को मज़बूत” करेगी।

क्या इसमें परमाणु हथियार भी शामिल हैं?

सार्वजनिक की गई किसी जानकारी में ऐसा नहीं कहा गया है। सऊदी अरब ने कहा है कि यह समझौता न कोई सैन्य धुरी है, न कोई सांप्रदायिक गुट, और इसका परमाणु महत्वाकांक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। तुर्किये इसे “पूरी तरह रक्षात्मक” और किसी देश के खिलाफ नहीं बताता है। प्रकाशित सामग्री का अध्ययन करने वाले विश्लेषकों के मुताबिक इसमें पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को साझेदारों तक बढ़ाने की कोई पुष्टि नहीं है। संधि का पूरा पाठ तुर्किये की संसदीय समिति के पास पहुंचने के बाद ही सार्वजनिक होने की उम्मीद है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

यह पाकिस्तान को उस खाड़ी देश की सुरक्षा में औपचारिक सैन्य भूमिका देता है, जिस पर भारत निर्भर है।

विदेश मंत्रालय के मुताबिक सऊदी अरब में करीब 27.4 लाख भारतीय रहते हैं। 2024-25 में दोनों देशों का व्यापार 41.88 अरब डॉलर रहा, और उस साल भारत के कच्चे तेल के आयात का 13.58% और एलपीजी आयात का 14.99% सऊदी अरब से आया। दोनों देशों के बीच 2019 से रणनीतिक साझेदारी परिषद है, और उनकी सेनाएं संयुक्त नौसैनिक और थल अभ्यास कर चुकी हैं।

नई दिल्ली की प्रतिक्रिया संयमित रही है। 2025 में रियाद समझौते के समय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था: “हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर इस घटनाक्रम के असर का अध्ययन करेंगे।” मक्का समझौते के बाद उन्होंने कहा: “यह भी एक घटनाक्रम है जिस पर हम करीबी नज़र रख रहे हैं, और हम आपको जानकारी देते रहेंगे।”

क्या यह सऊदी अरब या तुर्किये को भारत-पाकिस्तान टकराव में खींच सकता है?

कागज़ पर संधि किसी दुश्मन का नाम नहीं लेती, और ऐसे संकट में यह कैसे काम करेगी, इसकी कभी परीक्षा नहीं हुई है। अनुच्छेद 2 किसी भी सदस्य पर, किसी भी ओर से हुए सशस्त्र हमले पर लागू होता है। लेकिन यही अनुच्छेद हर साझेदार को खुद तय करने देता है कि कितनी मदद दे, और भारत के साथ रियाद के व्यापारिक रिश्ते गहरे हैं। फिलहाल समझौते की असली परीक्षा खाड़ी में, हूतियों के खिलाफ हो रही है। पाकिस्तान, जो अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ भी है और सऊदी अरब का सहयोगी भी, दोनों भूमिकाएं कितनी दूर तक निभा पाता है, यही वह सवाल है जिस पर नई दिल्ली की सबसे करीबी नज़र रहेगी।

मूल दस्तावेज़