समझिएतकनीक
समुद्र के नीचे की केबल: होर्मुज़ के तारों पर ईरान की धमकी का भारत के इंटरनेट के लिए क्या मतलब है
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के एक वरिष्ठ कमांडर ने इस हफ्ते कहा कि ईरान पर हमला हुआ तो होर्मुज़ जलडमरूमध्य के नीचे बिछी इंटरनेट केबल नष्ट की जा सकती हैं। ये केबल कैसे काम करती हैं, भारत का कितना ट्रैफिक इनसे गुज़रता है, और कटने पर क्या होगा।
संक्षेप में
लगभग पूरा अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक उपग्रहों से नहीं, बल्कि समुद्र तल पर बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों से चलता है। खाड़ी देशों को भारत, यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने वाली कई केबल प्रणालियां होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रती हैं, और 21 अक्टूबर को आईआरजीसी कमांडर यदुल्लाह जवानी ने कहा कि ईरान के बुनियादी ढांचे पर हमला हुआ तो इन्हें भी 'निशाना बनाकर नष्ट किया जा सकता है'। इन्हें काटने से भारत का इंटरनेट बंद नहीं होगा, क्योंकि ट्रैफिक दूसरी केबलों पर चला जाता है, लेकिन पश्चिम एशिया और यूरोप की सेवाएं धीमी हो सकती हैं, और युद्ध क्षेत्र में मरम्मत में महीनों लग सकते हैं।
समुद्री केबल क्या होती है?
यह फाइबर-ऑप्टिक लाइन है, जो अक्सर बगीचे के पाइप से ज़्यादा मोटी नहीं होती, और देशों के बीच डेटा ले जाने के लिए समुद्र तल पर बिछाई जाती है।
जब मुंबई से लंदन ईमेल जाता है, या यूरोप के किसी सर्वर से वीडियो खुलता है, तो डेटा लगभग निश्चित रूप से ऐसी ही किसी केबल के भीतर कांच के रेशों से प्रकाश की तरंगों के रूप में गुज़रता है। गहरे समुद्र में केबल की मोटाई करीब 17 से 21 मिमी होती है। तट के पास, जहां जहाज़ों के लंगर और मछली पकड़ने के उपकरण खतरा होते हैं, इस पर कवच चढ़ाया जाता है और यह 40 से 50 मिमी तक मोटी हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक का बहुत छोटा हिस्सा ही उपग्रहों से जाता है। आपात स्थिति में वे काम आते हैं, लेकिन क्षमता और गति में केबल का मुकाबला नहीं कर सकते। दुनिया का करीब 99% अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक समुद्री केबलों से चलता है, इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2010 में ही इन्हें “महत्वपूर्ण संचार अवसंरचना” कहा था।
होर्मुज़ से कौन सी केबल गुज़रती हैं?
कई प्रणालियां, जो खाड़ी देशों को भारत, यूरोप और अफ्रीका से जोड़ती हैं।
आईआरजीसी के अधिकारी और दिल्ली का थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन जलडमरूमध्य से गुज़रने वाली सात अहम प्रणालियां गिनाते हैं। उद्योग संस्था इंटरनेशनल केबल प्रोटेक्शन कमेटी पांच सक्रिय हिस्से गिनती है। इनमें फाल्कन, गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल, सी-मी-वी-6 और एशिया-अफ्रीका-यूरोप-1 शामिल हैं, जो दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत, खाड़ी, मिस्र और दक्षिणी यूरोप को जोड़ती है। भारती एयरटेल और रिलायंस जियो की इनमें से कई में हिस्सेदारी है।
कुल मिलाकर ये केबल दुनिया की अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ का 1% से भी कम ले जाती हैं। इनका महत्व मात्रा से ज़्यादा भूगोल में है: ये यूएई, कतर, सऊदी अरब और ओमान की अर्थव्यवस्थाओं की सेवा करती हैं और भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच ट्रैफिक ले जाती हैं।
ईरान ने आखिर धमकी क्या दी है?
अपने बुनियादी ढांचे पर हमला होने की सूरत में इन्हें नष्ट करने की। बुधवार को रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के वरिष्ठ कमांडर ब्रिगेडियर जनरल यदुल्लाह जवानी ने अरबी चैनल अल-आलम से कहा कि “अमेरिका और उसके सहयोगियों का बड़ा निवेश है” और जलडमरूमध्य की केबल “को भी निशाना बनाकर नष्ट किया जा सकता है”।
यह धमकी महीनों से बन रही थी। अप्रैल में आईआरजीसी से जुड़ी एक समाचार एजेंसी ने खाड़ी की समुद्री केबलों और क्लाउड डेटा सेंटरों का नक्शा छापा। मई में सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम ज़ुल्फ़क़ारी ने एक्स पर लिखा: “हम इंटरनेट केबलों पर शुल्क लगाएंगे।” ईरानी मीडिया ने ईरान के नियंत्रण वाले पानी में केबलों पर लाइसेंस शुल्क, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेज़न से ईरानी कानून के तहत काम करवाने और मरम्मत पर एकाधिकार की बात उठाई, और मिस्र के स्वेज़ नहर शुल्क को मिसाल बताया।
भारत कितना असुरक्षित है?
वैश्विक आंकड़ों से कहीं ज़्यादा। भारत का अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक गिनी-चुनी जगहों पर उतरता है। ट्राई ने 2023 में 14 केबल लैंडिंग स्टेशनों पर 17 अंतरराष्ट्रीय केबल गिनी थीं, जिनमें ज़्यादातर मुंबई और चेन्नई में हैं। यूरोप और पश्चिम एशिया जाने वाले ट्रैफिक को कुछ ही पश्चिमी रास्तों से निकलना होता है, और खाड़ी उनमें से एक है।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन का अनुमान है कि भारत के पश्चिम की ओर जाने वाले डेटा ट्रैफिक का करीब 60% होर्मुज़ गलियारे से गुज़रता है और वहां की सात में से चार केबल सीधे भारत के लिए अहम हैं। वह एक अनुमान का हवाला देता है कि एक दिन की रुकावट से भारत की आईटी और सेवा अर्थव्यवस्था को 92 करोड़ डॉलर तक का नुकसान हो सकता है।
केबल कटी तो असल में क्या होगा?
चीज़ें बंद नहीं होंगी, धीमी होंगी। केबल खराब होने पर इंटरनेट ट्रैफिक अपने आप दूसरे रास्ते पर चला जाता है। लेकिन तब उन रास्तों पर बोझ बढ़ता है, इसलिए धीमी स्पीड, बफरिंग, अटकती वीडियो कॉल और पश्चिम एशिया या यूरोप में चल रही क्लाउड सेवाओं में देरी की आशंका रहती है। खाड़ी या यूरोप के डेटा सेंटरों से तेज़ जुड़ाव पर निर्भर ट्रेडिंग सिस्टम और कंपनियों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा।
हाल की मिसाल मौजूद है। 2024 की शुरुआत में लाल सागर में हूती लड़ाकों के हमले का शिकार हुए एक जहाज़ के घिसटते लंगर से तीन केबल कट गईं, जिससे एशिया और यूरोप के बीच के रास्ते का करीब एक चौथाई ट्रैफिक प्रभावित हुआ। इनमें से एक केबल की मरम्मत में पांच महीने लगे, क्योंकि केबल जहाज़ सुरक्षित ढंग से संघर्ष क्षेत्र में नहीं जा पा रहे थे।
मरम्मत इतनी धीमी क्यों होती है?
क्योंकि मरम्मत करने वाले जहाज़ कम हैं, और भारत का अपना एक भी नहीं। मरम्मत जहाज़ को टूटी जगह ढूंढनी होती है, केबल को समुद्र तल से ऊपर खींचना होता है और उसे जोड़ना होता है। ट्राई ने 2023 में कहा था कि भारत में कोई घरेलू समुद्री मरम्मत सेवा नहीं है: भारत को सेवा देने वाली दो मुख्य कंपनियां सिंगापुर और दुबई में हैं, और उनके जहाज़ों को पहुंचने में 10 से 12 दिन लगते हैं। युद्ध क्षेत्र में बीमा कंपनियां और चालक दल जाने से मना भी कर सकते हैं।
ट्राई ने सिफारिश की थी कि सरकार भारतीय झंडे वाले मरम्मत जहाज़ को समर्थन दे, दोनों तटों पर केबल डिपो बनाए और लैंडिंग स्टेशनों को महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना घोषित करे।
क्या जोखिम घटाने के लिए कुछ हो रहा है?
खाड़ी से बचकर जाने वाले नए रास्ते बन रहे हैं। इस साल भारत में हुए एआई इम्पैक्ट समिट में गूगल ने 15 अरब डॉलर की समुद्री केबल परियोजना ‘अमेरिका-इंडिया कनेक्ट’ की घोषणा की, जिसमें भारत को सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से जोड़ने वाले रास्ते होंगे जो होर्मुज़ से नहीं गुज़रेंगे। ऐसी केबल बिछाने में बरसों लगते हैं। फिलहाल भारत के पश्चिमी इंटरनेट की सुरक्षा कुछ हद तक इस पर निर्भर है कि खाड़ी का टकराव समुद्र तल तक न पहुंचे।