समझिएपर्यावरण
ग्रीन पटाखे क्या हैं: कोई पटाखा 'ग्रीन' कैसे बनता है, और दिल्ली को सिर्फ दो दिन की छूट क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को प्रमाणित ग्रीन पटाखों की इजाज़त दी, और 9 नवंबर से पूरी पाबंदी लौट आएगी। ये पटाखे क्या हैं, सच में कितने कम प्रदूषण वाले हैं, और असली व नकली की पहचान कैसे करें।
संक्षेप में
ग्रीन पटाखे वे पटाखे हैं जो सीएसआईआर के नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) के बनाए फॉर्मूले पर तैयार होते हैं। इनमें बेरियम नहीं होता, एल्युमिनियम कम और खोल छोटे होते हैं, और इन्हें आम पटाखों से कम से कम 30% कम पार्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड छोड़ने के लिए बनाया गया है। ये प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं, और पिछली दिवाली दिल्ली की हवा फिर भी बहुत खराब हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में इन्हें सिर्फ 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 और रात 8 से 10 बजे तक चलाने की छूट दी है। बिक्री 4 से 6 नवंबर तक तय जगहों पर होगी, सीलबंद डिब्बों में, जिन पर निर्माता की पहचान बताने वाला क्यूआर कोड होगा।
ग्रीन पटाखा क्या है?
यह ऐसा पटाखा है जो सरकारी वैज्ञानिकों के बनाए साफ फॉर्मूले पर तैयार होता है। 2018 में अर्जुन गोपाल मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पाबंदियां लगाईं और कम प्रदूषण वाले विकल्प मांगे। इसके बाद वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और नागपुर स्थित उसके राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने नए फॉर्मूले तैयार किए। पहले ग्रीन पटाखे 2019 में बाज़ार में आए।
आम पटाखों का रंग और धमाका बेरियम, स्ट्रॉन्शियम और तांबे जैसी धातुओं के यौगिकों से आता है, जो आखिरकार उसी हवा में घुलते हैं जिसमें लोग सांस लेते हैं। ग्रीन पटाखों में बेरियम यौगिक बिल्कुल नहीं होते, एल्युमिनियम और थर्माइट कम इस्तेमाल होता है, और इनकी जगह पोटैशियम नाइट्रेट लिया जाता है। इनके खोल भी छोटे होते हैं और इनमें धूल दबाने वाले तत्व होते हैं।
ये कितने साफ हैं?
लक्ष्य है कम से कम 30% कम प्रदूषण: उसी तरह के आम पटाखे के मुकाबले महीन कणों (पीएम), सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का कम उत्सर्जन। नीरी के तीन मुख्य परिवार हैं। स्वास (SWAS) जलवाष्प छोड़कर धूल दबाता है और पार्टिकुलेट मैटर 30 से 35% घटाता है। स्टार (STAR) बदले हुए थर्माइट का इस्तेमाल करता है, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड 20 से 30% घटाता है और कम शोर करता है। सफल (SAFAL) में ज़्यादातर एल्युमिनियम की जगह मैग्नीशियम है, और यह धातु व कणों का उत्सर्जन 30 से 35% घटाता है। नए संस्करण पीएम10 में 45 से 60% कमी का दावा करते हैं।
शोर भी घटता है, पर बस थोड़ा सा। ग्रीन पटाखे करीब 110 से 125 डेसिबल का शोर करते हैं, जबकि कुछ आम पटाखे 160 डेसिबल तक जाते हैं।
आम और ग्रीन पटाखे
तो फिर पाबंदी क्यों है?
क्योंकि कम प्रदूषण का मतलब प्रदूषण-मुक्त नहीं है। नीरी के आंकड़े नियंत्रित परीक्षणों से आते हैं, और अगर लोग ज़्यादा पटाखे जलाएं तो हर पटाखे की बचत बेकार हो सकती है। अप्रैल 2025 की एक सुनवाई में जस्टिस ए एस ओका ने कहा था कि “इन पटाखों में कुछ भी ग्रीन नहीं है” और “एकमात्र हल ऐसे पटाखे बनाना है जिनका उत्सर्जन शून्य हो।”
पिछली दिवाली ने यही दिखाया। 15 अक्टूबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और जस्टिस के वी चंद्रन की पीठ ने तीन दिन के लिए ग्रीन पटाखों की छूट दी थी, 18 से 20 अक्टूबर तक, इन्हीं दो रोज़ाना समय-सीमाओं में। दिवाली के अगले दिन शाम 6 बजे दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 351 था, और 38 में से 35 निगरानी केंद्र ‘बहुत खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में थे। त्योहार के बाद पीएम2.5 का औसत स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा, जो 2021 के बाद सबसे ज़्यादा और 24 घंटे के राष्ट्रीय मानक 60 का करीब आठ गुना था। पुलिस ने 175 से ज़्यादा एफआईआर दर्ज कीं, ज़्यादातर तय समय के बाहर पटाखे जलाने पर। शोध समूह क्लाइमेट ट्रेंड्स ने कहा कि “तथाकथित ‘ग्रीन’ पटाखे जलाने से आम पटाखों के मुकाबले कोई मापने लायक फर्क नहीं पड़ा।”
इस साल कोर्ट ने क्या इजाज़त दी है?
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने दिल्ली-एनसीआर में प्रमाणित ग्रीन पटाखों की इजाज़त सिर्फ 7 और 8 नवंबर को दी है, सुबह 6 से 7 और रात 8 से 10 बजे तक। लाइसेंसधारी व्यापारी 4 से 6 नवंबर तक इन्हें बेच सकेंगे, सिर्फ उन जगहों पर जिन्हें ज़िला अधिकारी और पुलिस चुनेंगे। ऑनलाइन बिक्री पर रोक है, और जुड़ी हुई ‘लड़ी’, मालाएं और बेरियम वाला कोई भी पटाखा प्रतिबंधित है। अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, वृद्धाश्रमों और साइलेंस ज़ोन के 300 मीटर के दायरे को ‘नो-क्रैकर ज़ोन’ घोषित किया गया है। साल भर की पाबंदी 9 नवंबर से लौट आएगी।
कैसे पता करें कि पटाखा सच में ग्रीन है?
पूरी तरह सीलबंद डिब्बे पर नीरी का लोगो और क्यूआर कोड देखें। इस साल कोर्ट ने कोड को उत्पाद और बैच के हिसाब से अलग बनाना अनिवार्य किया है: स्कैन करने पर इसमें निर्माता और उसका नीरी पंजीकरण दिखना चाहिए, और सिर्फ वही उत्पाद मान्य हैं जो 2 से 6 नवंबर के बीच नीरी की वेबसाइट पर अपलोड हुए हों। नीरी का “CSIR NEERI Green QR Code App” यह कोड पढ़ सकता है।
ये अतिरिक्त जांचें पिछले साल के सबक से आई हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पाया था कि क्यूआर कोड गैर-पंजीकृत निर्माताओं को बेचे गए, जिससे आम पटाखे भी ग्रीन बनकर बिक गए। सोमवार के आदेश के तहत कोड किसी और को नहीं दिया जा सकता, और इसे बेचने पर लाइसेंस रद्द होगा।
दिल्ली-एनसीआर में पटाखे: नियम यहां तक कैसे पहुंचे
- 2018अर्जुन गोपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पाबंदियां लगाईं और कम प्रदूषण वाले पटाखों पर ज़ोर दिया
- 2019सीएसआईआर-नीरी के पहले ग्रीन पटाखे बिक्री में आए
- 15 अक्टूबर 2025कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 18 से 20 अक्टूबर तक ग्रीन पटाखों की छूट दी
- 2 नवंबर 2026कोर्ट ने 7 और 8 नवंबर को ग्रीन पटाखों की छूट दी, बिक्री 4 से 6 नवंबर
- 9 नवंबर 2026पूरी पाबंदी लौटेगी; 16 दिसंबर को अनुपालन पर सुनवाई
दिवाली के बाद क्या होगा?
कोर्ट इस बार सबूत चाहता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को 2 से 6 नवंबर, त्योहार के दो दिनों और 9 से 30 नवंबर की वायु गुणवत्ता रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, और मामला 16 दिसंबर को अनुपालन के लिए फिर सुना जाएगा। यही आंकड़े तय करेंगे कि अगले साल दो दिन की यह छूट दोहराई जाएगी, और सख्त होगी या खत्म कर दी जाएगी।