रायहमारा मत
गैरकानूनी गिरफ्तारी की कीमत करदाता ही नहीं, गिरफ्तार करने वाला अफसर भी चुकाए
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के एक व्यक्ति को ₹5 लाख देने का आदेश दिया है, जो 26 दिन उस मामले में हिरासत में रहे जिसे पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद गढ़ा। आदेश सही है। अगली ऐसी गिरफ्तारी तभी रुकेगी जब ज़िम्मेदार लोग सच में इसकी कीमत चुकाएं।

2017 में बिपिन अग्रवाल अपनी बुज़ुर्ग सास की ओर से एक बिल्डर से बातचीत कर रहे थे, जो उनकी हाउसिंग सोसाइटी का पुनर्विकास करना चाहता था। डेवलपरों ने ₹2 लाख की अग्रिम राशि दी। फिर आज़ाद मैदान पुलिस ने उन्हें जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। एफआईआर इसके बाद दर्ज हुई। गिरफ्तारी मेमो पर तारीखें काटकर दोबारा लिखी गईं, जो नोटिस गिरफ्तारी से पहले दिया जाना चाहिए था वह बाद में दिया गया, और पुलिस रिकॉर्ड में साफ रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को आदतन अपराधी बताया गया जिसके फरार होने का खतरा है। एक मजिस्ट्रेट ने उन्हें हिरासत में भेजा, और वे 26 दिन वहां रहे।
गुरुवार को बॉम्बे हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने इसे “डेवलपर और पुलिस की मिलीभगत से प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग” कहा। जस्टिस ए एस गडकरी और जस्टिस कमल खाता ने महाराष्ट्र को दो हफ्ते में उन्हें ₹5 लाख देने का आदेश दिया, सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया, और हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष से उन मजिस्ट्रेटों पर गौर करने को कहा जो बिना वजह दर्ज किए रिमांड बढ़ाते हैं।
यह एक मज़बूत फैसला है। लेकिन यह नौ साल देर से आया है, और जिस ढर्रे को यह उजागर करता है, वह दुर्लभ नहीं है।
वही कहानी, फिर से
2024 में इसी अदालत की एक दूसरी पीठ के सामने महाराष्ट्र में जबरन वसूली और आपराधिक धमकी के आरोप में गिरफ्तार एक पत्रकार का मामला आया। हाज़िर होने का नोटिस तैयार तो था, पर कभी दिया नहीं गया; उसकी जगह उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और वे तीन दिन जेल में रहे। जजों ने पाया कि पुलिस ने “यांत्रिक और लापरवाह तरीके से” काम किया और वरिष्ठ अफसरों से जांच का आदेश दिया।
दोनों गिरफ्तारियों में जो नियम टूटा, वह नया नहीं है। 2014 के अर्नेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने पुलिस से कहा था कि सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पहला कदम व्यक्ति को हाज़िर होने का नोटिस है, हथकड़ी नहीं। अदालतें तब से यह दोहराती रही हैं। एक मामले में, जहां अफसर को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया गया, दिल्ली हाईकोर्ट ने 2021 में इस नियम की अनदेखी के लिए एक सब-इंस्पेक्टर को एक दिन की जेल और हर्जाने की सज़ा दी। जस्टिस नजमी वज़ीरी ने लिखा, “गिरफ्तारी और कैद इंसान को तबाह कर देती है और साथ ही कई बेकसूर रिश्तेदारों को भी प्रभावित करती है।”
यह नियम बारह साल से है। यह अब भी टूटता है क्योंकि इसे तोड़ने की कीमत शायद ही किसी को चुकानी पड़ती है।
एक जायज़ आपत्ति
पुलिस को गिरफ्तारी का अधिकार चाहिए, फौरन और कभी-कभी अधूरी जानकारी के आधार पर भी। जिस अफसर को डर हो कि अदालत बाद में जिस गिरफ्तारी पर सवाल उठाएगी उसका हर्जाना उसकी तनख्वाह से कटेगा, वह तब भी हिचक सकता है जब कोई संदिग्ध सच में भागने या गवाह को धमकाने वाला हो। व्यस्त अदालतों में मजिस्ट्रेट रोज़ दर्जनों रिमांड अर्ज़ियां सुनते हैं।
यह एक साफ लकीर खींचने का तर्क है, कुछ न करने का नहीं। व्यक्तिगत जवाबदेही बदनीयती और तय नियमों के खुले उल्लंघन पर हो: मामला बनने से पहले गिरफ्तारी, जाली तारीख, जानबूझकर रोका गया नोटिस। ठोस आधार पर हुई ईमानदार गलतियां अलग बात हैं, और कानून यह साफ कह सकता है।
क्या बदलना चाहिए
पहला, महाराष्ट्र वह करे जिसकी अदालत ने उसे छूट दी है। वह ₹5 लाख ज़िम्मेदार पाए गए अफसरों से वसूले और सार्वजनिक रूप से बताए कि वसूल लिए। सिर्फ सरकारी खज़ाने से दिया गया मुआवज़ा पुलिस बल को कुछ नहीं सिखाता।
दूसरा, सात साल तक की सज़ा वाले अपराध में हर गिरफ्तारी से पहले एक दर्ज, समय-अंकित नोट अनिवार्य हो कि हाज़िर होने का नोटिस काफी क्यों नहीं था। जिस मेमो को बाद में काटकर बदला जा सके, वह कोई सुरक्षा नहीं है।
तीसरा, मजिस्ट्रेट हिरासत की ज़रूरत लिखे बिना हिरासत न दें, और हाईकोर्ट रिमांड आदेशों की नियमित जांच करें, जैसी बॉम्बे हाईकोर्ट ने अब शुरू की है।
चौथा, राज्य गलत गिरफ्तारी के लिए मुआवज़ा योजना बनाएं, ताकि पीड़ितों को हाईकोर्ट में दस साल लड़ना न पड़े। झूठे मामले में गिरफ्तार होने वाले ज़्यादातर लोगों के पास वह करने के साधन नहीं होते जो श्री अग्रवाल ने किया।
आज़ादी एक दोपहर में छिन जाती है और लौटती है, अगर लौटे तो, बरसों बाद। इसे बचाने का सबसे सस्ता तरीका यह है कि अफसर गिरफ्तारी से पहले दो बार सोचे, न कि बहुत बाद में माफी मांगी जाए।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 26 दिनबिपिन अग्रवाल 2017 में पुलिस और न्यायिक हिरासत में रहे, उस एफआईआर पर जो गिरफ्तारी के बाद दर्ज हुई
- ₹5 लाखमुआवज़ा जिसका आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर 2026 को दिया, दोषी अफसरों से वसूली योग्य
- 7 सालअधिकतम सज़ा वाले वे अपराध जिनमें 2014 से गिरफ्तारी से पहले आमतौर पर हाज़िर होने का नोटिस दिया जाना चाहिए