समझिएचुनाव
2022 में उत्तर प्रदेश ने कैसे वोट दिया, और 403 सीटों वाली विधानसभा जीतने के लिए क्या चाहिए
पिछली बार भाजपा और उसके सहयोगियों ने 273 सीटें जीतीं, समाजवादी पार्टी की सीटें करीब तीन गुना हो गईं और बसपा एक विधायक पर सिमट गई। चारों क्षेत्रों ने कैसे वोट दिया, और 2027 का गणित क्या कहता है।
संक्षेप में
उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन को 202 सीटें चाहिए। 2022 में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 43.82% वोट के साथ 273 सीटें जीतीं, समाजवादी पार्टी के गठबंधन ने 36.60% वोट के साथ 125, और कभी सरकार चला चुकी बसपा 12.88% वोट पाकर भी सिर्फ एक सीट जीत सकी। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा से ज़्यादा सीटें जीतीं, जिससे दिखा कि यह फासला कितनी जल्दी घट सकता है।
सरकार बनाने के लिए कितनी सीटें चाहिए?
202, यानी 403 सदस्यों वाली विधानसभा में साधारण बहुमत।
उत्तर प्रदेश की विधानसभा देश के किसी भी राज्य से बड़ी है, और लोकसभा में राज्य की 80 सीटें हैं। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 को खत्म होगा, और चुनाव फरवरी और मार्च 2027 में होने की उम्मीद है।
2022 में क्या हुआ था?
भाजपा और उसके सहयोगियों ने लगातार दूसरी बार बहुमत हासिल किया और 273 सीटें जीतीं।
मतदान 10 फरवरी से 7 मार्च 2022 के बीच सात चरणों में हुआ और 10 मार्च को वोटों की गिनती हुई। मतदान 61.03% रहा।
भाजपा ने अपने दम पर 41.29% वोट के साथ 255 सीटें जीतीं। उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने 12 और निषाद पार्टी ने छह सीटें जीतीं, जिससे गठबंधन 43.82% वोट के साथ 273 पर पहुंचा।
समाजवादी पार्टी (सपा) ने 32.06% वोट के साथ 111 सीटें जीतीं। उस बार उसके साथी राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) को आठ, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) को छह और अपना दल (कमेरावादी) को एक सीट मिली, और गठबंधन 125 सीटों और 36.60% वोट तक पहुंचा। कांग्रेस 2.33% वोट के साथ दो सीटें जीत सकी, जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) ने दो और बसपा ने एक सीट जीती।
2017 के मुकाबले तस्वीर कैसी थी?
भाजपा की सीटें घटीं पर वोट बढ़े, क्योंकि मुकाबला सीधा हो गया था।
2017 में भाजपा ने 39.67% वोट के साथ 312 सीटें जीती थीं। 2022 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 41.29% हुआ, फिर भी उसकी सीटें 57 कम हो गईं। सपा 47 सीटों और 21.82% वोट से बढ़कर 111 सीटों और 32.06% पर पहुंची, जबकि बसपा का वोट खिसकता गया। दो बड़े खेमों के आमने-सामने होने से भाजपा की बढ़त उतनी सीटों में नहीं बदली जितनी तिकोने मुकाबले में बदलती।
बसपा को क्या हुआ?
वह 19 सीटों से गिरकर एक पर आ गई।
मायावती की पार्टी चार बार उत्तर प्रदेश में सरकार चला चुकी है और 2007 में उसने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। 2017 में उसे 22.23% वोट मिले थे। 2022 में यह घटकर 12.88% रह गया, और 2024 के लोकसभा चुनाव में 9.39%, जिसमें उसे एक भी सीट नहीं मिली।
मायावती 2027 के लिए गठबंधन से इनकार कर चुकी हैं। 7 फरवरी 2026 को लखनऊ में उन्होंने कहा, “बहुजन समाज पार्टी (बसपा) उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी।”
बसपा का बचा हुआ वोट, खासकर दलित वोट, किधर जाता है, यह अगले चुनाव के सबसे बड़े खुले सवालों में से एक है।
चारों क्षेत्रों ने कैसे वोट दिया?
भाजपा गठबंधन हर क्षेत्र में आगे रहा, पर सपा ने पूर्वांचल और पश्चिम में गहरी सेंध लगाई।
2022 विधानसभा चुनाव: क्षेत्रवार सीटें
पश्चिमी यूपी में कई ज़िलों में मुस्लिम आबादी एक चौथाई या उससे ज़्यादा है और जाट, गुर्जर और राजपूत समुदाय प्रभावशाली हैं। यहीं सपा-रालोद गठबंधन का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। विपक्ष ने शामली और मुरादाबाद ज़िलों में सभी सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने आगरा, मथुरा, गाज़ियाबाद और गौतम बुद्ध नगर की हर सीट अपने नाम की।
अवध, यानी लखनऊ और अयोध्या के आसपास का मध्य इलाका, 2022 में भाजपा का सबसे मज़बूत क्षेत्र रहा।
पूर्वांचल, यानी गोरखपुर और वाराणसी वाले पूर्वी ज़िलों से सपा को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं। निषाद और राजभर जैसे छोटे पिछड़े समुदाय यहां अहम हैं, इसीलिए सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे दलों का इतना महत्व है। दोनों बड़े गठबंधनों से बाहर जीती गई पांचों सीटें भी पूर्व में ही थीं।
बुंदेलखंड, जो राज्य के सबसे गरीब इलाकों में है और कभी बसपा का गढ़ था, भाजपा और उसके सहयोगियों के साथ रहा। यहां की 19 में से तीन सीटें सपा ने जीतीं।
अलग-अलग विश्लेषक क्षेत्रों को अलग तरह से बांटते हैं, इसलिए हर क्षेत्र की सीटों की संख्या एक अध्ययन से दूसरे में थोड़ी बदल जाती है।
2022 के बाद क्या बदला है?
गठबंधन बदल गए हैं, और 2024 के लोकसभा नतीजों ने दिखाया कि मुकाबला तेज़ी से कड़ा हो सकता है।
सपा के 2022 के दो साथी पाला बदल चुके हैं। रालोद के जयंत चौधरी अब केंद्रीय मंत्री हैं, और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सपा ने 37 और भाजपा ने 33 जीतीं। सपा के साथ लड़ी कांग्रेस ने छह, रालोद ने दो, और अपना दल (सोनेलाल) और चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने एक-एक सीट जीती। वोट के मामले में दोनों गठबंधन लगभग बराबर रहे: एनडीए को 43.69% और इंडिया गठबंधन को 43.52%।
तो 2027 में जीत के लिए क्या चाहिए?
जातियों और समुदायों का बड़ा और टिकाऊ गठजोड़, क्योंकि दोनों खेमों के बीच का फासला घट चुका है।
2022 में भाजपा गठबंधन पूरे राज्य में करीब सात अंक से आगे था। दो साल बाद, एक राष्ट्रीय चुनाव में, यह बढ़त लगभग खत्म हो गई। विधानसभा और लोकसभा के वोट एक जैसे नहीं चलते, पर दोनों मुख्य खेमे अब एक ही लक्ष्य पर काम कर रहे हैं: जाति आधारित छोटे दलों को साथ लाना और बसपा से छिटक रहे मतदाताओं को अपनी ओर खींचना।
भाजपा के लिए इसका मतलब है अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी, सुभासपा और रालोद को साथ रखना। सपा के लिए इसका मतलब है अपने पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) मंच को अपने गढ़ों से बाहर सीटों में बदलना, और कांग्रेस के साथ सीटों का बंटवारा तय करना।
हर मंत्री, सीट और 2022 के अंतर के लिए देखें हमारी उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 गाइड।
मूल दस्तावेज़
- Party-wise result, Uttar Pradesh, General Election to Lok Sabha 2024Election Commission of India, 4 जून 2024