समझिएसंसद
संसद का विशेष सत्र: इसे कौन बुलाता है, और क्या इससे मुख्य चुनाव आयुक्त हटाए जा सकते हैं?
शुक्रवार को अमित शाह ने कहा कि वे विपक्ष के वोट चोरी के आरोप पर विशेष सत्र बुलाने को तैयार हैं; शनिवार को इंडिया गठबंधन ने एक नकली संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर 'महाभियोग' चलाया। विशेष सत्र क्या होता है, फैसला कौन करता है, और मुख्य चुनाव आयुक्त को सच में हटाने के लिए क्या चाहिए।
संक्षेप में
विशेष सत्र संविधान का शब्द नहीं है: यह बस संसद के तीन सामान्य सत्रों से बाहर बुलाई गई बैठक है। अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर संसद बुलाते हैं, इसलिए फैसला सरकार का होता है; विपक्ष सिर्फ एक स्थिति में विशेष बैठक के लिए मजबूर कर सकता है, आपातकाल को नामंज़ूर करने पर मतदान के लिए। सिर्फ सत्र बुलाने से मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं हटते। अनुच्छेद 324(5) और 2023 के सीईसी कानून के तहत हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी है: लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस, लोकसभा अध्यक्ष या सभापति की मंज़ूरी, जांच, और दोनों सदनों में विशेष बहुमत। आज तक किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया नहीं गया, और शनिवार के नकली 'महाभियोग' का कोई कानूनी असर नहीं है।
इस हफ्ते के आखिर में क्या हुआ?
इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर नकली मुकदमा चलाया। शनिवार को 21 विपक्षी दल नई दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर नकली संसद के रूप में बैठे, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला छह सूत्री प्रस्ताव पारित किया और उन पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में मतदाताओं के नाम काटने और सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। चुनाव आयोग वोट चोरी के आरोप को भ्रामक कहानी का हिस्सा बताकर खारिज कर चुका है।
इससे एक दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को दूसरा मंच देने की पेशकश की थी। उन्होंने लखनऊ में भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा, “मैं विशेष सत्र बुलाने को तैयार हूं... लेकिन राहुल बाबा कभी नहीं मानेंगे।”
क्या ‘महाभियोग’ सही शब्द है?
कानून की नज़र में नहीं। संविधान महाभियोग शब्द सिर्फ राष्ट्रपति के लिए, अनुच्छेद 61 में, इस्तेमाल करता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को अनुच्छेद 324(5) के तहत हटाया जाता है, उन पर महाभियोग नहीं चलता। नकली बैठक एक राजनीतिक आयोजन थी: इसकी कोई कानूनी ताकत नहीं है, और इसमें पारित कोई बात संसद, राष्ट्रपति या आयोग पर लागू नहीं होती।
विशेष सत्र क्या होता है?
संसद के सामान्य कैलेंडर से बाहर बुलाई गई कोई भी बैठक। यह शब्द संविधान में नहीं है। परंपरा के मुताबिक संसद साल में तीन बार बैठती है, बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र के लिए, लेकिन अनुच्छेद 85 बस इतना कहता है कि राष्ट्रपति समय-समय पर हर सदन को अपनी ठीक समझी गई तारीख और जगह पर बुलाएंगे, बशर्ते एक सत्र की आखिरी बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच छह महीने से ज़्यादा का अंतर न हो।
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। इसलिए व्यवहार में फैसला सरकार करती है कि संसद कब, कितने दिन और किस विषय पर बैठेगी। शाह की पेशकश इसीलिए अहम है: यह पेशकश सिर्फ सरकार ही कर सकती है।
क्या पहले भी संसद का विशेष सत्र हुआ है?
कई बार, आमतौर पर वर्षगांठ या संकट के मौके पर। 14 और 15 अगस्त 1947 की आधी रात आज़ादी के लिए संसद बैठी, और नवंबर 1962 में चीन के साथ युद्ध पर चर्चा के लिए, जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी की मांग मान ली। हाल के वर्षों में 30 जून 2017 की आधी रात जीएसटी लागू करने के लिए संसद बैठी, और सितंबर 2023 में पांच दिन के सत्र में वह नई इमारत में गई और महिला आरक्षण कानून पारित किया।
संसद की कुछ विशेष बैठकें
- अगस्त 1947आधी रात के सत्र में आज़ादी और सत्ता हस्तांतरण।
- नवंबर 1962संसद में चीन के साथ युद्ध पर बहस।
- अगस्त 1997आधी रात के सत्र में आज़ादी के 50 साल।
- जुलाई 2008वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद लोकसभा में विश्वास मत।
- जून 2017आधी रात की संयुक्त बैठक में जीएसटी लागू।
- सितंबर 2023पांच दिन का सत्र; संसद नई इमारत में गई।
क्या विपक्ष विशेष सत्र के लिए मजबूर कर सकता है?
सिर्फ एक सीमित स्थिति में। अनुच्छेद 352(8) के तहत अगर लोकसभा के कम से कम दसवें हिस्से के सदस्य आपातकाल की घोषणा को नामंज़ूर करने के प्रस्ताव का लिखित नोटिस दें, तो “चौदह दिन के भीतर सदन की विशेष बैठक होगी”। चुनाव आयोग के कामकाज समेत किसी और विषय के लिए ऐसा कोई रास्ता नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में विपक्ष को सरकार के सत्र बुलाने का, या शीतकालीन सत्र का इंतज़ार करना होगा, जो आमतौर पर नवंबर के आखिर या दिसंबर की शुरुआत में शुरू होता है।
क्या विशेष सत्र से मुख्य चुनाव आयुक्त हट जाएंगे?
अपने आप नहीं। सत्र सिर्फ एक मंच है। हटाने की अपनी प्रक्रिया है, वही जो सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) के जज के लिए है। अनुच्छेद 324(5) कहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी रीति और उन्हीं आधारों के सिवा नहीं हटाया जा सकता, और 2023 के सीईसी कानून की धारा 11 यही दोहराती है: मुख्य चुनाव आयुक्त को “सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी रीति और उन्हीं आधारों के सिवा उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।”
इसका मतलब है लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस। लोकसभा अध्यक्ष या सभापति इसे स्वीकार या खारिज कर सकते हैं। स्वीकार होने पर न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) के एक मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता की तीन सदस्यीय समिति आरोपों की जांच करती है, और मुख्य चुनाव आयुक्त अपना बचाव कर सकते हैं। समिति अगर कदाचार या अक्षमता साबित पाए, तभी प्रस्ताव पर मतदान होता है। फिर उसे एक ही सत्र में दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से पारित होना होता है, जिसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश देते हैं।
क्या कभी ऐसा हुआ है?
किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ कभी नहीं, और किसी जज के साथ भी पूरी तरह नहीं। 1993 में जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ प्रस्ताव लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा सका। 2011 में राज्यसभा ने कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस साल विपक्ष का अपना रिकॉर्ड भी बेहतर नहीं: मार्च में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 193 सांसदों के नोटिस लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और सभापति सी पी राधाकृष्णन ने 6 अप्रैल को खारिज कर दिए, और अप्रैल में राज्यसभा के 73 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला दूसरा नोटिस अब भी लंबित है।
बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा अलग है: 2023 के कानून के तहत उन्हें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।
तो दांव पर क्या है?
एक बहस, फैसला नहीं। विशेष सत्र से विपक्ष को आयोग पर अपने आरोप संसद में रखने का मौका मिलेगा, और सरकार को रिकॉर्ड पर जवाब देने का। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए फिर भी पीठासीन अधिकारियों की मंज़ूरी वाला नोटिस और ऐसा विशेष बहुमत चाहिए जो विपक्ष के पास नहीं है। गठबंधन रविवार को रामलीला मैदान की रैली में अपना अभियान ले जा रहा है; शाह की पेशकश कैलेंडर की तारीख बनेगी या नहीं, यह सरकार पर है।
मूल दस्तावेज़
- Article 352: Proclamation of EmergencyConstitution of India (constitutionofindia.net), 1 नवंबर 2026
- Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023, Section 11AdvocateKhoj (bare act), 28 दिसंबर 2023