रायहमारा मत
असम अपने जंगल भी बचा सकता है और बेदखल परिवारों से न्याय भी कर सकता है। वह पुनर्वास योजना सार्वजनिक करे
गोलाघाट, होजाई और नगांव के तीन आरक्षित वनों से करीब 1,000 परिवार हटाए गए, जिन अभियानों की घोषणा मंगलवार को हुई। अतिक्रमण वाली वन भूमि खाली कराना जायज़ लक्ष्य है; लोग कहां जाएंगे यह बताए बिना ऐसा करना अच्छा शासन नहीं है।

पिछले कुछ दिनों के अभियानों में असम ने गोलाघाट, होजाई और नगांव में 638 हेक्टेयर से ज़्यादा आरक्षित वन भूमि खाली कराई है, और करीब 1,000 परिवारों के घर छिन गए हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने नतीजे की घोषणा अपने शब्दों में की: “तीन ज़िलों में अतिक्रमणकारियों पर हमारे प्रशासन का ‘रुद्र रूप’ टूटा।” लुटुमारी, बोरपानी और जमुना-मौदंगा वनों की खाली कराई गई ज़मीन पर पेड़ लगाए जाने हैं।
सरकार ने जो घोषणा नहीं की है, वह यह कि ये परिवार जाएंगे कहां।
जंगल खाली कराने का पक्ष
आरक्षित वन सार्वजनिक ज़मीन हैं, जो सबके लिए सौंपी गई अमानत हैं, और असम के जंगलों पर वाकई दबाव है। जो राज्य उन पर टुकड़ों-टुकड़ों में बसावट होने देता है, उसके पास आखिरकार बचाने को जंगल ही नहीं बचेंगे। गुवाहाटी हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने खुद वन भूमि खाली कराने का आदेश दिया है। होजाई में पुलिस ने कहा कि इस महीने की तोड़फोड़ शांति से हुई और कई निवासियों ने मशीनें आने से पहले खुद अपने घर गिरा दिए। वन कानून लागू करने वाली सरकार अपना काम कर रही है, और इसके उलट दिखाना गलत होगा।
बेदखली अभियान सरमा सरकार के कार्यक्रम का भी एक केंद्रीय हिस्सा हैं। यह उनकी राजनीति है, जिसे चुनना उनका अधिकार है। बाकी सबके लिए सवाल यह है कि क्या ये अभियान ऐसे तरीके से चलाए जा रहे हैं जिनका बचाव कानून और बुनियादी इंसानियत कर सके।
क्या कमी है
मुख्य रूप से दो चीज़ें। पहली, लोगों के लिए योजना। अल्पसंख्यक अधिकार समूहों ने गोलाघाट, होजाई और नगांव में उजाड़े गए लोगों के पुनर्वास की मांग की है। यह कोई बेजा मांग नहीं है, और सरकार सिद्धांत रूप में इसे पहले ही मान चुकी है। जुलाई 2025 में सरमा ने कहा था कि राज्य उन बेदखल लोगों को भूमि अधिकार देगा जो “वास्तविक भारतीय नागरिक” हैं और अपने मूल स्थानों में भूमिहीन हैं। जिस हाईकोर्ट आदेश का उन्होंने हवाला दिया, उसी में यह भी कहा गया था कि बेदखल किए जा रहे लोगों को पीने का पानी और दूसरी ज़रूरी चीज़ें दी जाएं। जब तक राज्य हर अभियान के लिए यह न बताए कि कौन पात्र है, कितनों को बसाया गया और कहां, तब तक इन दोनों वादों का ज़्यादा मतलब नहीं है।
दूसरी, प्रक्रिया। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने देश भर में तोड़फोड़ के लिए नियम तय किए थे: कारण बताओ नोटिस, जवाब के लिए कम से कम 15 दिन, व्यक्तिगत सुनवाई, तर्कसंगत आदेश और तोड़फोड़ की वीडियो रिकॉर्डिंग। अदालत ने सड़कों, फुटपाथों, रेल लाइनों और जलाशयों पर बने ढांचों और अदालत के आदेश से होने वाली तोड़फोड़ को इससे बाहर रखा था, इसलिए हो सकता है कि उसके निर्देश हर वन अभियान पर बाध्यकारी न हों। फिर भी उनकी भावना लागू होनी चाहिए। कांग्रेस का आरोप रहा है कि पहले के अभियानों में नोटिस के दो-तीन दिन के भीतर घर गिरा दिए गए। सरकार इस आरोप का सबसे अच्छा जवाब अपने कागज़ात दिखाकर दे सकती है।
असम को क्या करना चाहिए
हर बेदखली अभियान से पहले लिखित, व्यक्तिगत नोटिस और सुनवाई का मौका हो, और उसका रिकॉर्ड रखा और सार्वजनिक किया जाए, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी जगहों पर तोड़फोड़ के लिए ज़रूरी किया है।
सरकार हर अभियान के लिए प्रकाशित करे कि कितने परिवार हटाए गए, मुख्यमंत्री के अपने वादे के तहत कितनों को ज़मीन या आवास के लिए पात्र पाया गया, और उन्हें कहां बसाया गया। जो परिवार पात्र नहीं है, उसे लिखित में वजह बताई जाए।
राज्य वादा किए गए वृक्षारोपण की समय-सारिणी तय करे, ताकि ज़मीन खाली कराने का मकसद ज़मीन पर दिखे और ज़मीन यूं ही खाली न पड़ी रहे।
जंगल बचाना और लोगों को बचाना आपस में टकराने वाले लक्ष्य नहीं हैं। अपने पक्ष पर भरोसा रखने वाली सरकार को दोनों करने में, और यह दिखाने में कि उसने दोनों किए, कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 638 हेक्टेयरवन भूमि, जो मुख्यमंत्री के मुताबिक अक्टूबर 2026 में गोलाघाट, होजाई और नगांव में खाली कराई गई
- करीब 1,000परिवार, जो अधिकारियों के मुताबिक तीनों ज़िलों में बेदखल हुए
- 15 दिनतोड़फोड़ से पहले नोटिस की न्यूनतम अवधि, जो सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में तय की