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एलपीजी के दाम समझिए: होटल वाला सिलेंडर हर महीने महंगा क्यों होता है और आपकी रसोई वाला क्यों नहीं
19 किलो का कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर रविवार को फिर महंगा हुआ, तीन महीने में तीसरी बार, जबकि 14.2 किलो का घरेलू सिलेंडर दिल्ली में ₹942 पर ही रहा। दोनों के दाम कैसे तय होते हैं, घाटा कौन उठाता है, और ढाबों व घरों के लिए इसका क्या मतलब है।
संक्षेप में
कमर्शियल एलपीजी का दाम बाज़ार से तय होता है। तेल विपणन कंपनियां इसे हर महीने की पहली तारीख को अंतरराष्ट्रीय मानकों, खासकर सऊदी अरामको के मासिक कॉन्ट्रैक्ट प्राइस के हिसाब से बदलती हैं, इसलिए खाड़ी में दाम बढ़ते ही होटलों, रेस्तरां और मिठाई दुकानों पर असर लगभग तुरंत पहुंचता है। घरेलू सिलेंडर लागत से काफी नीचे रखा जाता है: जून में सरकार ने इसकी आपूर्ति लागत ₹1,600 से ऊपर बताई थी, जबकि दिल्ली में दाम ₹942 है। प्रति सिलेंडर करीब ₹700 का यह घाटा तेल कंपनियां उठाती हैं और सरकार उसकी आंशिक भरपाई करती है। उज्ज्वला लाभार्थियों को हर रिफिल पर ₹300 अलग से मिलते हैं।
एक ही गैस के दो दाम क्यों?
क्योंकि सरकार घरों को बचाती है और कारोबारों को बाज़ार भाव चुकाने देती है। घरों में इस्तेमाल होने वाला 14.2 किलो का सिलेंडर और होटलों, रेस्तरां, ढाबों व मिठाई दुकानों में इस्तेमाल होने वाला 19 किलो का सिलेंडर, दोनों में एक ही रसोई गैस होती है। लेकिन दोनों के दाम बिल्कुल अलग तरीके से तय होते हैं।
रविवार से कमर्शियल सिलेंडर दिल्ली में ₹2,820 का हो गया है, अक्टूबर से ₹10 ज़्यादा, और कोलकाता में ₹2,971, जहां बढ़ोतरी ₹17 की रही। घरेलू सिलेंडर दिल्ली में ₹942 पर बना हुआ है। प्रति किलो के हिसाब से घर करीब ₹66 चुकाते हैं, जबकि कारोबार अब करीब ₹148।
कमर्शियल सिलेंडर का दाम कैसे तय होता है?
यह हर महीने दुनिया के भाव के साथ चलता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कमर्शियल एलपीजी के दामों को “बाज़ार से तय और सीधे अंतरराष्ट्रीय मानकों से जुड़ा” बताया है, और कहा है कि “कमर्शियल एलपीजी के दामों में बदलाव वैश्विक एलपीजी कीमतों और उनसे जुड़ी लागत की चाल दिखाते हैं।”
मुख्य मानक सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस या सीपी है, जिसे सऊदी अरामको हर महीने की शुरुआत में प्रोपेन और ब्यूटेन के लिए घोषित करती है। एलपीजी इन्हीं दो गैसों से बनती है। भारत अपनी करीब 60% एलपीजी आयात करता है और उसकी पहुंच लागत सीपी से जुड़ी है। नवंबर के लिए अरामको ने प्रोपेन 40 डॉलर बढ़ाकर 720 डॉलर प्रति टन और ब्यूटेन 50 डॉलर बढ़ाकर 780 डॉलर प्रति टन कर दिया। इसके बाद इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल विपणन कंपनियां महीने की पहली तारीख को सिलेंडर का दाम बदलती हैं।
इस साल दाम इतने ऊपर नीचे क्यों हुए?
क्योंकि खाड़ी की जंग ने आपूर्ति उलट पुलट कर दी है। भारत में खपत होने वाली करीब 54% एलपीजी आम तौर पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आती है, जो अब भी बंद है। मिश्रित सऊदी सीपी फरवरी में 542.50 डॉलर प्रति टन से बढ़कर जून में 790 डॉलर पर पहुंच गया। दिल्ली में कमर्शियल सिलेंडर जून तक पश्चिम एशिया संकट के दौरान पांच बढ़ोतरी के बाद ₹3,113.50 पर पहुंच गया था।
इसके बाद गर्मियों में दाम कुछ घटे और फिर चढ़ने लगे। अगस्त से अब तक तीन बदलावों में दिल्ली का कमर्शियल सिलेंडर ₹82 महंगा हुआ है। यह अब भी एक साल पहले से करीब 77% महंगा है, जब यह ₹1,590.50 का था।
और घरेलू सिलेंडर?
इसका दाम आपूर्ति लागत से काफी नीचे रखा जाता है। इस साल घरेलू सिलेंडर दो बार महंगा हुआ, 7 मार्च को ₹60 और जून में ₹29, और दिल्ली में ₹942 पर पहुंचा। इसके बावजूद मंत्रालय ने जून में कहा कि 14.2 किलो सिलेंडर की आपूर्ति लागत ₹1,600 पार कर गई है, जिससे तेल कंपनियों को प्रति सिलेंडर करीब ₹700 का घाटा (अंडर-रिकवरी) हो रहा है।
मंत्रालय ने कहा, “प्रति सिलेंडर जो कई सौ रुपये का बोझ घरों पर नहीं पड़ता, वह सरकार उठा रही है।” केंद्रीय कैबिनेट ने तेल कंपनियों की भरपाई के लिए ₹30,000 करोड़ मंज़ूर किए हैं, जबकि 2025-26 के अंत तक कुल अंडर-रिकवरी ₹60,000 करोड़ आंकी गई।
घरेलू और कमर्शियल एलपीजी की तुलना
गरीब परिवार कितना चुकाते हैं?
करीब ₹642 प्रति सिलेंडर। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के कनेक्शन वाले परिवारों को सामान्य दाम के ऊपर हर रिफिल पर ₹300 प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से मिलते हैं। मंत्रालय के मुताबिक यह योजना 10.58 करोड़ से ज़्यादा कनेक्शनों को कवर करती है। मंत्रालय की अपनी तुलना में दिल्ली में घरेलू सिलेंडर पाकिस्तान (₹1,046), नेपाल (₹1,207), बांग्लादेश (करीब ₹1,225) और श्रीलंका (₹1,241) से सस्ता है।
आपके लिए इसका क्या मतलब है?
बाहर खाना थोड़ा महंगा हो सकता है। कमर्शियल गैस ढाबों और हलवाइयों की सीधी लागत है, जिनकी गैस खपत दिवाली से पहले सबसे ज़्यादा होती है, और कई दुकानें यह बढ़ोतरी ग्राहकों पर डाल सकती हैं। घर फिलहाल सुरक्षित हैं, लेकिन लागत और दाम का फर्क गायब नहीं होता। वह तेल कंपनियों के खातों में और भरपाई के ज़रिये सरकार पर जाता है। जब तक होर्मुज़ बंद है और खाड़ी में दाम ऊंचे हैं, यह बोझ बढ़ता रहेगा, और उसके साथ घरेलू सिलेंडर पर एक और बढ़ोतरी का दबाव भी। कमर्शियल सिलेंडर का अगला बदलाव 1 दिसंबर को होगा।