रायहमारा मत
नकली संसद मुख्य चुनाव आयुक्त पर मुकदमा नहीं चला सकती। असली संसद चलाए, अमित शाह इसकी पेशकश कर चुके हैं
इंडिया गठबंधन ने शनिवार को मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर ज्ञानेश कुमार पर 'महाभियोग' चलाया। एक दिन पहले गृह मंत्री ने कहा था कि वे इन आरोपों पर संसद का विशेष सत्र बुलाने को तैयार हैं। दोनों पक्षों को उनकी बात पर कायम रखा जाए, और चुनाव आयोग अपने आंकड़े लेकर आए।

शनिवार को नई दिल्ली में 10 राजाजी मार्ग स्थित मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर 21 विपक्षी दल एक ऐसी संसद के रूप में बैठे जिसका कोई अस्तित्व नहीं है, और एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया जो किसी पर बाध्यकारी नहीं है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता में उन्होंने छह आरोपों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर “महाभियोग” चलाया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में उनकी देखरेख में 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए। राहुल गांधी ने कहा कि गठबंधन के पास “कोई और रास्ता नहीं बचा था”।
इस आयोजन को नाटक कहकर खारिज कर देना आसान है, और भाजपा ने यही किया। लेकिन जब हर असली दरवाज़ा बंद हो, तो गंभीर शिकायत अक्सर नाटक का ही रूप ले लेती है। ज़्यादा काम का सवाल यह है कि कोई दरवाज़ा खोला कैसे जाए।
एक दरवाज़ा अभी खुला है
इसका जवाब, शायद अनजाने में, गृह मंत्री ने ही दे दिया। शुक्रवार को लखनऊ में अमित शाह ने कहा: “मैं विशेष सत्र बुलाने को तैयार हूं... लेकिन राहुल बाबा कभी नहीं मानेंगे।” उन्होंने आयोग पर लगे आरोपों को निराधार बताया और कहा कि विपक्ष सड़क पर ड्रामा चाहता है।
श्री शाह को उनकी बात पर कायम रखा जाना चाहिए। और विपक्ष, जो हफ्तों से कह रहा है कि उसकी सुनवाई नहीं होने दी जाती, यह पेशकश ठंडी पड़ने से पहले हां कहे। सदन के पटल पर बहस, जहां मंत्री जवाब दें और सब कुछ रिकॉर्ड में दर्ज हो, किसी भी नकली बैठक या रैली से ज़्यादा कीमती है, आज रामलीला मैदान की रैली समेत।
असली रास्ता क्यों बंद हुआ
संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त को ठोस कारणों से सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को: साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर, दोनों सदनों में कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से पारित प्रस्ताव के ज़रिए। यह कसौटी जानबूझकर ऊंची रखी गई है। कोई सरकार किसी फैसले से नाराज़ होकर अंपायर को बर्खास्त न कर सके।
लेकिन पहला कदम आसान होना चाहिए। मार्च में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने हटाने की कार्यवाही शुरू करने के नोटिस पर दस्तखत किए, जो कानून की ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। अप्रैल में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के हवाले के सिवा कोई सार्वजनिक कारण नहीं बताया गया। 193 सांसदों के समर्थन वाला नोटिस, अगर ठुकराया भी जाना था, तो एक स्पष्टीकरण का हकदार था। इसी स्पष्टीकरण की कमी एक वजह है कि विपक्ष अब एक पार्टी नेता के घर पर नकली बैठकें कर रहा है।
एक जायज़ आपत्ति
इसके खिलाफ भी ठोस तर्क है। नाम हटाने के आंकड़े विपक्ष के अपने हैं, और उसने यह नहीं दिखाया है कि 13 करोड़ वैध मतदाता हटाए गए, न कि मृतक, दोहरे नाम और दूसरी जगह चले गए लोग। आयोग कहता है कि उसके फैसले सर्वसम्मत थे। विशेष सत्र दोनों पक्षों को चिल्लाने का एक और मंच भर बन सकता है, और संसद में संख्या ऐसी है कि हटाने का कोई प्रस्ताव पारित नहीं होगा।
यह सब सही है। लेकिन बहस सिर्फ मतदान नहीं होती। यह वह जगह है जहां सवालों का जवाब रिकॉर्ड पर देना पड़ता है, और ठीक यही अब तक नहीं हुआ है।
अब क्या होना चाहिए
पहला, सरकार बिना किसी शर्त के विशेष सत्र की तारीख तय करे। ऐसा न हुआ तो श्री शाह की पेशकश एक ताने के रूप में ही याद की जाएगी।
दूसरा, विपक्ष हां कहे और सबूत लेकर आए: नामित निर्वाचन क्षेत्र, उन हटाए गए मतदाताओं की नमूना सूचियां जिन्हें वह गलत तरीके से हटाया बताता है, और खुद वे लोग।
तीसरा, चुनाव आयोग पूछे जाने का इंतज़ार न करे। किसी भी बहस से पहले वह निर्वाचन क्षेत्रवार बताए कि एसआईआर में कितने नाम हटे और हर नाम किस आधार पर हटाया गया: मृत्यु, स्थानांतरण, दोहराव या जवाब न देना। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के असहमति वाले जिन लिखित नोट की खबरें आई हैं, उन्हें भी सार्वजनिक करे, जैसा हमने अक्टूबर में कहा था।
चौथा, पीठासीन अधिकारी आगे से जब भी ज़रूरी संख्या में सदस्यों के दस्तखत वाला हटाने का नोटिस ठुकराएं, लिखित कारण दें।
जिस चुनाव आयोग को अपने काम पर भरोसा है, उसे उसे दिखाने में कुछ नहीं खोना। लेकिन जब वोट को लेकर देश का सबसे बड़ा विवाद संसद को छोड़कर हर जगह लड़ा जाए, तो संसद बहुत कुछ खो देती है।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 21शनिवार की नकली संसद में शामिल विपक्षी दल, जिन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छह सूत्री प्रस्ताव पारित किया
- 193मार्च में हटाने के नोटिस पर दस्तखत करने वाले सांसद, अप्रैल में अध्यक्ष और सभापति ने नोटिस स्वीकार नहीं किया
- 13.2 करोड़मतदाता जिनके नाम एसआईआर में हटने का दावा विपक्ष करता है; आयोग ने यह आंकड़ा नहीं माना है