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सुप्रीम कोर्ट जज बनकर फोन करने वाले सुकेश चंद्रशेखर की सजा पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में कोई गलती नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट के जज और उनके सचिव बनने के मामले में ठग की दोषसिद्धि बरकरार रही।

मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा पर रोक की सुकेश चंद्रशेखर की याचिका खारिज की।
- उन्हें 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के जज बनने और जज के सचिव बनने का दोषी ठहराया गया था।
- उनके वकील ने बताया कि उन पर 31 और आपराधिक मामले लंबित हैं, किसी में अब तक दोषसिद्धि नहीं।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने सोमवार को ठग सुकेश चंद्रशेखर की दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के एक जज और जज के निजी सचिव बनकर अपने मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी पर दबाव डालने का दोषी पाया गया था।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) के आदेश के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि उस आदेश में कोई गलती नहीं है, “कानून की किसी गलती की तो बात ही छोड़िए”। पीठ ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ चल रहे बाकी आपराधिक मुकदमे अपने गुण-दोष पर और कानून के मुताबिक आगे बढ़ें।
आरोप था कि 2017 के एक भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत के दौरान चंद्रशेखर ने एक कांस्टेबल के फोन से उस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी को फोन किया, पहले जज के सचिव और फिर खुद जज बनकर। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 अगस्त को उन्हें दोषी ठहराया। भारतीय दंड संहिता की जिन धाराओं में दोषसिद्धि हुई, वे लोक सेवक का रूप धरने, लोक सेवक को चोट की धमकी देने और गुमनाम संदेश से आपराधिक धमकी से जुड़ी हैं। 29 अगस्त को उन्हें सजा सुनाई गई।
उन्होंने दोषसिद्धि और सजा पर रोक के लिए पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश और फिर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों ने उनकी अर्जी ठुकरा दी। हाईकोर्ट ने कहा था कि उनके आचरण पर निचली अदालत की कड़ी टिप्पणियों की जांच अपीलीय अदालत करेगी।
रोक क्यों चाहिए थी
जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि रोक की जरूरत ही क्यों है। चंद्रशेखर की ओर से वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने कहा कि उनके मुवक्किल पर 31 आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से किसी में अब तक दोषसिद्धि नहीं हुई, और निचली अदालत की टिप्पणियां उन मुकदमों को प्रभावित करेंगी। उनकी दलील थी कि नए साक्ष्य कानून की धारा 41 के तहत इन्हें बुरे चरित्र का सबूत माना जा सकता है।
निचली अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धरने को लालच से किया गया अपराध नहीं, बल्कि “संस्थागत अवज्ञा का कृत्य” कहा था और टिप्पणी की थी कि चंद्रशेखर इस “खतरनाक भ्रम में काम कर रहे थे” कि कानून का राज किसी बेहद दुस्साहसी झूठ के आगे झुक जाएगा। रोक से इनकार के बाद अब इन टिप्पणियों को परखना अपीलीय अदालत का काम है।