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जजों की नियुक्ति की नियमावली में 11 साल की देरी पर याचिका से जस्टिस नरसिम्हा अलग हुए
लोक प्रहरी की मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर वाली याचिका से न्यायमूर्ति ने खुद को इसलिए अलग किया क्योंकि वे एनजेएसी मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में सरकार की ओर से पेश हुए थे।

मुख्य बातें
- न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने सोमवार को जजों की नियुक्ति की नियमावली पर जनहित याचिका से खुद को अलग कर लिया।
- एनजीओ लोक प्रहरी का कहना है कि संशोधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर करीब 11 साल से लंबित है।
- याचिका में कॉलेजियम के फैसलों को आरटीआई के दायरे में लाने की भी मांग है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने सोमवार को खुद को उस जनहित याचिका की सुनवाई से अलग कर लिया जो मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) को अंतिम रूप देने में लंबी देरी को लेकर है। एमओपी वह नियमावली है जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले तय होते हैं।
एनजीओ लोक प्रहरी की यह याचिका न्यायमूर्ति नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के सामने सूचीबद्ध थी। न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि वे इसे नहीं सुन सकते, क्योंकि वे एनजेएसी मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में पेश हुए थे। एनजेएसी कॉलेजियम की जगह आयोग बनाने की सरकार की कोशिश थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रद्द कर दिया था।
अदालत ने कोई नई तारीख नहीं दी, और यह भी नहीं बताया गया कि अब कौन सी पीठ याचिका सुनेगी।
याचिका में क्या मांग है
लोक प्रहरी का कहना है कि केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच बार-बार पत्राचार के बावजूद संशोधित एमओपी करीब 11 साल से अधूरा पड़ा है। याचिका संवैधानिक अदालतों के लिए जजों के चयन के स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंडों की कमी की ओर भी ध्यान दिलाती है।
एनजीओ चाहता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश प्रशासनिक स्तर पर 2015 के एनजेएसी फैसले के मुताबिक एमओपी में संशोधन करें और कानून मंत्रालय मुख्य न्यायाधीश से सलाह के बाद एक महीने के भीतर इसे अंतिम रूप दे। याचिका में मांग है कि नियुक्तियां कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय पर हों और कॉलेजियम के फैसले सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाए जाएं। याचिका के मुताबिक एमओपी को “निष्पक्षता, निडरता, पारदर्शिता और शुचिता” सुनिश्चित करनी चाहिए।
लंबा इंतजार
एमओपी पहली बार जून 1999 में तैयार हुआ था। 16 अक्टूबर 2015 को एनजेएसी रद्द करने के बाद अदालत ने उसी साल दिसंबर में इसे दोबारा लिखने का काम केंद्र पर छोड़ दिया, और कॉलेजियम से मतभेदों के बीच बातचीत अटक गई। 2017 में न्यायमूर्ति ए.के. गोयल और यू.यू. ललित की पीठ ने कहा था कि यह मुद्दा “अनिश्चित काल तक लटका नहीं रह सकता”, लेकिन वह आदेश बाद में वापस ले लिया गया।