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रिफाइनिंग मार्जिन क्या है: होर्मुज़ संकट ने रिलायंस का मुनाफा 41% कैसे बढ़ाया
सितंबर तिमाही में ऑयल-टू-केमिकल्स कारोबार की कमाई 68% बढ़ने के बाद सोमवार को रिलायंस के शेयर 6% से ज़्यादा उछले। रिफाइनिंग मार्जिन क्या होता है, पश्चिम एशिया की जंग ने इसे इतना क्यों बढ़ाया, और यह क्यों टिकाऊ नहीं भी हो सकता।
संक्षेप में
रिफाइनरी की कमाई कच्चे तेल की खरीद कीमत और उससे बने पेट्रोल, डीज़ल व जेट ईंधन की बिक्री कीमत के बीच का अंतर है। प्रति बैरल यह अंतर 'क्रैक' के ज़रिये मापा जाता है, और यह ऐतिहासिक ऊंचाई पर है क्योंकि पश्चिम एशिया की जंग ने खाड़ी से ईंधन की आपूर्ति बिगाड़ दी है। जुलाई-सितंबर तिमाही में सिंगापुर का डीज़ल क्रैक औसतन 65.8 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो एक साल पहले से 252% ज़्यादा है। रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल्स कारोबार का एबिटडा 68% बढ़कर ₹25,203 करोड़ हो गया, और शेयरधारकों का मुनाफा 41% बढ़कर ₹25,548 करोड़ रहा। यह कमाई तंग ईंधन बाज़ार पर टिकी है, निर्यात पर विंडफॉल टैक्स इसका एक हिस्सा काटता है, और होर्मुज़ खुलने पर यह तेज़ी से घट सकती है।
रिफाइनिंग मार्जिन क्या है?
यह हर बैरल पर रिफाइनरी का हिस्सा है। रिफाइनरी कच्चा तेल खरीदती है, उसे पेट्रोल, डीज़ल, जेट ईंधन, नेफ्था और दूसरे उत्पादों में अलग करती है और बेचती है। इन उत्पादों की कीमत और कच्चे तेल की लागत के बीच का अंतर सकल रिफाइनिंग मार्जिन (जीआरएम) कहलाता है, जो आम तौर पर डॉलर प्रति बैरल में बताया जाता है।
कारोबारी इसे हर उत्पाद के ‘क्रैक’ से मापते हैं, यानी किसी एक ईंधन की कीमत और कच्चे तेल की कीमत का अंतर। डीज़ल क्रैक ऊंचा हो तो रिफाइनरी हर बैरल डीज़ल पर ज़्यादा कमाती है, चाहे कच्चे तेल का भाव कुछ भी कर रहा हो।
क्रैक अभी इतने ऊंचे क्यों हैं?
क्योंकि जंग ने ईंधन की आपूर्ति मांग से कहीं ज़्यादा तेज़ी से घटाई है। खाड़ी में बड़ी रिफाइनरियां हैं और दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा वहीं से गुज़रता है। टैंकरों पर हमलों, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में रुकावट और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के अस्थायी बंद होने से आपूर्ति तंग हो गई। रिलायंस के मुताबिक माल-भाड़ा 15 से 20 गुना बढ़ गया।
नतीजा ईंधन के अब तक के सबसे चौड़े अंतर के रूप में सामने आया। जुलाई-सितंबर तिमाही में सिंगापुर का डीज़ल (गैसऑयल) क्रैक औसतन 65.8 डॉलर प्रति बैरल रहा, 252% ज़्यादा। जेट ईंधन 59.3 डॉलर और पेट्रोल 24.9 डॉलर रहा। कच्चा तेल भी चढ़ा, डेटेड ब्रेंट औसतन 97 डॉलर प्रति बैरल, यानी 40.6% ऊपर, लेकिन ईंधन की कीमतें उससे तेज़ी से, 50 से 78% बढ़ीं। दुनिया में तेल की मांग असल में 34 लाख बैरल रोज़ाना घटी; तंगी आपूर्ति में थी।
रिलायंस के नतीजों में यह कैसे दिखा?
रिलायंस गुजरात के जामनगर में दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग परिसरों में से एक चलाती है और अपने ईंधन का बड़ा हिस्सा विदेश बेचती है। उसके ऑयल-टू-केमिकल्स (ओ2सी) कारोबार, जिसमें रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स आते हैं, ने सितंबर तिमाही में ₹25,203 करोड़ का एबिटडा कमाया, जबकि एक साल पहले यह ₹15,008 करोड़ और जून तिमाही में ₹17,010 करोड़ था। इसका मार्जिन 9.3% से बढ़कर 10.9% हो गया।
चेयरमैन मुकेश अंबानी ने कहा, “इस तिमाही हमारे ओ2सी कारोबार ने खास तौर पर मज़बूत प्रदर्शन किया, जिसकी अगुवाई तंग ईंधन बाज़ार ने की।” कंपनी को केमिकल्स की ऊंची कीमतों का भी फायदा मिला, पॉलिएस्टर चेन का मार्जिन तीन साल के उच्च स्तर पर रहा।
समूह की बढ़त का ज़्यादातर हिस्सा इसी एक कारोबार से आया। समूह का एबिटडा 24% बढ़कर ₹62,409 करोड़ रहा और शेयरधारकों का मुनाफा 41% बढ़कर ₹25,548 करोड़ हो गया, जबकि रिलायंस रिटेल का मुनाफा घटा। नतीजों के बाद पहले कारोबारी दिन, सोमवार को, शेयर 6.22% तक चढ़कर ₹1,237.30 पर पहुंचा।
रिलायंस का ऑयल-टू-केमिकल्स कारोबार, जुलाई-सितंबर 2026
- ₹2.32 लाख करोड़ राजस्वएक साल पहले से 44.2% ज़्यादा
- ₹25,203 करोड़ एबिटडाएक साल पहले से 68% ज़्यादा
- 10.9% एबिटडा मार्जिनएक साल पहले 9.3%
- ₹1.04 लाख करोड़ निर्यातएक साल पहले से 46.9% ज़्यादा
क्या सरकार इस अप्रत्याशित कमाई पर टैक्स नहीं लेती?
आंशिक रूप से। मार्च में केंद्र ने ईंधन निर्यात पर विंडफॉल टैक्स फिर लगाया। यह विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) पहली बार 2022 में लगा था और दिसंबर 2024 में हटा था। 26 मार्च से यह डीज़ल पर ₹21.50 और जेट ईंधन पर ₹29.50 प्रति लीटर से शुरू हुआ, हर पखवाड़े इसकी समीक्षा होती है, और 3 अगस्त से यह डीज़ल पर ₹24 और जेट ईंधन पर ₹22 प्रति लीटर था। मकसद ईंधन को देश में रखना और अतिरिक्त मुनाफे का कुछ हिस्सा वापस लेना है।
लेकिन यह शुल्क रिलायंस के सारे निर्यात पर लागू नहीं होता। जामनगर में घरेलू बाज़ार के लिए 3.3 करोड़ टन सालाना की एक रिफाइनरी है और विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) में 3.52 करोड़ टन की सिर्फ निर्यात वाली इकाई। राजस्व विभाग के संयुक्त सचिव जैनेंद्र सिंह कंधारी ने अप्रैल में कहा था, “विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क और अतिरिक्त उत्पाद शुल्क एसईज़ेड रिफाइनरियों पर लागू नहीं होते।” फिर भी रिलायंस ने इस शुल्क को तिमाही पर भारी पड़ी लागतों में गिनाया है।
भारत के लिए यह अच्छा है या बुरा?
यह इस पर निर्भर है कि आप कहां खड़े हैं। ऊंचे क्रैक का मतलब है निर्यात करने वाली रिफाइनरियों का बड़ा मुनाफा और सरकार को ज़्यादा टैक्स। इसका मतलब यह भी है कि भारत आयातित तेल के लिए ज़्यादा चुकाता है: अप्रैल-सितंबर में देश का कच्चे तेल का आयात बिल 46% बढ़कर 90.6 अरब डॉलर हो गया। ज़्यादातर घरों के लिए पेट्रोल पंप की कीमतें सरकारी तेल कंपनियां और केंद्र के टैक्स तय करते हैं, इसीलिए सरकार ने मार्च में पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क ₹10 प्रति लीटर घटाया था।
क्या ये मार्जिन टिकेंगे?
सिर्फ तब तक, जब तक आपूर्ति तंग रहेगी। ईरान का कहना है कि अगर वॉशिंगटन उसकी शर्तें माने तो वह दो दिन में होर्मुज़ खोल सकता है, और कतर में बातचीत जारी रहने के बीच सोमवार को ब्रेंट करीब 112 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। होर्मुज़ के सच में खुलने से खाड़ी का ईंधन बाज़ार में लौटेगा और वह अंतर सिकुड़ेगा जिसने इस तिमाही को खास बनाया। रिलायंस के शेयरधारकों के लिए सितंबर तिमाही नया सामान्य कम, और इस बात का पैमाना ज़्यादा है कि दुनिया में ईंधन की कमी होने पर कंपनी कितना कमाती है।
मूल दस्तावेज़
- Media Release: RIL Q2 FY2026-27 Financial and Operational PerformanceReliance Industries, 30 अक्टूबर 2026