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भारतअदालत

ब्रिटेन का तलाक और नागरिकता बहुविवाह के मुकदमे से नहीं बचा सकते: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने आंध्र प्रदेश के उस व्यक्ति के खिलाफ बहुविवाह की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसने ब्रिटेन में तलाक लेकर वहीं दूसरी शादी की थी। पहली पत्नी ने वह तलाक कभी स्वीकार नहीं किया था।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में वकील (फ़ाइल फ़ोटो)
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के गलियारे में वकील (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एन श्रीधर रेड्डी के खिलाफ बहुविवाह की कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।
  2. पीठ ने कहा कि असाध्य टूटन के आधार पर ब्रिटेन में मिला तलाक भारत में लागू नहीं होता।
  3. अदालत ने कहा कि बाद में नागरिकता बदलने से कायम शादी के कानूनी नतीजे खत्म नहीं होते।

ब्रिटिश नागरिकता लेने, ब्रिटेन में तलाक पाने और वहीं दूसरी शादी करने वाला व्यक्ति भारत में बहुविवाह के मुकदमे से नहीं बच सकता। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह फैसला दिया।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने एन श्रीधर रेड्डी की अपील खारिज कर दी। रेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पहली पत्नी की ओर से दायर बहुविवाह की कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया गया था। फैसला न्यायमूर्ति मिश्रा ने लिखा।

रेड्डी की पहली शादी भारत में हिंदू रीति से हुई थी। ब्रिटेन का नागरिक बनने के बाद वहां की एक अदालत ने शादी के असाध्य रूप से टूट जाने के आधार पर उन्हें तलाक दे दिया और उन्होंने ब्रिटेन में दूसरी शादी कर ली। इसके बाद पहली पत्नी ने भारत में अदालत का दरवाजा खटखटाया।

ब्रिटेन का तलाक क्यों नहीं टिका

पीठ ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 के तहत यह विदेशी डिक्री भारत में लागू नहीं होती। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में असाध्य टूटन तलाक का आधार नहीं है, और पत्नी ने कभी ब्रिटिश अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया था। अदालत के शब्दों में, “विदेशी तलाक की डिक्री भारत के मौजूदा वैवाहिक कानून के खिलाफ पारित की गई थी।”

अदालत ने कहा कि जब यह डिक्री भारत में मान्य ही नहीं है, तो रेड्डी इसके सहारे भारतीय दंड संहिता की धारा 494 से नहीं बच सकते। यह धारा जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी को अपराध मानती है।

जजों ने यह दलील भी खारिज कर दी कि मामला सिर्फ दूसरी शादी की जगह से तय होना चाहिए। पहली शादी भारत में हुई थी, इसलिए बहुविवाह की जांच सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं रह सकती।

नए पासपोर्ट की दलील पर पीठ ने साफ कहा कि “कायम शादी से निकलने वाले कानूनी नतीजे बाद में राष्ट्रीयता बदल लेने से खत्म नहीं किए जा सकते।”

अब रेड्डी के खिलाफ बहुविवाह का मुकदमा आंध्र प्रदेश में आगे चलेगा।