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दो बच्चों का नियम अब प्रासंगिक नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने 2003 का जावेद फैसला बड़ी पीठ को भेजा
तीसरे बच्चे के बाद अयोग्य ठहराई गई महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच की याचिका पर अदालत ने कहा कि देश की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है, और 23 साल पहले बरकरार रखे गए कानून पर फिर विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को सौंप दिया।

मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो से ज्यादा बच्चों पर सजा देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।
- दो जजों की पीठ ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) का फैसला बड़ी पीठ को भेजा।
- देश की कुल प्रजनन दर 2003 के 3 से घटकर 1.9 रह गई है, जो 2.1 की प्रतिस्थापन दर से कम है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, और पंचायत चुनावों के लिए ऐसे नियम को बरकरार रखने वाले अपने 2003 के फैसले पर फिर से विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को सौंप दिया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि तब से देश बदल चुका है। फैसला खुली अदालत में जस्टिस नरसिम्हा ने सुनाया। पीठ ने कहा, “हमारी पक्की राय है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।”
दो जजों की पीठ तीन जजों के फैसले को पलट नहीं सकती, इसलिए अदालत ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य का फैसला बड़ी पीठ को भेजा। पीठ ने कहा, “इसी वजह से हमें कार्यवाही रोकनी पड़ी है, हमने मामला बड़ी पीठ को भेज दिया है।” जावेद मामले में अदालत ने हरियाणा पंचायती राज कानून की उस शर्त को सही ठहराया था जो दो से ज्यादा बच्चों वालों को चुनाव लड़ने से रोकती है।
एक सरपंच और उनका तीसरा बच्चा
यह मामला महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले ने उठाया था। तीसरे बच्चे के जन्म के बाद उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य ठहराया गया था। यह शर्त 13 सितंबर 2000 से इस कानून में जुड़ी थी।
बुलढाणा के अपर कलेक्टर ने अक्टूबर 2024 में उन्हें अयोग्य ठहराया, अमरावती संभाग के अपर आयुक्त ने उनकी अपील खारिज की और बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी फैसला बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई और इस साल 4 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखा।
प्रतिस्थापन स्तर से नीचे प्रजनन दर
फैसले के केंद्र में देश की घटती जन्म दर है। जावेद फैसले के समय कुल प्रजनन दर 3 थी। पीठ ने कहा कि अब यह 1.9 है, जो 2.1 की प्रतिस्थापन दर से कम है। पीठ ने कहा, “इसलिए जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।”
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र रुक्मिणी बोबडे ने अदालत को बताया था कि सात राज्य दो बच्चों का नियम खत्म कर चुके हैं और 15 राज्यों में यह कभी था ही नहीं। असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड में यह नियम अब भी लागू है। याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रतीक बोम्बार्डे पेश हुए।
बड़ी पीठ का फैसला आने तक जिन राज्यों में दो बच्चों का नियम है, वहां यह लागू रहेगा। बड़ी पीठ इस मामले को कब सुनेगी, इसकी तारीख अभी तय नहीं हुई है।