समझिएअदालत
दो-बच्चा नियम क्या है, 2003 के जावेद फैसले में क्या कहा गया था और सुप्रीम कोर्ट अब उस पर दोबारा विचार क्यों चाहता है
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीसरे बच्चे पर सज़ा देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, और अपने ही 2003 के फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। यह नियम क्या है, कहां अब भी लागू है, और आगे क्या होगा।
संक्षेप में
दो-बच्चा नियम के तहत दो से ज़्यादा जीवित बच्चों वाले लोग पंचायत और कुछ राज्यों में नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते। जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) की तीन जजों की पीठ ने इस नियम को जनसंख्या नियंत्रण का उचित उपाय मानकर सही ठहराया था और कहा था कि चुनाव लड़ने का अधिकार केवल कानूनी अधिकार है। 4 नवंबर 2026 को दो जजों की पीठ ने कहा कि घटती प्रजनन दर ने ऐसे कानूनों को अप्रासंगिक बना दिया है, लेकिन बड़ी पीठ का फैसला पलटने का अधिकार न होने से उसने जावेद फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। बड़ी पीठ का फैसला आने तक यह नियम उन छह राज्यों में लागू रहेगा जहां यह अब भी है।
दो-बच्चा नियम क्या है?
यह ऐसा नियम है जो दो से ज़्यादा जीवित बच्चों वाले लोगों को स्थानीय चुनाव लड़ने से रोकता है।
1990 के दशक में कई राज्यों ने इसे अपने पंचायत कानूनों में जोड़ा, और कुछ ने इसे नगर निकायों पर भी लागू किया। तीसरे बच्चे वाला व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता, और पद पर बैठे सदस्य के तीसरा बच्चा होने पर उसे पद से अयोग्य ठहराया जा सकता है। हरियाणा के 1994 के पंचायती राज अधिनियम में ऐसा प्रावधान था, और अविभाजित आंध्र प्रदेश के 1994 के पंचायत कानून में भी। महाराष्ट्र ने इसे 2000 में अपने ग्राम पंचायत अधिनियम में जोड़ा।
इसके पीछे सोच जनसंख्या नियंत्रण की थी: गांवों और कस्बों का नेतृत्व करने वालों से परिवार के आकार के मामले में मिसाल बनने की उम्मीद की गई। कुछ राज्य सरकारी नौकरियों में भी ऐसी शर्त लगाते हैं। मसलन राजस्थान दो से ज़्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों को पुलिस कांस्टेबल पदों के लिए अयोग्य मानता है।
जावेद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
कोर्ट ने इस नियम को संवैधानिक ठहराया था। 30 जुलाई 2003 को जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में तीन जजों, जस्टिस आर सी लाहोटी, अशोक भान और अरुण कुमार की पीठ ने हरियाणा कानून की धारा 175(1)(q) और 177(1) को दी गई चुनौती सुनी।
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि यह रोक मनमानी है और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार, और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है, क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ पुरुष को एक से ज़्यादा पत्नी की इजाज़त देता है। कोर्ट ने तीनों दलीलें खारिज कर दीं। उसने कहा कि दो बच्चों और उससे ज़्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों का बंटवारा उचित वर्गीकरण है, जो जनसंख्या नियंत्रण के कानून के मकसद से जुड़ा है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पंचायत चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कानून से मिला अधिकार है, इसलिए विधायिका उस पर शर्तें लगा सकती है। धर्म के सवाल पर उसने कहा कि अनुच्छेद 25 केवल धर्म के अभिन्न अंग वाली प्रथाओं की रक्षा करता है, और एक से ज़्यादा पत्नी रखना ऐसी प्रथा नहीं है। इसके बाद भी जावेद फैसले का पालन होता रहा, 2024 में भी, जब तीन जजों की एक और पीठ ने राजस्थान के पुलिस भर्ती नियम को सही ठहराया।
किन राज्यों में यह नियम अब भी है?
न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) के मुताबिक छह राज्यों में। अगस्त की सुनवाई में अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे ने पीठ को राज्यों के कानूनों का संकलन सौंपा। इसके अनुसार सात राज्य दो-बच्चा नियम हटा चुके हैं और 15 राज्यों में यह कभी था ही नहीं। यह नियम असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड में बचा है।
नियम हटाने का सिलसिला हाल में और ज़्यादातर दक्षिण में चला है। गिरती जन्म दर से चिंतित आंध्र प्रदेश ने नवंबर 2024 में विधेयक पारित कर पंचायत और नगर निकाय कानूनों से यह नियम हटा दिया। जनवरी 2026 में तेलंगाना ने भी ऐसा किया। इस साल मार्च में राजस्थान सरकार ने राज्य की प्रजनन दर में गिरावट का हवाला देकर अपना 30 साल पुराना नियम खत्म करने के लिए विधेयक पेश किया।
दो-बच्चा नियम: शुरुआत से ढलान तक
- 1994हरियाणा और अविभाजित आंध्र प्रदेश ने दो से ज़्यादा बच्चों वालों को पंचायत चुनाव से रोका
- सितंबर 2000महाराष्ट्र ने ग्राम पंचायत अधिनियम में यह रोक जोड़ी
- जुलाई 2003सुप्रीम कोर्ट ने जावेद मामले में हरियाणा का नियम सही ठहराया
- नवंबर 2024आंध्र प्रदेश ने नियम हटाने के विधेयक पारित किए
- जनवरी 2026तेलंगाना विधानसभा ने नियम हटाने का विधेयक पारित किया
- 4 नवंबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने जावेद फैसला बड़ी पीठ को भेजा
मामला अभी फिर क्यों उठा?
एक सरपंच और जन्म दर में तेज़ गिरावट की वजह से। महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले को तीसरे बच्चे के जन्म के बाद अयोग्य ठहरा दिया गया था। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फैसला बरकरार रखा और उन्होंने अपील की।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे ने उनके मामले में खुद इस नियम पर सवाल उठाया। जुलाई की सुनवाई में उन्होंने इसे “बेकार” नीति कहा था। बुधवार को पीठ ने कहा कि 2003 के बाद देश बदल चुका है: भारत की कुल प्रजनन दर, जो तब 3 थी, अब 1.9 है, जो 2.1 की प्रतिस्थापन दर से नीचे है, यानी वह स्तर जिस पर आबादी स्थिर रहती है। पीठ ने कहा, “हमारी दृढ़ राय है कि दो से ज़्यादा बच्चे होने पर सज़ा देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।”
बड़ी पीठ को मामला भेजने का क्या मतलब है?
यह कि जावेद फैसले को अब बड़ी पीठ ही पलट सकती है। सुप्रीम कोर्ट में छोटी पीठ बड़ी पीठ के फैसले से बंधी होती है। जावेद फैसला तीन जजों ने दिया था, इसलिए दो जजों की पीठ कितनी भी असहमत हो, उसे रद्द नहीं कर सकती। वह अपनी आपत्तियां दर्ज कर सवाल ऊपर भेज सकती है, और उसने यही किया।
अब कागज़ात भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास जाएंगे, जो तय करेंगे कि तीन से ज़्यादा जजों की पीठ कब बनेगी। वह पीठ जावेद फैसले को पलट सकती है, बरकरार रख सकती है, या किसी सीमित आधार पर मामला निपटा सकती है। दोनों जजों ने कहा कि इसी वजह से उन्हें इंगले के मामले की कार्यवाही रोकनी पड़ी है।
तब तक क्या बदलेगा?
फिलहाल ज़मीन पर कुछ नहीं। जावेद फैसला अब भी लागू कानून है, और जिन छह राज्यों में दो-बच्चा रोक है, वहां वह बनी रहेगी। इन राज्यों में तीसरे बच्चे वाले व्यक्ति को अब भी पंचायत या नगर निकाय चुनाव से बाहर रखा जा सकता है।
बदली है तो दिशा। देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुनाए गए फैसले में कह दिया है कि जिस देश की जन्म दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है, वहां यह नियम अब फिट नहीं बैठता। इससे बाकी राज्यों को साफ संकेत मिलता है, और उनके कानूनों के तहत अयोग्य ठहराए गए लोगों को अदालत जाने का आधार भी। बड़ी पीठ की सुनवाई की कोई तारीख तय नहीं हुई है।
मूल दस्तावेज़
- Javed & Ors v State of Haryana & Ors, judgment of 30 July 2003Supreme Court of India, 30 जुलाई 2003