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राजनीतिअदालत

'संविधान एक सतत जिम्मेदारी है', आंबेडकर सम्मेलन में वकीलों से बोले सीजेआई सूर्यकांत

भारत मंडपम में देश के मुख्य न्यायाधीश ने महाड़ जल-संघर्ष से अनुच्छेद 32 तक की कड़ी समझाई और युवा वकीलों से कहा कि वकील का खर्च न उठा पाने वालों के लिए समय निकालें।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीसंपादन: पुनीत पनेसरप्रकाशित
गांधी न्यूज़ ग्राफ़िक: महाड़ संघर्ष के तीन सबक
गांधी न्यूज़ ग्राफ़िक: महाड़ संघर्ष के तीन सबकग्राफ़िक: गांधी न्यूज़

मुख्य बातें

  1. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान का पाठ पूरा है, पर उसके आदर्शों में जान फूंकने का काम एक पीढ़ी से दूसरी को मिलता है।
  2. उन्होंने महाड़ संघर्ष से तीन सबक गिनाए: प्रस्ताव से मिला अधिकार वापस लिया जा सकता है, अधिकार को उपचार चाहिए और न्याय में देर हो सकती है।
  3. उन्होंने युवा वकीलों से कहा कि वकील का खर्च न उठा पाने वालों के लिए समय निकालें।

देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुक्रवार को वकीलों के एक जमावड़े में कहा कि “संविधान एक सतत जिम्मेदारी है” और उसका पाठ भले पूरा हो, पर उसके आदर्शों में जान फूंकने का काम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता है।

वह नई दिल्ली के भारत मंडपम में एससी, एसटी और ओबीसी अधिवक्ता संघ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि थे। सम्मेलन का विषय भारत रत्न डॉ. बी आर आंबेडकर का जीवन, संघर्ष और संवैधानिक विरासत था। मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी बिरादरी से कहा कि इस विरासत को औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, कार्रवाई का आह्वान माना जाए।

बार में आंबेडकर

जस्टिस सूर्यकांत ने शुरुआत वकील आंबेडकर से की, जो कानून मंत्री और संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनने से पहले वकालत करते थे। उन्होंने याद दिलाया कि आंबेडकर को स्कूल में पानी तक नहीं मिलता था। यह बहिष्कार कानून से नहीं, रीति-रिवाज से लागू होता था, और आंबेडकर शिक्षा तथा कानूनी अधिकारों को इससे निकलने का रास्ता मानते थे।

महाड़ के सबक

मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन का बड़ा हिस्सा महाड़ के जल-टंकी संघर्ष को दिया। 1923 में बॉम्बे विधान परिषद के एक प्रस्ताव में कहा गया कि सार्वजनिक जलस्रोत दलित वर्गों के लिए खुले हों और महाड़ नगरपालिका ने अपना चवदार तालाब सबके लिए खोल दिया। विरोध इतना तीखा था कि अधिकार कागज पर ही रह गया।

आंबेडकर अपने समर्थकों के साथ तालाब पर गए और उन्होंने उसका पानी पिया। कुछ ही महीनों में दबाव में नगरपालिका ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। फिर दीवानी मुकदमा चला, अदालत ने आंबेडकर और उनके अनुयायियों को तालाब पर जाने से रोक दिया और 1937 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ अपील खारिज कर दी।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आंबेडकर ने तीन सबक लिए: प्रस्ताव से मिला अधिकार उतनी ही आसानी से वापस लिया जा सकता है, अधिकार उतना ही मजबूत है जितना उसका उपचार, और न्यायसंगत मांग को भी अदालत में सफल होने में बहुत देर लग सकती है। उन्होंने कहा कि पहले दो संविधान में लिख दिए गए। तीसरा आज भी साझा जिम्मेदारी है।

अनुच्छेद 32 और न्याय तक पहुंच

मुख्य न्यायाधीश के मुताबिक उपचार वाले सबक का जवाब अनुच्छेद 32 में मिला, जो नागरिक को मौलिक अधिकारों के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का हक देता है। आंबेडकर ने इसे “संविधान की आत्मा और उसका हृदय” कहा था। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नागरिक के अधिकार उस सत्ता की मर्जी पर नहीं टिकने चाहिए, जिसे उसे चुनौती देनी पड़ सकती है।

उन्होंने चेताया कि जो अधिकार किसी की पहुंच, समझ या हैसियत से बाहर हो, वह “केवल कागज पर अधिकार” रह जाता है। अधिकारों को असली बनाना अब बेंच और बार का काम है।

बंधुत्व और सामाजिक खाई

जस्टिस सूर्यकांत ने आंबेडकर की यह बात दोहराई कि बंधुत्व “लोकतंत्र का ही दूसरा नाम” है, यानी लोकतंत्र उन नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार में बसता है जो एक-दूसरे से बराबरी पर मिलते हैं। उन्होंने संविधान सभा में आंबेडकर के समापन भाषण को भी याद किया, जिसमें चेतावनी थी कि सामाजिक लोकतंत्र के आधार के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता।

उन्होंने कहा कि भारत ने राजनीतिक बराबरी पा ली है, पर सामाजिक और आर्थिक बराबरी अभी उसके बराबर नहीं हुई। कानूनी बदलाव और सामाजिक बदलाव के बीच की दूरी को उन्होंने कानून की घड़ी और “समाज की उस घड़ी” का फासला बताया, “जो उतनी ही तेज चलती है जितनी तेज अंतरात्मा चलती है”।

युवा वकीलों से अपील

अंत में उन्होंने बार के युवा सदस्यों से कहा कि वे “हमेशा उन लोगों के लिए समय निकालें जो वकील का खर्च नहीं उठा सकते”। उनके मुताबिक आंबेडकर को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि संघ पूरे बार में एकता बनाए।