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ओबीसी क्रीमी लेयर: माता-पिता का पीएसयू वेतन अकेले उम्मीदवार को बाहर क्यों नहीं कर सकता

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर तय करने के तरीके पर अपने मार्च के फैसले को नरम करने से इनकार कर दिया। नियम क्या कहता है, सरकार ने दो दशक तक इसे कैसे पढ़ा, और इस साल के सिविल सेवा बैच के लिए क्या बदलेगा।

संपादकीय डेस्क सेसंपादन: पुनीत पनेसरप्रकाशित

संक्षेप में

क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का वह संपन्न हिस्सा है जिसे केंद्र की नौकरियों में 27% ओबीसी आरक्षण से बाहर रखा जाता है। 1993 के सरकारी आदेश के तहत आय की जांच में माता-पिता का वेतन नहीं जोड़ा जाता; वेतनभोगी परिवारों के लिए माता-पिता के पद का दर्जा मायने रखता है। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2004 का एक सरकारी पत्र पीएसयू और निजी क्षेत्र के वेतन को आय मानकर इसे नहीं बदल सकता, और 6 नवंबर 2026 को उसने फैसले को सीमित करने की केंद्र की अर्जी ठुकरा दी। अब 2025 की सिविल सेवा परीक्षा के ओबीसी उम्मीदवारों का सेवा आवंटन इसी फैसले के आधार पर होगा।

क्रीमी लेयर क्या है?

यह अन्य पिछड़ा वर्ग का वह संपन्न हिस्सा है जिसे ओबीसी आरक्षण से बाहर रखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंद्रा साहनी मामले में यह विचार दिया था, जब उसने केंद्र की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण को सही ठहराया, लेकिन कहा कि इसका फायदा उन परिवारों को नहीं मिलना चाहिए जो पहले ही आगे बढ़ चुके हैं।

सरकार ने इसे 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन के जरिए नियमों में बदला। यह दो तरह से काम करता है। सरकार में ग्रुप ए या ग्रुप बी पदों पर सीधे भर्ती हुए अधिकारियों के बच्चे माता-पिता के पद के आधार पर बाहर होते हैं। बाकी सबके लिए आय और संपत्ति की जांच है, जिसकी सीमा वर्षों में बढ़ती रही है और अब ₹8 लाख सालाना है।

पीएसयू और निजी क्षेत्र के परिवारों के लिए यह कैसे काम करना था?

माता-पिता के पद के दर्जे से, जब उसका मिलान किसी सरकारी पद से हो जाए। 1993 के आदेश में कहा गया था कि सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों, बीमा कंपनियों और विश्वविद्यालयों में ग्रुप ए या ग्रुप बी के “समकक्ष या तुलनीय” पदों पर काम करने वालों पर भी यही दर्जे वाले नियम लागू होंगे।

यह मिलान कभी पूरा नहीं हुआ। तब तक के लिए आदेश ने आय की जांच लागू करने को कहा। लेकिन उसी आदेश में एक साफ छूट थी: परिवार की कुल सालाना आय गिनते समय वेतन और खेती की जमीन से होने वाली आय नहीं जोड़ी जाएगी।

सरकार ने इसके बजाय क्या किया?

उसने वेतन को गिनना शुरू कर दिया। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के 14 अक्टूबर 2004 के एक पत्र में कहा गया कि जहां पदों का मिलान नहीं हुआ है, वहां माता-पिता के वेतन और अन्य आय को अलग-अलग देखा जाएगा। अगर इनमें से कोई भी लगातार तीन साल तक सीमा से ऊपर गया, जो तब ₹2.5 लाख थी, तो उम्मीदवार क्रीमी लेयर में माना जाएगा।

व्यवहार में इसका मतलब था कि पीएसयू इंजीनियर का बच्चा सिर्फ वेतन के आधार पर बाहर हो सकता था, जबकि सरकारी कर्मचारी के बच्चे को अब भी माता-पिता के पद के दर्जे से आंका जाता था। एक संसदीय समिति ने बाद में कहा कि इस पत्र ने स्थिति साफ करने के बजाय और उलझा दी।

माता-पिता की नौकरी को कैसे देखा गया

1993 के आदेश के तहत2004 के पत्र के तहत
सरकारी अधिकारी का बच्चा
पद के दर्जे से
पद के दर्जे से
पीएसयू या निजी कर्मचारी का बच्चा
दर्जे से, सरकारी पद से मिलान के बाद
वेतन को आय में गिना गया
माता-पिता का वेतन
आय की जांच से बाहर
परिवार को सीमा से ऊपर ले जा सकता है

अदालत कौन गया, और मार्च में क्या फैसला हुआ?

वे सिविल सेवा उम्मीदवार जिन्हें माता-पिता के वेतन की वजह से ओबीसी लाभ नहीं मिला। इनमें 2012 की परीक्षा के ओबीसी उम्मीदवार रोहित नाथन थे, जिनके पिता एक निजी आईटी कंपनी में काम करते थे, जी. बाबू थे, जिनके पिता नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन में इंजीनियर थे, और 2015, 2016 और 2017 की परीक्षाओं के वे उम्मीदवार थे जिनके माता-पिता पीएसयू या बैंकों में काम करते थे।

वे केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और मद्रास, दिल्ली व केरल हाईकोर्ट में जीते। 11 मार्च 2026 को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र की अपीलें खारिज कर दीं। पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस महादेवन ने कहा कि “एक साधारण सरकारी पत्र” 1993 के आदेश को रद्द, पलट या उसकी जगह नहीं ले सकता, और माता-पिता के पद को देखे बिना सिर्फ आय से क्रीमी लेयर तय करना “कानून में बिल्कुल टिकाऊ नहीं” है।

अदालत ने कहा कि पीएसयू या निजी कर्मचारियों के बच्चों के साथ सरकारी कर्मचारियों के बच्चों से अलग बर्ताव अनुच्छेद 14, 15 और 16 में दी गई समानता की गारंटी का उल्लंघन होगा। क्रीमी लेयर को बाहर रखने का उद्देश्य “एक ही सामाजिक वर्ग के बराबर स्थिति वाले सदस्यों के बीच कृत्रिम भेद पैदा करना नहीं है”। अदालत ने सरकार को उम्मीदवारों के दावों पर दोबारा विचार करने और जरूरत हो तो उनके लिए अतिरिक्त (सुपरन्यूमरेरी) पद बनाने के लिए छह महीने दिए।

केंद्र दोबारा अदालत क्यों गया?

क्योंकि फैसला 2025 के सिविल सेवा नतीजों के पांच दिन बाद आया। संघ लोक सेवा आयोग ने 6 मार्च को अंतिम नतीजे घोषित कर 958 उम्मीदवारों की सिफारिश की थी, और उनका सेवा आवंटन बाकी था।

अपनी अर्जी में केंद्र ने कहा कि वह पुनर्विचार नहीं मांग रहा। उसने अनुरोध किया कि फैसला सिर्फ आगे से लागू हो, और चेताया कि 2016 से 2025 के बीच पुराने तरीके से 5.69 लाख से ज्यादा आरक्षित पद भरे गए, जिनमें 3.70 लाख ओबीसी पद थे, और 18 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश 1993 के आदेश का पालन करते हैं। उसने पीएसयू, बैंकों और निजी संस्थाओं के पदों का सरकारी पदों से मिलान करने के लिए दो साल भी मांगे। अदालत ने 1 सितंबर को अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया और 24 सितंबर को आदेश सुरक्षित रख लिया।

नई दिल्ली में यूपीएससी मुख्यालय धौलपुर हाउस (फ़ाइल फ़ोटो)
नई दिल्ली में धौलपुर हाउस, संघ लोक सेवा आयोग का मुख्यालय, जिसने मार्च के फैसले से पांच दिन पहले 2025 के सिविल सेवा नतीजे घोषित किए।Ramesh lalwani / Wikimedia

6 नवंबर को अदालत ने क्या कहा?

उसने अपना फैसला बदलने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि 1993 के आदेश और 2004 के पत्र की उसकी व्याख्या पर दोबारा विचार नहीं हो सकता और अनुच्छेद 141 के तहत यह सभी प्राधिकरणों पर बाध्यकारी है। उसने निर्देश दिया कि फैसले में बताया गया क्रीमी लेयर का सिद्धांत ही 2025 की परीक्षा के ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर लागू होगा।

अदालत ने एक सीमा भी खींची। जो चयन, नियुक्तियां और आवंटन पूरे हो चुके हैं, वे दोबारा नहीं खोले जाएंगे, और दूसरे कर्मचारियों की वरिष्ठता नहीं छेड़ी जाएगी। लंबित मिलते-जुलते मामले उनके गुण-दोष पर तय होंगे। दो साल की मांग पर अदालत ने कहा कि एक समान व्यवस्था बनाना कार्यपालिका और विधायिका का काम है, और पालन के लिए दो महीने और दिए।

विवाद कैसे आगे बढ़ा

  1. 8 सितंबर 1993सरकारी आदेश ने क्रीमी लेयर के नियम तय किए, वेतन को आय की जांच से बाहर रखा
  2. 14 अक्टूबर 2004डीओपीटी के पत्र ने पीएसयू और निजी वेतन गिनना शुरू किया
  3. 31 अगस्त 2017मद्रास हाईकोर्ट ने उम्मीदवारों के पक्ष में फैसला दिया; दिल्ली और केरल हाईकोर्ट ने भी
  4. 11 मार्च 2026सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपीलें खारिज कीं
  5. 1 सितंबर 2026अदालत ने अपने फैसले पर रोक से इनकार किया
  6. 6 नवंबर 2026अदालत ने फैसला बदलने की केंद्र की अर्जी ठुकराई

अब आगे क्या?

सरकार को 2025 बैच का सेवा आवंटन नई व्याख्या के तहत पूरा करना होगा। जिन ओबीसी उम्मीदवारों के माता-पिता पीएसयू, बैंक या निजी क्षेत्र में नौकरी करते हैं, उन्हें उन पदों के दर्जे से आंका जाएगा, वेतन से नहीं।

बड़ा काम, यानी सरकार के बाहर के हजारों पदों का ग्रुप ए और ग्रुप बी पदों से मिलान, अब भी बाकी है। जब तक यह नहीं होता, नवंबर 2026 की स्थिति में, विभागों और न्यायाधिकरणों को सुप्रीम कोर्ट के मार्च के फैसले को ही लागू करना होगा।

मूल दस्तावेज़