समझिएबिजली
बीबीएमबी बिजली बंटवारा: हिमाचल ने 45 साल का बकाया कैसे जीता, जो बिजली में मिलेगा
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा से कहा है कि वे भाखड़ा और ब्यास परियोजनाओं का हिमाचल का बकाया 20 साल में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देकर चुकाएं। ये बांध किसके हैं, हिमाचल का हिस्सा क्यों है, और क्या अब भी अनसुलझा है।
संक्षेप में
भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड (बीबीएमबी) भाखड़ा, पौंग और देहर पनबिजली परियोजनाएं चलाता है, जिनकी बिजली पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ में बंटती है। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुराने पंजाब का उत्तराधिकारी राज्य होने के नाते हिमाचल को 1966 से 7.19% हिस्सा मिलना चाहिए, लेकिन पंजाब और हरियाणा ने 1966 से 2011 तक का बकाया कभी नहीं चुकाया। अब अदालत ने इसे नकद के बजाय बिजली में निपटा दिया है: हिमाचल को 20 साल में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी।
बीबीएमबी क्या है?
यह सतलुज और ब्यास पर बने बड़े बांधों और बिजलीघरों को चलाने वाली केंद्रीय संस्था है। भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत बना, जिसने पुराने पंजाब राज्य का पुनर्गठन किया। अक्टूबर 1967 में इसने भाखड़ा-नंगल परियोजना संभाली और 1976 में ब्यास परियोजनाएं जुड़ने पर इसे मौजूदा नाम मिला।
आज यह सतलुज पर भाखड़ा बांध, ब्यास पर पौंग बांध, दोनों हिमाचल में, और ब्यास-सतलुज लिंक से चलने वाला देहर बिजलीघर चलाता है, जिनकी कुल क्षमता करीब 2,900 मेगावाट है। बोर्ड केंद्रीय बिजली मंत्रालय के तहत काम करता है, और इसका पानी व बिजली पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली और चंडीगढ़ को जाती है।
हिमाचल का इसमें हिस्सा क्यों है?
क्योंकि 1966 के पुनर्गठन ने उसे पुराने पंजाब का उत्तराधिकारी राज्य बनाया। उसका तर्क था कि पंजाब और हरियाणा की तरह उसे भी अविभाजित राज्य की बनाई परियोजनाओं में हिस्सा विरासत में मिला है। भाखड़ा और पौंग, दोनों बांध उसी की जमीन पर खड़े हैं।
तीन दशक तक यह दावा कहीं नहीं पहुंचा। 1996 में हिमाचल ने सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया, यानी ऐसा मामला जो एक राज्य दूसरे राज्यों या केंद्र के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में ला सकता है।
2011 में अदालत ने क्या तय किया?
उसने हिमाचल को 7.19% हिस्सा दिया, शुरू से लागू। 27 सितंबर 2011 के अपने डिक्री में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराधिकारी राज्यों के हिस्से तय किए: पंजाब 51.80%, हरियाणा 37.51%, हिमाचल 7.19% और चंडीगढ़ 3.50%, जबकि राजस्थान का अलग हिस्सा लगभग पहले जैसा रहा।
हिमाचल का हक भाखड़ा के लिए 1 नवंबर 1966 से, देहर के लिए नवंबर 1977 से और पौंग के लिए जनवरी 1978 से बना। 1 नवंबर 2011 से बीबीएमबी ने राज्य को मौजूदा बिजली में उसका हिस्सा देना शुरू किया। पुराना बकाया अलग मामला था।
बकाया 15 साल तक क्यों नहीं चुका?
क्योंकि राज्य इस पर सहमत नहीं हो पाए कि पुरानी बिजली की कीमत क्या हो। बिजली मंत्रालय के हिसाब से नवंबर 1966 से अक्टूबर 2011 के बीच हिमाचल को 13,066 मिलियन यूनिट नहीं मिली थीं, जिसे पंजाब और हरियाणा को लगभग 60:40 के अनुपात में चुकाना था। यूनिट को रुपये में बदलने के लिए प्रति यूनिट दर पर सहमति चाहिए थी, और कोई दर सबको मंजूर नहीं थी। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने जुलाई में राज्य का बकाया करीब ₹4,200 करोड़ बताया था।
गतिरोध तब टूटा जब केंद्र ने पैसे की बात छोड़ने का सुझाव दिया। 30 जुलाई 2026 की सुनवाई में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पीठ से कहा कि सिर्फ 1966 के कानून के भरोसे कभी समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा, “कुछ तो करना होगा।” प्रस्ताव के तहत हिमाचल को दोनों राज्यों का करीब ₹420 करोड़ का कर्ज और ₹400 करोड़ से ज्यादा की पूंजीगत लागत भी नहीं चुकानी थी।
हरियाणा सैद्धांतिक रूप से राजी हो गया। पंजाब ने आपत्ति की, ₹2.5 प्रति यूनिट की दर को बहुत ज्यादा बताया और कहा कि उसे करीब ₹2,000 करोड़ का नुकसान होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने साफ कहा: “अदालत का डिक्री है और उसका पालन होना चाहिए।”
अदालत ने अब क्या आदेश दिया है?
नकद के बिना निपटारा: 20 साल में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली। पंजाब और हरियाणा नकद देने के बजाय बीबीएमबी परियोजनाओं से बिजली देंगे। पंजाब चाहता था कि यूनिट 30 साल में दी जाएं, हिमाचल 10 साल चाहता था और अटॉर्नी जनरल ने 15 साल सुझाए थे; अदालत ने 20 साल चुने।
यानी औसतन हर साल करीब 600 मिलियन यूनिट। महाधिवक्ता अनूप कुमार रतन ने कहा कि राज्य यह बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच लेगा, जब बाजार में दाम आम तौर पर ऊंचे रहते हैं, ताकि वह अपनी अतिरिक्त बिजली बेहतर दाम पर बेच सके।
हिमाचल के लिए इसकी कीमत क्या है?
दाम के हिसाब से सालाना ₹500 करोड़ से ₹800 करोड़ के बीच। रतन ने करीब ₹10 प्रति यूनिट पर सालाना ₹600 करोड़ से ₹800 करोड़, यानी दो दशक में लगभग ₹15,000 करोड़ का अनुमान लगाया। सुक्खू ने ₹6 प्रति यूनिट पर सालाना करीब ₹500 करोड़ का ज्यादा सतर्क आंकड़ा दिया। नदियों के अलावा कम आय स्रोतों वाले राज्य के लिए, जैसा अदालत ने खुद जुलाई में कहा था, दोनों में से कोई भी रकम मायने रखती है।
60 साल पुराना विवाद
- 1 नवंबर 1966पंजाब का पुनर्गठन; भाखड़ा की बिजली पर हिमाचल का हक शुरू
- 1996हिमाचल ने सुप्रीम कोर्ट में वाद दायर किया
- 27 सितंबर 2011अदालत ने हिमाचल का हिस्सा 7.19% तय किया
- 1 नवंबर 2011बीबीएमबी ने हिमाचल को मौजूदा हिस्सा देना शुरू किया
- 30 जुलाई 2026केंद्र ने बकाया बिजली में चुकाने का प्रस्ताव रखा
- नवंबर 2026अदालत ने 20 साल में 11,973 एमयू का आदेश दिया
क्या विवाद खत्म हो गया?
बकाये का मामला खत्म है, लेकिन हिमाचल के दूसरे दावे बाकी हैं। सुक्खू ने कहा कि राज्य अब पनबिजली परियोजनाओं पर जल उपकर (वॉटर सेस) और मंडी के जोगिंदरनगर में पंजाब द्वारा चलाई जा रही शानन पनबिजली परियोजना की वापसी के लिए दबाव बढ़ाएगा। उन्होंने 6 नवंबर को कहा, “हमारी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।”
विपक्षी भाजपा ने फैसले का स्वागत किया, लेकिन कहा कि 1996 से हर दल की सरकारों ने यह मामला लड़ा। नवंबर 2026 की स्थिति में, पंजाब और हरियाणा कितनी आसानी से यूनिट सौंपते हैं, इसी से तय होगा कि 2011 का डिक्री आखिरकार कितनी जल्दी पूरा होता है।
मूल दस्तावेज़
- CERC order in Petition No. 72/GT/2021 (BBMB tariff), project capacities and beneficiary sharesCentral Electricity Regulatory Commission, 1 जनवरी 2021