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झारखंड हाईकोर्ट ने जेएसएससी सीजीएल परीक्षा रद्द करने का सरकार का फ़ैसला खारिज किया
जस्टिस दीपक रोशन ने परीक्षा और उससे हुई नियुक्तियां रद्द करने वाला 18 अगस्त का आदेश निरस्त कर दिया और कहा कि सीआईडी की जांच जारी रह सकती है।

मुख्य बातें
- हाईकोर्ट ने जेएसएससी सीजीएल परीक्षा और नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश निरस्त किया।
- अदालत ने कहा कि ठोस सबूत के बिना चयनित उम्मीदवारों को दोषी नहीं माना जा सकता।
- सीआईडी जांच जारी रहेगी, जिसकी निगरानी एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे।
झारखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की संयुक्त स्नातक स्तरीय (सीजीएल) परीक्षा और उससे हुई नियुक्तियों को रद्द करने का राज्य सरकार का फ़ैसला खारिज कर दिया। इससे परीक्षा पास करने वाले उन उम्मीदवारों को राहत मिली है जो अगस्त से अदालत की रोक के सहारे नौकरी कर रहे हैं।
रांची में चयनित उम्मीदवारों की याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाते हुए जस्टिस दीपक रोशन ने पाया कि पूरी परीक्षा रद्द करने को सही ठहराने के लिए अदालत के सामने कोई ठोस और साफ़ आधार नहीं रखा गया। अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने से पहले भर्ती प्रक्रिया रद्द करना जल्दबाज़ी थी।
अदालत ने कहा कि सिर्फ़ परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों के आधार पर चयनित उम्मीदवारों को दोषी नहीं माना जा सकता। उसने अपना पिछला निर्देश भी दोहराया कि निष्पक्ष प्रक्रिया से चुने गए उम्मीदवारों को “जांच के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए”। विस्तृत लिखित आदेश अभी आना है।
जांच जारी रहेगी
इस फ़ैसले से जांच ख़त्म नहीं होती। सीआईडी की जांच जारी रहेगी, जिसकी निगरानी सेवानिवृत्त न्यायाधीश गौतम कुमार चौधरी करेंगे। अदालत ने उन्हें सितंबर में नियुक्त किया था, और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी आर के मलिक नोडल अधिकारी हैं।
परीक्षा 21 और 22 सितंबर 2024 को हुई थी। इस साल 18 अगस्त को राज्य सरकार ने सीआईडी की रिपोर्ट और अभ्यर्थियों के विरोध का हवाला देकर इसे कुछ दूसरी भर्ती परीक्षाओं के साथ रद्द कर दिया था। बाद में उसने अदालत को एक सीलबंद रिपोर्ट दी, जिसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और व्यवस्था की नाकामी का आरोप था। सीआईडी कई लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है, जिनमें अगस्त में पकड़े गए चार सफल उम्मीदवार भी हैं।
अभ्यर्थी आकाश गौरव समेत याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि गड़बड़ी में शामिल लोगों की पहचान कर उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है, और कुछ लोगों की गलती के लिए सारी नियुक्तियां रद्द करना “न तो उचित है, न न्यायसंगत”। अदालत ने 8 अक्टूबर को फ़ैसला सुरक्षित रखा था।