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राजनीतिसुप्रीम कोर्ट

जमानत के बाद भी जेल में बंद विचाराधीन कैदियों को रिहा करे यूपी: सुप्रीम कोर्ट, सभी 75 जिलों पर लागू आदेश

जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि यह जिम्मेदारी राज्य की है। उत्तर प्रदेश ने बताया था कि 20 जिलों के ऐसे 264 कैदियों में से 106 के मामले में फैसला बाकी है।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
गांधी न्यूज़ ग्राफ़िक: जमानत पाए विचाराधीन कैदियों को रिहा करे यूपी
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मुख्य बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत पाए कैदियों को छुड़ाने की जिम्मेदारी राज्य की है।
  2. 20 जिलों में जमानत पाए 264 में से 158 कैदी अब तक रिहा हुए हैं।
  3. निर्देश अब यूपी के सभी 75 जिलों पर लागू; अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 को।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि जिन विचाराधीन कैदियों को जमानत मिल चुकी है पर वे अब भी जेल में हैं, उनकी रिहाई सुनिश्चित की जाए। अदालत ने यह कवायद राज्य के सभी 75 जिलों तक बढ़ा दी।

जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने यह निर्देश “इन री: पॉलिसी स्ट्रैटेजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल” नाम के स्वतः संज्ञान मामले में दिए। यह मामला भारतीय जेलों की एक पुरानी समस्या से जुड़ा है: लोग जमानत तो पा लेते हैं, पर जमानतदार न जुटा पाने या दूसरी शर्तें पूरी न कर पाने के कारण जेल में ही रह जाते हैं।

राज्य ने अदालत को क्या बताया

उत्तर प्रदेश ने अपने 20 जिलों की जांच की थी। इनमें 264 ऐसे विचाराधीन कैदी मिले जिन्हें जमानत मिल चुकी थी पर वे हिरासत में थे, ज़्यादातर इसलिए कि वे जमानतदार या जमानत की दूसरी शर्तें पूरी नहीं कर सके। राज्य ने पीठ को बताया कि इनमें से 158 रिहा हो चुके हैं और बाकी 106 पर फैसला लंबित है।

पीठ ने कहा कि बाकी 55 जिलों में भी ऐसी ही कवायद ज़रूरी है, और उसके निर्देश अब पूरे राज्य के विचाराधीन कैदियों पर लागू होंगे।

सबके लिए कानूनी मदद

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (डीएलएसए) के साथ मिलकर पात्र कैदियों की पहचान और रिहाई में मदद करे। उसने साफ किया कि यह मदद सिर्फ उन्हीं तक सीमित नहीं रह सकती जिनकी पैरवी पहले से कानूनी सहायता वाले वकील कर रहे हैं।

पीठ ने कहा, “विचाराधीन कैदियों के बीच कोई भेद नहीं हो सकता”, चाहे उन्हें डीएलएसए की मदद मिल रही हो या उन्होंने निजी वकील रखा हो। निजी वकील होने से कानूनी सहायता पर रोक नहीं लगती, क्योंकि “मुकदमा उस अर्थ में प्रतिकूल नहीं हो सकता।”

पीठ ने पूरी जिम्मेदारी सरकार पर डाली। उसने कहा, “यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य की है कि ये लोग हिरासत से रिहा हों।”

अदालत ने निचली अदालतों से भी कहा कि वे डीएलएसए की ओर से लाए गए मामलों पर विचार करें और ज़रूरत पड़ने पर जमानत की शर्तें बदलें, ताकि कोई कैदी सिर्फ इसलिए जेल में न रहे कि वह जमानतदार का इंतज़ाम नहीं कर सकता।

आगे क्या

राज्य सरकार ने पीठ को भरोसा दिलाया कि उचित समय में ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 को करेगी।