राजनीतिसुप्रीम कोर्ट
ओबीसी क्रीमी लेयर फैसले पर दोबारा विचार से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा माता-पिता का वेतन यंत्रवत नहीं जोड़ा जा सकता
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन ने 11 मार्च के फैसले में बदलाव की केंद्र की अर्जी ठुकरा दी। यही फैसला अब सिविल सेवा परीक्षा 2025 के ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर लागू होगा।

मुख्य बातें
- अदालत ने 11 मार्च 2026 के क्रीमी लेयर फैसले में बदलाव की केंद्र की कोशिश खारिज की।
- यह फैसला सीएसई 2025 के ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर लागू होगा।
- केंद्र को अमल के लिए दो महीने और मिले, पर दो साल की मोहलत नहीं।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने शुक्रवार को ओबीसी क्रीमी लेयर पर अपने 11 मार्च के फैसले में बदलाव से इनकार कर दिया। उसने केंद्र की अर्जियां खारिज करते हुए दोहराया कि किसी उम्मीदवार के क्रीमी लेयर में होने का फैसला करते समय माता-पिता की वेतन आय को यंत्रवत नहीं जोड़ा जा सकता।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि सरकार के निर्देशों, यानी 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र, की व्याख्या पर दोबारा विचार नहीं हो सकता और यह संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी है।
विवाद सिविल सेवा के उन उम्मीदवारों से शुरू हुआ जिन्हें कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने ओबीसी लाभ नहीं दिया, क्योंकि उनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में वेतन पाते थे और उन्हें क्रीमी लेयर माना गया। वे केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) गए, और मद्रास, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया। मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपीलें खारिज कर उसे छह महीने में अमल करने को कहा था।
शुक्रवार को पीठ ने कहा कि “उक्त फैसले में की गई व्याख्या के अनुसार क्रीमी लेयर का सिद्धांत सेवाओं के आवंटन पर लागू होगा”। यह सिविल सेवा परीक्षा 2025 के ज़रिए चुने गए ओबीसी उम्मीदवारों पर लागू होगा, जिनका आवंटन अभी बाकी है। फैसला पूरी हो चुकी नियुक्तियों, चयन या आवंटन को दोबारा नहीं खोलता और दूसरे कर्मचारियों की वरिष्ठता पर असर नहीं डालता। अदालतों और अधिकरणों में लंबित ऐसे ही मामलों पर मार्च की व्याख्या के आधार पर गुण-दोष से फैसला हो सकेगा।
केंद्र ने पीएसयू, बैंकों और दूसरे संस्थानों के पदों की सरकारी पदों से समकक्षता तय करने और क्रीमी लेयर की एक समान व्यवस्था बनाने के लिए दो साल मांगे थे। अदालत ने कोई समय-सीमा तय करने से इनकार किया और कहा कि ये कार्यपालिका और विधायिका के दायरे के मामले हैं। उसने अमल का समय दो महीने बढ़ाकर अर्जियों का निपटारा कर दिया।