रायहमारा मत
खूंटी में जान गंवाने वाले सात लोग मदद के लिए रुके थे। झारखंड की ग्रामीण सड़कों को रोशनी, रफ्तार पर लगाम और सुरक्षित बचाव का तरीका चाहिए
कर्रा-तोरपा रोड पर गिरे स्कूटी सवार को उठा रहे ग्रामीणों को तेज रफ्तार ट्रेलर ने रौंद दिया, चार महिलाएं और तीन बच्चे मारे गए। शुक्रवार को सड़क जाम पर किए गए वादे हफ्तों के भीतर स्ट्रीट लाइट, भारी वाहनों की रफ्तार पर नियंत्रण और गिरफ्तारी में बदलें, अगले हादसे के बाद नहीं।

उन्होंने वही किया जो भले पड़ोसी करते हैं। गुरुवार रात 10 बजे से कुछ पहले खूंटी में कर्रा-तोरपा रोड के जोन-लुदरू मोड़ पर एक पुलिया के पास स्कूटी गिर गई और उसका सवार झाड़ियों में जा गिरा। आसपास के घरों से लोग, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे थे, उसे निकालने बाहर आए। कुछ ही मिनट बाद तोरपा की ओर से तेज रफ्तार में आया 18 पहियों वाला ट्रेलर सीधे उन पर चढ़ गया।
सात लोगों की मौत हुई: चार महिलाएं और तीन बच्चे, जिनमें एक 12 साल का लड़का था जिसने खूंटी सदर अस्पताल में दम तोड़ा। एक छोटी बच्ची का इलाज चल रहा है। चालक और उसका सहायक अंधेरे में भाग निकले, और शुक्रवार दोपहर तक किसी गिरफ्तारी की खबर नहीं थी।
अनजाना खतरा नहीं, जाना-पहचाना
सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि गांव वालों को यह खतरा दिख रहा था। शुक्रवार को कर्रा रेलवे फाटक के पास सड़क जाम करते हुए उन्होंने कहा कि यह मोड़ अंधेरा और खतरनाक है, और रात में भारी वाहन यहां से तेज रफ्तार में गुजरते हैं। उनकी मांगें मामूली थीं: चालक की गिरफ्तारी, पीड़ित परिवारों को नौकरी और मुआवजा, स्पीड ब्रेकर और नियमित पुलिस जांच।
बातचीत के लिए पहुंचे अधिकारियों ने “सरकारी नियमों के अनुसार” मदद का वादा किया, कोई रकम बताए बिना। ग्रामीण भारत में ऐसी कितनी ही बातचीत इसी वाक्य पर खत्म हो गई है। परिवारों को एक रकम और एक तारीख चाहिए, और सड़क को काम।
खूंटी कोई अपवाद नहीं है। सड़क परिवहन मंत्रालय की अपनी गिनती के मुताबिक 2023 में भारत की सड़कों पर 1,72,890 लोग मारे गए, यानी हर घंटे करीब 20। जिन मौतों का संबंध यातायात नियम तोड़ने से था, उनमें 68.1% तेज रफ्तार से हुईं। 40% से ज्यादा मौतें राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के अलावा दूसरी सड़कों पर हुईं, उसी तरह की सड़क जो जोन-लुदरू से गुजरती है।
वाजिब आपत्ति
माल ढोने वाले वाहनों की सड़क पर स्पीड ब्रेकर हर मर्ज की दवा नहीं हैं। खराब बने ब्रेकर खुद हादसे कराते हैं, और कोई जिला हर मोड़ पर सिपाही तैनात नहीं कर सकता। न ही सरकार लोगों को सड़क पर घायल पड़े किसी व्यक्ति की मदद के लिए दौड़ने से रोक सकती है, और उसे ऐसा चाहना भी नहीं चाहिए।
असल बात यही है। जो सड़क रात में गांव के घरों के पास से ट्रेलर ले जाती है, उसे यह मानकर बनाया और चलाया जाना चाहिए कि उस पर लोग खड़े होंगे।
झारखंड को क्या करना चाहिए
पहला, जोन-लुदरू मोड़ और उसके आसपास के हिस्से में एक महीने के भीतर स्ट्रीट लाइट, चमकने वाले संकेतक, रंबल स्ट्रिप और ठीक से बने स्पीड टेबल लगें, और जिला कार्य आदेश सार्वजनिक करे ताकि लोग हिसाब मांग सकें।
दूसरा, रात में भारी वाहनों की रफ्तार पर लगाम चाहिए। कर्रा-तोरपा रोड और गांवों से माल ढोने वाली ऐसी दूसरी सड़कों पर स्पीड कैमरे या इंटरसेप्टर गश्त किसी भी संख्या के शोक संदेशों से ज्यादा काम करेंगे।
तीसरा, पुलिस ट्रेलर के मालिक और चालक का पता जल्द लगाए; इतने बड़े ट्रेलर की पहचान मुश्किल नहीं है। जिन लोगों को कुचला, उन्हें छोड़कर भाग जाना अपने आप में अपराध है, और जल्द गिरफ्तारी परिवारों का न्यूनतम हक है।
चौथा, मुआवजे का ऐलान नियमों में नहीं, रुपयों में हो और हफ्तों के भीतर भुगतान हो, साथ में घायल बच्ची का मुफ्त इलाज।
आखिर में, हादसे की जगह मदद करने वालों को इसका सुरक्षित तरीका चाहिए। नेक मददगारों को उत्पीड़न से बचाने वाला कानून पहले से है। अगला कदम सीधा है: पंचायतों और स्कूलों के जरिए आसान प्रशिक्षण, कि रोशनी जलाएं, हादसे की जगह से काफी पीछे चेतावनी लगाएं और भीड़ को सड़क से दूर रखें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दोनों ने दुख जताया है। दुख नीति नहीं है। शुक्रवार के वादों की परीक्षा यह होगी कि क्रिसमस तक जोन-लुदरू मोड़ कुछ बदला हुआ दिखता है या नहीं।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 7ग्रामीण 5 नवंबर 2026 को खूंटी के जोन-लुदरू मोड़ पर मारे गए
- 1,72,890लोग 2023 में भारत की सड़कों पर मारे गए
- 68.1%2023 में यातायात नियम उल्लंघन से जुड़ी मौतें तेज रफ्तार से