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राजनीतिआंतरिक सुरक्षा

बस्तर में मोदी: एक साल में ड्यूटी पर सीआरपीएफ का कोई जवान शहीद नहीं, 47 साल में पहली बार; 'दिमागी नक्सल' पर कांग्रेस का पलटवार

करनपुर में सुरक्षा बलों को प्रधानमंत्री के दिवाली संबोधन के पाठ से नक्सलमुक्त भारत के दावे के पीछे के आंकड़े सामने आए हैं। जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने गैर-राजनीतिक त्योहार को विरोधियों पर हमले में बदल दिया।

संपादकीय डेस्क से · बस्तर, छत्तीसगढ़संपादन: पुनीत पनेसरप्रकाशित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता जयराम रमेश (फ़ाइल फ़ोटो)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता जयराम रमेश (फ़ाइल फ़ोटो)फ़ोटो: Photos: Narendra Modi / Wikimedia Commons; Yann Forget from India / विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY 3.0 and CC BY-SA 2.0

मुख्य बातें

  1. मोदी ने कहा कि पिछले एक साल में ड्यूटी पर सीआरपीएफ का कोई जवान शहीद नहीं हुआ, 47 साल में ऐसा पहली बार हुआ।
  2. उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में 15,000 किमी सड़कें और 9,500 मोबाइल टावर बनने की बात कही।
  3. कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा कि भाषण संस्थागत मर्यादाओं पर खुला हमला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिवाली के दिन, रविवार 8 नवंबर को, बस्तर के करनपुर में कोबरा ऑपरेशंस बेस पर सुरक्षा कर्मियों से कहा कि पिछले एक साल में ड्यूटी पर सीआरपीएफ का कोई जवान शहीद नहीं हुआ, जिसे उन्होंने 47 साल में पहली बार हुआ बताया। उसी दिन दोपहर 2:53 बजे पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की जारी की गई भाषण की प्रति में वे आंकड़े भी हैं जिनसे उन्होंने माओवादी खतरा खत्म होने का दावा किया, और “बौद्धिक नक्सलियों” पर हमला भी, जिस पर कांग्रेस ने उसी दिन बाद में तीखा जवाब दिया।

भाषण में क्या कहा गया

हिंदी में बोलते हुए मोदी ने कहा कि उन्होंने त्योहार मनाने के लिए पूर्व नक्सली गढ़ बस्तर को चुना, उन लोगों के साथ जिन्हें वे अपने परिवार का हिस्सा बताते हैं। उन्होंने इसे दशकों में पहली दिवाली कहा जब देश ने लंबी लड़ाई जीत ली है और हर जिला नक्सलवाद से मुक्त है। इस दावे पर हमारी पहले की रिपोर्ट विस्तार से है। उन्होंने सीआरपीएफ, कोबरा, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, इंडिया रिजर्व बटालियन, राज्य पुलिस और बस्तर फाइटर्स (इलाके से भर्ती स्थानीय बल) का आभार जताया।

नई बात उस बल का रिकॉर्ड है जिसने अभियान की अगुवाई की। मोदी ने कहा कि पिछले एक साल में ड्यूटी पर सीआरपीएफ का कोई जवान शहीद नहीं हुआ, 47 साल में ऐसा पहली बार हुआ, और इसका श्रेय सरकार की नीति, बलों के साहस और संयम को दिया। उन्होंने यह बात जोर देकर दोहराई।

फिर वे सबसे भारी नुकसान वाले वर्षों पर लौटे। उन्होंने कहा कि 2010 में दंतेवाड़ा की एक मुठभेड़ में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए और उसी साल दंतेवाड़ा की एक और घटना में 44 नागरिक मारे गए। उन्होंने कहा कि अकेले छत्तीसगढ़ में 1,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 2004 से 2013 तक हर साल मारे गए सुरक्षाकर्मियों की संख्या मारे गए नक्सलियों से ज्यादा रही। उन्होंने पहले की सरकारों की आलोचना की कि उन्होंने समस्या को लाइलाज माना और सार्वजनिक रूप से कोई शोक नहीं जताया।

नीति और विकास के आंकड़े

मोदी ने कहा कि 2014 में राजनीतिक इच्छाशक्ति लौटी और आंकड़े बदलने लगे। उन्होंने चार कदम गिनाए: बलों को कार्रवाई की छूट, नक्सलियों और अलगाववादियों को पैसा पहुंचाने वाले नेटवर्क (जाली मुद्रा नेटवर्क सहित) को तोड़ना, हथियारों की आपूर्ति काटना और भर्ती व आवाजाही पर रोक, और व्यवस्था के भीतर से मिलने वाले समर्थन पर अंकुश।

फिर उन्होंने प्रभावित इलाकों में जो बना, वह गिनाया। ये सभी उनके अपने आंकड़े हैं:

  • सुरक्षा घेरे में बनी 15,000 किमी से ज्यादा सड़कें
  • 9,500 से ज्यादा मोबाइल टावर
  • आदिवासी बच्चों के लिए करीब 175 एकलव्य स्कूल
  • करीब 50 आईटीआई और करीब 50 कौशल विकास केंद्र
  • हजारों डाकघर, बैंक शाखाएं और एटीएम
  • पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों के लिए पीएम जनमन योजना और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास योजनाएं

मोदी के अनुसार नक्सल प्रभावित इलाकों में क्या बना

  • 15,000+ किमी सड़केंसुरक्षा घेरे में बनीं
  • 9,500+ मोबाइल टावरदूरदराज के गांवों में संपर्क
  • 175 एकलव्य स्कूलआदिवासी बच्चों के लिए
  • ~100 आईटीआई और कौशल केंद्रकरीब 50-50

उन्होंने अभियान को कल्याण योजनाओं से जोड़ा। एक हालिया विश्व बैंक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, जैसा उन्होंने बताया, उन्होंने कहा कि बारह साल में करीब 50 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले हैं, और कहा कि नक्सलियों ने स्कूल, अस्पताल, टीकाकरण, मोबाइल टावर और रेल को रोक रखा था। विज्ञप्ति में विश्व बैंक की रिपोर्ट का नाम नहीं है और हमने उसकी जांच नहीं की है।

“बौद्धिक नक्सली”

मोदी ने कहा कि सशस्त्र नक्सली जंगलों से निकल चुके हैं, लेकिन “बौद्धिक” नक्सलियों ने कई संगठनों पर कब्जा कर लिया है और राजनीतिक दलों में घुस गए हैं। भाषण के दूसरे विवरणों में इस शब्द को “दिमागी नक्सल” कहा गया है। उन्होंने लोगों से उन्हें पहचानने और हराने को कहा। अंत में उन्होंने अगले लक्ष्य के रूप में नशामुक्त भारत और विकसित व आत्मनिर्भर भारत गिनाए, मौजूदा उपलब्धियों को पड़ाव नहीं बल्कि प्रक्षेपण स्थल बताया और दिवाली की शुभकामनाओं के साथ बात खत्म की।

संबोधन से पहले उन्होंने शिविर के स्मारक पर शहीद सीआरपीएफ कर्मियों को श्रद्धांजलि दी, और बाद में जवानों ने उनके चारों ओर आदिवासी गीतों पर नृत्य किया।

कांग्रेस का जवाब

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने करीब 5 बजे एक्स पर पोस्ट कर जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री ने दिवाली के दिन भी देश को अपनी खास गाली से नहीं बख्शा”, और “यह सभी संस्थागत मर्यादाओं पर खुला हमला है, लेकिन इस आदमी को यह कब रोक पाया है?” (यह उनके अंग्रेजी पोस्ट का अनुवाद है।) उनकी आपत्ति थी कि मोदी एक गंभीर, गैर-राजनीतिक अवसर पर सुरक्षा बलों की वर्दी पहनकर राजनीतिक विरोधियों पर हमला कर रहे थे।

रमेश ने पहले के पलटावों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मोदी ने 28 अप्रैल 2024 को जाति जनगणना मांगने वालों को “अर्बन नक्सल” कहा और 30 अप्रैल 2025 को घोषणा की कि जाति जनगणना जनगणना 2027 का हिस्सा होगी। उन्होंने कहा कि सितंबर 2020 में मोदी ने कृषि कानूनों के विरोधियों को नक्सली विचारधारा से जोड़ा, फिर 19 नवंबर 2021 को कानून वापस लिए गए। “प्रधानमंत्री साफ तौर पर बेचैन, परेशान और हताश हैं,” उन्होंने लिखा। “झोला उठाने का वक्त करीब आ रहा है।”

यह रिपोर्ट लिखे जाने तक पढ़े गए स्रोतों में रमेश की पोस्ट पर भाजपा का कोई जवाब उपलब्ध नहीं था।

यहां तक कैसे पहुंचे

यह भाषण उस अभियान का पड़ाव है जिसकी उल्टी गिनती केंद्र कर रहा था। 30 मार्च 2026 को गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि नक्सल प्रभावित जिले 2014 के 126 से घटकर दो रह गए हैं, यानी मंत्रालय की 31 मार्च की समय-सीमा से एक दिन पहले। रविवार शाम शाह ने एक्स पर कहा कि यह पांच दशकों में पहली दिवाली है जब देश नक्सलवाद से मुक्त हुआ है। मोदी का “हर जिला मुक्त” वाला कथन मार्च में शाह के बताए दो जिलों के आंकड़े से आगे जाता है। दोनों बयान सात महीने के अंतर पर दिए गए हैं और विज्ञप्ति उनका मेल नहीं बैठाती।

क्यों मायने रखता है

ये आंकड़े प्रधानमंत्री के अपने हैं और सरकार का पक्ष हैं कि अकेले छत्तीसगढ़ में 1,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की जान लेने वाला संघर्ष खत्म हो चुका है। इसका सीधा असर बस्तर के गांवों पर है: उन्होंने जो सड़कें, टावर, स्कूल और बैंक शाखाएं गिनाईं वे सशस्त्र सुरक्षा में बनीं, और इलाके को अब कितनी सीआरपीएफ बटालियनों की जरूरत है, यह इस पर निर्भर है कि खतरा सचमुच खत्म हुआ है या नहीं।

आगे क्या

विज्ञप्ति में नशामुक्त और विकसित भारत के लक्ष्यों के अलावा कोई नई तारीख या लक्ष्य नहीं है, और इन दोनों के साथ भी समय-सीमा नहीं दी गई। राजनीतिक बहस जारी रहने के आसार हैं, क्योंकि कांग्रेस “बौद्धिक नक्सली” वाले बयान का जवाब दे चुकी है और भाजपा का जवाब आना बाकी है।

मूल दस्तावेज़