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सुप्रीम कोर्ट: आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की मियाद हिरासत से शुरू, औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं

त्रिपुरा के ड्रग्स मामले में पकड़े गए चार लोगों पर फैसला देते हुए अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में लेने के घंटों बाद गिरफ्तारी दर्ज करके संवैधानिक समय-सीमा नहीं टाल सकती।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली (फ़ाइल फ़ोटो)
सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की सीमा व्यक्ति के हिरासत में लिए जाने के क्षण से गिनी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा।
  2. त्रिपुरा के एनडीपीएस मामले में चार लोगों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे पकड़ा गया, पर गिरफ्तारी अगले दिन सुबह 11 बजे दिखाई गई।
  3. अदालत ने त्रिपुरा हाई कोर्ट का ज़मानत से इनकार रद्द कर उन्हें ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा वास्तविक हिरासत के क्षण से शुरू होती है, न कि उस समय से जब पुलिस औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज करती है।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने चार लोगों की अपीलों पर यह फैसला दिया। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के एक मामले में उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया था। चारों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे तलाशी और ज़ब्ती के दौरान हिरासत में लिया गया था, लेकिन उनकी गिरफ्तारी अगले दिन सुबह 11 बजे दिखाई गई।

अदालत ने कहा कि उन्हें दोपहर 2 बजे की हिरासत से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। पीठ ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और विशेष अदालत की शर्तों पर उन्हें ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

हिरासत और गिरफ्तारी में कोई फर्क नहीं

पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) में “गिरफ्तार” और “हिरासत में” शब्दों को साथ पढ़ा जाना चाहिए। अदालत के मुताबिक, हिरासत और गिरफ्तारी के बीच बनावटी अंतर खींचने की कोई भी कोशिश संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

न्यायाधीशों ने कहा कि तलाशी, ज़ब्ती और औपचारिक गिरफ्तारी के बाद ही घड़ी शुरू मानना न सिर्फ कानूनन गलत है, बल्कि पूरी तरह असंवैधानिक है। औपचारिक गिरफ्तारी से पहले पूछताछ या जांच में लगा समय इससे बाहर नहीं रखा जा सकता। एकमात्र छूट मजिस्ट्रेट तक पहुंचने की यात्रा में लगने वाला समय है।

अदालत ने यह तर्क भी खारिज किया कि कम समय की हिरासत गिरफ्तारी नहीं होती। उसने कहा कि मौलिक अधिकार को थोड़ी देर के लिए भी निलंबित नहीं किया जा सकता। 24 घंटे से ज़्यादा बिना पेशी के रखे गए व्यक्ति को तुरंत रिहा करना होगा।

मजिस्ट्रेटों को अब क्या देखना होगा

पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट उस वास्तविक तारीख और समय को दर्ज करने के लिए बाध्य हैं जब व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी गई, और 24 घंटे उसी समय से गिनने होंगे। सिर्फ समय-सीमा का पालन काफी नहीं है: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 के तहत हिरासत उचित भी होनी चाहिए, और ऐसा न होने पर मजिस्ट्रेट आगे की रिमांड से इनकार कर सकते हैं।