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राज्यपश्चिम बंगाल

वार्ड परिसीमन मामले के फैसले तक कोलकाता निकाय चुनाव की अधिसूचना पर कलकत्ता हाईकोर्ट की रोक

शुक्रवार को वेकेशन बेंच ने राज्य चुनाव आयोग को कोलकाता नगर निगम चुनाव अधिसूचित करने से रोका। सीपीआई(एम) के पूर्व पार्षद ने वार्डों को 144 से 209 करने को चुनौती दी है।

संपादकीय डेस्क से · कोलकातासंपादन: पुनीत पनेसरप्रकाशित
कोलकाता में कलकत्ता हाईकोर्ट की इमारत (फाइल फोटो)
कोलकाता में कलकत्ता हाईकोर्ट की इमारत (फाइल फोटो)G41rn8 / विकिमीडिया

मुख्य बातें

  1. कलकत्ता हाईकोर्ट की पीठ ने राज्य चुनाव आयोग को कोलकाता नगर निगम चुनाव अधिसूचित करने से रोक दिया।
  2. यह रोक तब तक रहेगी जब तक एकल पीठ वार्ड परिसीमन की चुनौती पर फैसला नहीं देती।
  3. राज्य की 11 सितंबर की अधिसूचना से वार्डों की संख्या 144 से बढ़कर 209 हो जाएगी।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग को कोलकाता नगर निगम के चुनाव अधिसूचित करने से रोक दिया है। यह रोक तब तक रहेगी जब तक शहर के वार्डों के पुनर्गठन की चुनौती पर फैसला नहीं हो जाता। जस्टिस सव्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस अर्जुन रे मुखर्जी की वेकेशन बेंच ने शुक्रवार, 6 नवंबर को यह आदेश दिया।

पीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश में बदलाव किया। उन्होंने 29 अक्टूबर को चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया था और पक्षों से हलफनामे मांगे थे। याचिकाकर्ता, सीपीआई(एम) के पूर्व पार्षद दीपू दास, ने खंडपीठ में अपील की। खंडपीठ ने चुनाव तब तक रोक दिए, जब तक एकल न्यायाधीश उनकी याचिका का अंतिम निपटारा नहीं कर देते।

वार्डों का विवाद

राज्य ने 11 सितंबर को अधिसूचना जारी की थी, जिससे नगर निगम के वार्ड 144 से बढ़कर 209 हो जाएंगे। दास ने अदालत से इस कवायद को अमान्य घोषित करने और अधिसूचना रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि 8 जून को सदन भंग होने के बाद से निगम में कोई निर्वाचित परिषद नहीं है और स्मिता पांडे को प्रशासक बनाया गया है।

उनकी दलील तीन बातों पर टिकी है। अधिसूचना प्रशासक की सिफारिश पर आधारित थी, लेकिन वे निगम की कर्मचारी थीं और निर्वाचित निकाय की जगह नहीं ले सकतीं। वे इस कवायद को गेरीमैंडरिंग बताते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट अस्वीकार्य ठहरा चुका है। उनका यह भी कहना है कि वार्ड वास्तविक आबादी की जगह मतदाता सूची के आधार पर बनाए गए, जिससे कई निवासी छूट गए।

राज्य ने दलील दी कि निगम की सिफारिश के बिना भी वह परिसीमन कर सकता है, प्रशासक के पास निगम की शक्तियां थीं, और चुनौती सितंबर की अधिसूचना के बाद देर से दी गई। राज्य की ओर से महाधिवक्ता सुरजीत नाथ मित्र पेश हुए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बिकास रंजन भट्टाचार्य ने बहस की।

आगे क्या

चुनाव की कोई तारीख घोषित नहीं हुई है और आदेश में एकल न्यायाधीश की सुनवाई की कोई तारीख भी तय नहीं है। जब तक वे याचिका पर फैसला नहीं देते, चुनाव आयोग वह अधिसूचना जारी नहीं कर सकता जिससे कोलकाता निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी।