सोमवार, 2 नवंबर
भारत और दुनिया,
हिंदी और अंग्रेज़ी में
सेंसेक्स 74,459.53 +0.42%निफ्टी 50 23,053.10 +0.51%₹ / $ 94.93

रायहमारा मत

कर्ज़ देने वालों को हत्या के मुकदमे की धमकी सूखा नीति नहीं है। महाराष्ट्र जबरन वसूली पर लिखित रोक लगाए

नांदेड़ में एक फाइनेंस कंपनी के दफ्तर में किसान का शव मिलने के बाद एकनाथ शिंदे का गुस्सा समझ में आता है। लेकिन सूखे से जूझ रही 304 तहसीलों के किसानों को नारे की नहीं, वसूली पर अधिसूचित रोक, लागू होने वाले नियमों और समय पर पहुंचने वाली राहत की ज़रूरत है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िले में मुदखेड़ का एक दृश्य (फ़ाइल फ़ोटो)
महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िले में मुदखेड़ का एक दृश्य (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Nikhilb239 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0

चंद्रकांत शिंदे के पास नांदेड़ ज़िले की मुदखेड़ तहसील में दो एकड़ ज़मीन थी। परिवार के मुताबिक उन्होंने एक निजी फाइनेंस कंपनी से 10,000 रुपये उधार लिए थे और कंपनी 70,000 रुपये मांग रही थी। परिवार का कहना है कि 22 अक्टूबर को कंपनी के लोग उन्हें गांव से उठा ले गए। दो दिन बाद वे नांदेड़ में कंपनी के दफ्तर के अंदर लटके मिले। उनकी मां और बेटी का आरोप है कि उन्हें बंधक बनाकर पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर लटका दिया गया ताकि मामला आत्महत्या लगे।

पुलिस ने हत्या और अपहरण का मामला दर्ज किया है, चार लोगों को गिरफ्तार किया है और विशेष जांच दल बनाया है। यही होना चाहिए था। अगर परिवार की बात सही निकलती है, तो यह कर्ज़ वसूली में हुई कोई चूक नहीं थी। यह हत्या थी।

वाडी बुद्रुक की चेतावनी

रविवार को इसी ज़िले में एक अस्पताल के उद्घाटन पर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस मामले को राज्य के हर कर्ज़दाता के लिए चेतावनी बना दिया। उन्होंने कहा, “माइक्रोफाइनेंस कंपनियां, बैंक और साहूकार संकट में फंसे किसानों को परेशान न करें। अगर कोई किसान उत्पीड़न के कारण आत्महत्या करता है, तो हत्या के मुकदमे दर्ज होंगे।”

गुस्सा जायज़ है। महाराष्ट्र ने इस खरीफ सीज़न में अपनी 358 में से 304 तहसीलों में सूखा घोषित किया है। अकेले मराठवाड़ा में संभागीय आयुक्त कार्यालय ने इस साल के पहले छह महीनों में किसानों की 465 आत्महत्याएं दर्ज कीं, जिनमें 61 नांदेड़ में थीं, जबकि 2025 में यह संख्या 1,131 थी। जिन परिवारों की फसल डूब चुकी है, उन्हें दरवाज़े पर वसूली एजेंट नहीं चाहिए।

लेकिन यह वादा अपने आप में टिकता नहीं। उत्पीड़न से हुई आत्महत्या आत्महत्या के लिए उकसाने के कानून के तहत पहले से अपराध है, और पुलिस उसका इस्तेमाल कर सकती है और करना चाहिए। हत्या अलग आरोप है, जिसके लिए हत्या का सबूत चाहिए। हर मौत पर पहले से हत्या के मुकदमे का वादा ऐसी बात है जिसे अदालतें खारिज कर देती हैं, और इससे उन मामलों में सज़ा दिलाना मुश्किल होता है जो सच में मायने रखते हैं। किसान भी वहीं का वहीं रहता है: कर्ज़दाता के सामने अकेला, जब तक कुछ भयानक न हो जाए।

एक जायज़ आपत्ति

कर्ज़ देने वालों की भी एक दलील है। छोटी फाइनेंस कंपनियां और माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं वहां कर्ज़ देती हैं जहां बैंक अक्सर नहीं देते, और वे उन्हीं घरों को कर्ज़ देती हैं जो आज मुश्किल में हैं। अगर सूखाग्रस्त ज़िले का हर कर्ज़दाता आपराधिक मुकदमे से डरेगा, तो सबसे आसान रास्ता होगा कि वहां कर्ज़ देना ही बंद कर दे। इससे किसान उन बिना पंजीकरण वाले साहूकारों की ओर धकेले जाएंगे जिन पर नज़र रखना सबसे कठिन है।

यह नियमों को साफ करने की वजह है, उन्हें धुंधला छोड़ने की नहीं।

राज्य क्या करे

पहला, महाराष्ट्र हर सूखाग्रस्त तहसील में तय अवधि के लिए कर्ज़ वसूली पर रोक की अधिसूचना लिखित रूप में जारी करे, और यह बैंकों, सहकारी समितियों, फाइनेंस कंपनियों और माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं सब पर लागू हो। मंत्री सहकारी बैंकों से जबरन वसूली रोकने को कह चुके हैं और कहा गया है कि निजी कर्ज़दाताओं के लिए भी ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं। मौखिक निर्देश काफी नहीं; अधिसूचित आदेश दरवाज़े पर खड़े एजेंट को दिखाया जा सकता है।

दूसरा, जो नियम पहले से हैं, उन्हें लागू किया जाए। भारतीय रिज़र्व बैंक कर्ज़दाताओं और उनके एजेंटों को “किसी भी तरह के, मौखिक या शारीरिक” डराने-धमकाने या उत्पीड़न से रोकता है, और सुबह 8 बजे से पहले या शाम 7 बजे के बाद कर्ज़दार को फोन करने पर भी रोक है। उसके माइक्रोफाइनेंस नियम किसी परिवार की कर्ज़ किस्तों को उसकी मासिक आय के आधे तक सीमित करते हैं। जो कर्ज़दाता इन नियमों को तोड़े, ज़िला प्रशासन उसकी शिकायत आरबीआई को करे। जिसके पास कोई लाइसेंस ही नहीं, उस पर राज्य के अपने साहूकारी कानून के तहत मुकदमा चले।

तीसरा, उत्पीड़न की हर शिकायत थाने या ज़िला हेल्पलाइन पर दर्ज हो और कुछ ही दिनों में उसका जवाब मिले, और हर तहसील में एक नामित अधिकारी ज़िम्मेदार हो। चंद्रकांत शिंदे के परिवार के पास ऐसा कोई नहीं था जिसे फोन करते और जो कार्रवाई के लिए बाध्य होता।

चौथा, राहत कर्ज़ से तेज़ चले। दिवाली से पहले दी गई 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता शुरुआत भर थी। फसल नुकसान के सर्वे पूरे होकर भुगतान हो, और सूखाग्रस्त तहसीलों में बैंक कर्ज़ों का पुनर्गठन अगली किस्त आने से पहले हो।

मुदखेड़ के किसान को अपनी जान देकर यह नहीं दिखाना चाहिए कि उसके साथ कैसा बर्ताव हो रहा था। अगले किसान को धमकियां नहीं, नियम बचाएंगे।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 10,000 रुपयेवह कर्ज़ जो परिवार के मुताबिक चंद्रकांत शिंदे ने लिया था; परिवार का कहना है कि कंपनी 70,000 रुपये मांग रही थी
  • 358 में से 304इस खरीफ सीज़न में सूखाग्रस्त घोषित महाराष्ट्र की तहसीलें
  • 465जनवरी से जून 2026 के बीच मराठवाड़ा में दर्ज किसान आत्महत्याएं, जिनमें 61 नांदेड़ में