रायहमारा मत
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली दिवाली का पटाखा प्रयोग दोहराया है। इस बार नतीजे सार्वजनिक होने चाहिए
दिल्ली-एनसीआर में दो शाम के लिए ग्रीन पटाखे लौट आए हैं, लगभग उन्हीं नियमों के साथ जो 2025 में दिवाली की अगली सुबह धुएं को नहीं रोक पाए थे। कागज़ पर अदालत का आदेश सावधानी भरा है। इसे दोहराना ठीक था या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि पुलिस और प्रदूषण बोर्ड अमल का सबूत दिखाते हैं, सिर्फ दावा नहीं करते।

इस दिवाली दो शाम दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोग फिर पटाखे जला सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 7 और 8 नवंबर को प्रमाणित ग्रीन पटाखों की इजाज़त दी, सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे के बीच, और कहा कि साल भर का प्रतिबंध 9 नवंबर से लौट आएगा। जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने इस राहत को अस्थायी बताया और इसे शर्तों में बांधा: बिक्री सिर्फ 4 से 6 नवंबर के बीच ज़िला अधिकारियों की तय जगहों पर, ऑनलाइन बिक्री नहीं, क्यूआर कोड वाले सीलबंद डिब्बे, और अस्पतालों, स्कूलों और वृद्धाश्रमों के 300 मीटर के भीतर पटाखे नहीं।
कागज़ पर यह एक सावधानी भरा आदेश है। दिक्कत यह है कि हम इसे पहले भी देख चुके हैं।
पिछले साल का प्रयोग
15 अक्टूबर 2025 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अगुवाई वाली पीठ ने दिवाली से पहले के दिन और दिवाली पर, इन्हीं दो समय-खिड़कियों में ग्रीन पटाखों की छूट दी थी। उस आदेश में भी क्यूआर जांच, बिक्री केंद्रों पर पुलिस गश्त और रोज़ाना हवा की निगरानी का निर्देश था, और अदालत ने कहा था कि वह बाद में जांचेगी कि उसके निर्देशों का पूरा, आंशिक या बिल्कुल पालन नहीं हुआ।
दिवाली की अगली सुबह राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक करीब 350, यानी “बहुत खराब” श्रेणी में गहरे था। शहर के 38 में से 36 निगरानी केंद्र लाल ज़ोन में थे, और बवाना 400 के पार चला गया। तय घंटों के काफी बाद तक देर रात पटाखे जलते रहे।
इस साल 12 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत की अपनी न्यायमित्र, वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने साफ कहा था कि समय सीमाएं “सुनने में अच्छी लगती हैं” पर लागू नहीं होतीं। “साल दर साल हम वही ढर्रा दोहराया जाता देखते हैं।”
वाजिब आपत्ति
अदालत के रुख के पक्ष में तर्क है। दिवाली लाखों परिवारों के लिए अहम है, और ऐसा पूर्ण प्रतिबंध जिसे खुलेआम तोड़ा जाए, कानून के प्रति उतनी ही अवहेलना सिखाता है जितनी ढीली छूट। लाइसेंसधारी व्यापारियों और पटाखा बनाने वाले मज़दूरों की रोज़ी दांव पर है। और दिल्ली की नवंबर की हवा मुख्य रूप से वाहनों, धूल, उद्योग, खेतों की आग और ठहरे हुए सर्द मौसम से ज़हरीली होती है; पटाखे एक तीखा उछाल जोड़ते हैं, पूरा बोझ नहीं।
पीठ साफ तौर पर सिर्फ रोक लगाने के बजाय आदतें बदलना चाहती है। उसने कहा, “प्रयास एक समग्र बदलाव लाने का है, जिसके लिए लोगों की सोच बदलनी होगी।”
यह उचित लक्ष्य है। पर कोई भी छूट उतनी ही अच्छी है जितनी उसकी निगरानी, और अगर जनता को कभी पता ही न चले कि नियम काम आए या नहीं, तो अदालत लोगों की सोच नहीं बदल सकती।
अब क्या होना चाहिए
पहला, दिल्ली पुलिस और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के एनसीआर ज़िलों की पुलिस 4 से 9 नवंबर तक रोज़ बताए कि उसने कितने बिक्री केंद्र जांचे, कितने नकली क्यूआर कोड पकड़े, क्या ज़ब्त किया और कितने लोगों पर मुकदमा चलाया। आंकड़े, प्रेस नोट नहीं।
दूसरा, प्रदूषण बोर्ड 7 और 8 नवंबर की रातों के लिए हर केंद्र के घंटेवार आंकड़े जारी करें, ताकि कोई भी देख सके कि उछाल तय समय में आया या उसके काफी बाद।
तीसरा, अदालत के निर्देश के मुताबिक नो-क्रैकर ज़ोन 7 नवंबर से पहले ज़मीन पर चिह्नित हों, ताकि लोगों को उनके बारे में उसी रात पता न चले।
आखिर में, जब 16 दिसंबर को मामला लौटे, तो अदालत खुली सुनवाई में इस साल की रिपोर्टों को पिछले साल की रिपोर्टों के साथ तौले। अगर वे दिखाएं कि समय सीमाएं फिर तोड़ी गईं, तो यह छूट अपने आप मिलने वाली सालाना रस्म नहीं बननी चाहिए। दो रातों की रोशनी की कीमत किसी शहर को हफ्ते भर की सांसों से नहीं चुकानी चाहिए।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 2रातें, 7 और 8 नवंबर, जब इस साल दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों की इजाज़त है
- 3502025 की दिवाली की अगली सुबह 8 बजे दिल्ली का अनुमानित एक्यूआई, लगभग ऐसे ही नियमों में
- 38 में 36दिल्ली के निगरानी केंद्र उस सुबह लाल ज़ोन में