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यूजीसी के समानता नियम: कैंपस में जातिगत भेदभाव पर नियम क्या कहते हैं और क्यों रुके हैं
केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह कैंपस में जातिगत भेदभाव पर यूजीसी के 2026 के नियमों पर दोबारा विचार के लिए समिति बना सकता है। ये नियम कॉलेजों से क्या मांगते हैं, इन्हें चुनौती क्यों दी गई, और समीक्षा से क्या बदल सकता है।
संक्षेप में
13 जनवरी को अधिसूचित यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2026 हर कॉलेज और विश्वविद्यालय से भेदभाव की शिकायतों के लिए समान अवसर केंद्र, समता समिति और चौबीसों घंटे की हेल्पलाइन बनाने को कहते हैं, और ऐसा न करने पर यूजीसी योजनाओं और मान्यता से बाहर किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि नियम जातिगत भेदभाव को सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ भेदभाव मानते हैं, जिससे बाकी छात्रों को वैसी सुरक्षा नहीं मिलती। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन पर रोक लगाकर 2012 के नियम बहाल कर दिए। 5 नवंबर को केंद्र ने अदालत को बताया कि वह इन नियमों पर दोबारा विचार के लिए समिति बनाने पर सोच रहा है।
यूजीसी के समानता नियम क्या हैं?
हर कॉलेज और विश्वविद्यालय के लिए भेदभाव रोकने और उससे निपटने के नियम। इनका पूरा नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2026 है। यूजीसी ने इन्हें 13 जनवरी को अधिसूचित किया, और ये डीम्ड विश्वविद्यालयों समेत देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होते हैं।
इन्होंने यूजीसी के 2012 के समानता नियमों की जगह ली। इनकी जड़ 2019 में राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तड़वी की जनहित याचिका में है। ये रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताएं हैं, जिन दोनों छात्रों ने कथित जातिगत भेदभाव के बाद आत्महत्या कर ली थी। याचिका में शिकायत थी कि 2012 के नियम लागू नहीं हो रहे, और सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को नए नियम बनाने का निर्देश दिया।
ये नियम कॉलेजों से क्या करवाते हैं?
शिकायतों के लिए स्थायी व्यवस्था। हर संस्थान को एक समान अवसर केंद्र बनाना होगा, जो समानता नीतियां चलाए और वंचित वर्गों के छात्रों का मार्गदर्शन करे। छोटे कॉलेज अपने संबद्ध विश्वविद्यालय के केंद्र पर निर्भर रह सकते हैं।
इस केंद्र के तहत एक समता समिति काम करती है, जिसकी अध्यक्षता संस्थान प्रमुख करते हैं और जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व ज़रूरी है। कैंपस में 24 घंटे की समता हेल्पलाइन, विभागों और हॉस्टलों में समता दूत, और कमज़ोर जगहों पर नज़र रखने के लिए घूमते समता दस्ते भी होने चाहिए।
शिकायत पर कार्रवाई कैसे होती है?
तय समय-सीमा में। शिकायत ऑनलाइन, लिखित, ईमेल या हेल्पलाइन से की जा सकती है, और शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जा सकती है। समता समिति को रिपोर्ट मिलने के 24 घंटे के भीतर बैठक करनी होती है और 15 कार्यदिवस में निष्कर्ष देने होते हैं। इसके बाद संस्थान प्रमुख को सात कार्यदिवस में कार्रवाई करनी होती है। जो मामले आपराधिक लगें, वे सीधे पुलिस को भेजे जाते हैं।
संस्थानों को साल में दो बार छात्रों की संरचना, पढ़ाई छोड़ने की दर और शिकायतों की स्थिति पर रिपोर्ट भी देनी होती है। यूजीसी की एक राष्ट्रीय निगरानी समिति पूरी व्यवस्था पर नज़र रखती है।
नियम न मानने वाले कॉलेज का क्या होगा?
उसे यूजीसी से काटा जा सकता है। विनियम 11 के तहत ऐसे संस्थान को यूजीसी योजनाओं से बाहर किया जा सकता है, डिग्री, ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम चलाने से रोका जा सकता है, और यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 2(एफ) और 12बी की सूची से हटाया जा सकता है, जिससे केंद्रीय अनुदान की पात्रता तय होती है। चूक कितनी गंभीर है, इसके हिसाब से और दंड भी लग सकते हैं।
नियमों को चुनौती क्यों दी गई?
एक परिभाषा को लेकर। खंड 3(सी) “जातिगत भेदभाव” को सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित करता है। एक व्यापक खंड, 3(ई), धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव को कवर करता है।
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की अगुवाई में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि खंड 3(सी) सामान्य वर्ग के छात्रों को जातिगत सुरक्षा से बाहर रखता है और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों में झूठी शिकायत पर कोई दंड नहीं है, रैगिंग का ज़िक्र नहीं है, और समता समिति में अनारक्षित वर्ग के लिए कोई सीट तय नहीं है। नियमों पर कैंपसों में विरोध हुआ: कुछ सामान्य वर्ग के समूहों ने इन्हें वापस लेने की मांग की, तो कुछ आरक्षित वर्ग के समूहों ने वापसी का विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
29 जनवरी को नियमों पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका वाला पाया और इन्हें स्थगित रखा। अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अदालत ने आदेश दिया कि अगले आदेश तक 2012 के नियम लागू रहेंगे।
न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि जब खंड 3(ई) में व्यापक परिभाषा है तो खंड 3(सी) की ज़रूरत ही क्या है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उनकी चिंता हाशिये के छात्रों की रक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था की है, और अलग हॉस्टलों जैसे किसी कदम के खिलाफ चेताया: “भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए।” माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि नियमों का मकसद समावेशी कैंपस बनाना है। इस चुनौती को 2019 के उनके मामले के साथ जोड़ दिया गया।
समानता नियम समीक्षा तक कैसे पहुंचे
- 2019राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तड़वी ने कैंपस में जातिगत भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी
- 13 जनवरी 2026यूजीसी ने समानता संवर्धन विनियम अधिसूचित किए
- 29 जनवरी 2026सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें स्थगित किया और 2012 के नियम बहाल किए
- 20 अगस्त 2026केंद्र ने अदालत को बताया कि नियमों पर पुनर्विचार हो रहा है
- 5 नवंबर 2026केंद्र ने कहा कि वह समीक्षा समिति बनाने पर विचार कर रहा है
5 नवंबर को केंद्र ने क्या कहा?
कि वह नियमों की समीक्षा के लिए समिति बना सकता है। अगस्त में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा था कि नियमों पर “पुनर्विचार हो रहा है”। गुरुवार को पीठ ने एक कदम आगे बढ़कर पूछा: “आप यूजीसी नियमों पर दोबारा विचार क्यों नहीं करते?”
श्री मेहता ने जवाब दिया कि सरकार इस मामले को इस तरह देख रही है कि कोई वर्ग खुद को उपेक्षित न समझे। उन्होंने कहा, “सरकार ने तय किया है कि हर छात्र का ध्यान रखा जाए।” अदालत ने सुनवाई टाल दी।
अब क्या बदल सकता है?
सबसे ज़्यादा संभावना परिभाषा में बदलाव की है। पीठ के अपने सवाल खंड 3(सी) पर केंद्रित थे, और याचिकाकर्ता इसे जाति-निरपेक्ष बनाना चाहते हैं। अगस्त में माताओं के वकील ने अदालत से सरकार के फैसले के लिए समय-सीमा तय करने को कहा था। जब तक नया संस्करण अधिसूचित नहीं होता या अदालत फैसला नहीं देती, नवंबर 2026 की स्थिति में कैंपस 2012 के नियमों के तहत ही चल रहे हैं।