समझिएकानून
24 घंटे का नियम: सुप्रीम कोर्ट क्यों कहता है कि घड़ी हिरासत से चलती है
संविधान कहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दिया कि ये 24 घंटे कब से गिने जाएंगे। अनुच्छेद 22(2) क्या कहता है, अदालत ने क्या फैसला दिया और पुलिस व मजिस्ट्रेटों के लिए इसका क्या मतलब है।
संक्षेप में
संविधान का अनुच्छेद 22(2), और उसी तर्ज़ पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 58, कहते हैं कि गिरफ्तार कर हिरासत में रखे गए व्यक्ति को सफर का समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर नज़दीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा। 5 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये 24 घंटे उस पल से चलते हैं जब पुलिस पहली बार किसी की आज़ादी पर रोक लगाती है, न कि औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से, और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना इससे ज़्यादा रोकना असंवैधानिक है। अब मजिस्ट्रेटों को हिरासत का असल समय दर्ज कर वहीं से गिनती करनी होगी।
24 घंटे का नियम क्या कहता है?
गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति को एक दिन के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने ले जाना होगा। संविधान का अनुच्छेद 22(2) कहता है कि गिरफ्तार कर हिरासत में रखे गए हर व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर, गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक के सफर का समय छोड़कर, नज़दीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। इस अवधि के बाद किसी को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
यही ज़िम्मेदारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 58 में है। बीएनएसएस ने सीआरपीसी की जगह ली है, जिसमें यह धारा 57 थी। मूल विचार सीधा है: किसी को बंद रखा जाए या नहीं, यह पुलिस नहीं, जज तय करेगा।
कौन इस नियम से बाहर है?
शत्रु विदेशी और निवारक निरोध कानूनों के तहत पकड़े गए लोग। अनुच्छेद 22(3) इन्हें 24 घंटे की गारंटी और गिरफ्तारी का आधार जानने के अधिकार से बाहर रखता है। पुलिस हिरासत में बाकी हर व्यक्ति, आरोप चाहे जो हो, इसके दायरे में है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल क्या था?
ये 24 घंटे कब शुरू होते हैं। पुलिस अक्सर तलाशी या पूछताछ के दौरान किसी को रोक कर रखती है और औपचारिक गिरफ्तारी बाद में दर्ज करती है। अगर घड़ी सिर्फ दर्ज गिरफ्तारी से चले, तो पहले के घंटे गिनती से बाहर रह जाते हैं।
गुरुवार को तय हुए मामले में यही हुआ था। त्रिपुरा में चार लोगों को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज़ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत तलाशी और ज़ब्ती के दौरान 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे हिरासत में लिया गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी अगले दिन सुबह 11 बजे, यानी 21 घंटे बाद, दिखाई गई। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया था।
अदालत ने क्या फैसला दिया?
कि हिरासत और गिरफ्तारी को अलग नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) में “गिरफ्तार” और “हिरासत में” शब्दों को साथ पढ़ना होगा, और “हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम भेद करने की कोई भी कोशिश संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।”
जजों ने कहा कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले तलाशी, ज़ब्ती या पूछताछ में लगे समय को गिनती से बाहर रखना “न सिर्फ कानूनन टिकाऊ नहीं, बल्कि पूरी तरह असंवैधानिक है।” सिर्फ मजिस्ट्रेट तक के सफर का समय छोड़ा जा सकता है। अदालत ने यह तर्क भी खारिज किया कि थोड़ी देर की हिरासत गिनी नहीं जाती, और कहा कि मौलिक अधिकार थोड़ी देर के लिए भी निलंबित नहीं हो सकता। जिसे पेश किए बिना 24 घंटे से ज़्यादा रखा गया हो, उसे “तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।”
अदालत ने हाई कोर्ट का आदेश रद्द कर चारों को ज़मानत दे दी, जिसकी शर्तें विशेष अदालत तय करेगी।
त्रिपुरा मामले में घंटे कैसे बीते
- 29 सितंबर 2025, दोपहर 2 बजेतलाशी और ज़ब्ती के दौरान चार लोग हिरासत में
- 30 सितंबर 2025, सुबह 11 बजेपुलिस ने 21 घंटे बाद औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज की
- 30 सितंबर 2025, दोपहर 2 बजेहिरासत से 24 घंटे पूरे, अदालत ने यही समय-सीमा मानी
- 5 नवंबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश रद्द कर ज़मानत दी
क्या पहले अदालतों की राय अलग-अलग थी?
हाई कोर्टों ने अलग-अलग रुख अपनाए थे। अप्रैल में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक एनडीपीएस मामले में कहा कि घड़ी असल रोक के समय से चलती है और दर्ज गिरफ्तारी का समय “महज़ घोषणात्मक” है। उसने यह भी कहा कि जिसे सिर्फ बुलाया गया हो और जो जाने के लिए आज़ाद हो, वह हिरासत में नहीं है। अगस्त में केरल हाई कोर्ट ने संकरा रुख लिया: जहां कोई कानून गिरफ्तारी से पहले हिरासत की साफ इजाज़त देता है, जैसे एनडीपीएस अधिनियम, पीएमएलए और सीमा शुल्क अधिनियम, वहां गिनती औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होती है।
गुरुवार का फैसला, जो एक एनडीपीएस मामले में आया, व्यापक रुख अपनाता है कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले का समय गिना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला होने के नाते यह देश की हर अदालत पर बाध्यकारी है।
पुलिस के लिए क्या बदला?
मायने उस समय के हैं जब आज़ादी पर रोक लगी, न कि जब मेमो पर दस्तखत हुए। जो अधिकारी गिरफ्तारी दर्ज करने से पहले किसी को लंबी तलाशी या पूछताछ में रोके रखते हैं, उनके मजिस्ट्रेट तक पहुंचने से पहले ही 24 घंटे खत्म हो सकते हैं, और उल्लंघन का मतलब रिहाई हो सकता है।
पीठ ने जांच की ज़िम्मेदारी मजिस्ट्रेटों पर डाली है। उन्हें “व्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगने की असल तारीख और समय दर्ज करना” होगा और वहीं से गिनती करनी होगी। सिर्फ समय-सीमा पूरी करना काफी नहीं: धारा 58 के तहत हिरासत उचित भी होनी चाहिए, और अगर ऐसा नहीं है तो मजिस्ट्रेट आगे की रिमांड से इनकार कर सकते हैं।
अगर पुलिस नियम तोड़े तो?
गिरफ्तारी ही गैरकानूनी हो जाती है। सितंबर में इन्हीं दो जजों ने जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य मामले में कहा था कि अनुच्छेद 22(1) या 22(2) का उल्लंघन कर की गई गिरफ्तारी असंवैधानिक है। इस वजह से रिहा हुए व्यक्ति को पुलिस सीधे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती: उसे मजिस्ट्रेट के पास अर्ज़ी देनी होगी, पहले की चूक बतानी होगी और किसी वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन लगाना होगा। गंभीर उल्लंघनों, जैसे पेश किए बिना लंबी हिरासत, में अदालतें राज्य को मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती हैं।
मूल दस्तावेज़
- Article 22: Protection against arrest and detention in certain casesConstitution of India (constitutionofindia.net), 26 जनवरी 1950