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गोवा में आदिवासी सीटें: हाई कोर्ट की रोक के बाद एसटी आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंच रही है
गोवा में आज तक विधानसभा की एक भी सीट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित नहीं हुई, जबकि वे राज्य की आबादी का करीब दसवां हिस्सा हैं। 2025 का एक कानून 2027 के चुनाव से पहले यह बदलने वाला था। हाई कोर्ट की रोक ने इसे अटका दिया है, और राज्य सरकार का कहना है कि वह बुधवार तक सुप्रीम कोर्ट जाएगी।
संक्षेप में
गोवा की अनुसूचित जनजातियां, मुख्य रूप से गावड़ा, कुणबी और वेळीप समुदाय, 2003 में एसटी सूची में जोड़ी गईं, यानी 2001 की जनगणना के बाद, जिस पर मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों का नक्शा टिका है। इसलिए गोवा की 40 विधानसभा सीटों में से कोई भी उनके लिए आरक्षित नहीं है। संसद के 2025 के कानून के तहत जनगणना आयुक्त उनकी आबादी का अनुपात आंकेंगे और फिर चुनाव आयोग 2027 के चुनाव से पहले सीटें, संभवतः चार, आरक्षित करेगा। 29 अक्टूबर को बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने कानून को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई तक आयुक्त को यह अनुमान अधिसूचित करने से रोक दिया। गोवा सरकार का कहना है कि वह बुधवार, 4 नवंबर तक सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेगी।
गोवा में आदिवासी सीटें क्यों नहीं हैं?
क्योंकि जनजातियों की गिनती बहुत देर से हुई। गोवा में विधानसभा की 40 सीटें हैं। इनमें से एक, पेरनेम, अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है। अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं है, जबकि वे राज्य की आबादी का करीब दसवां हिस्सा हैं।
इसकी वजह समय है। संविधान के तहत एसटी के लिए सीटें किसी राज्य की आबादी में उनके अनुपात के हिसाब से आरक्षित होती हैं, और देश भर में निर्वाचन क्षेत्रों का मौजूदा नक्शा 2001 की जनगणना के आधार पर बना था। 2001 में गोवा में करीब 13 लाख की आबादी में सिर्फ 566 आदिवासी दर्ज हुए। फिर जनवरी 2003 में केंद्र ने गावड़ा, कुणबी और वेळीप समुदायों को गोवा की एसटी सूची में जोड़ा।
2011 की जनगणना तक गोवा में एसटी आबादी 1.49 लाख, यानी करीब 10.2% हो गई थी। लेकिन संविधान 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े छपने तक सीटों के पुनर्समायोजन पर रोक लगाता है, इसलिए उस गिनती से कोई सीट आरक्षित नहीं हो सकी।
संसद ने इसके लिए क्या किया?
गोवा के लिए एक खास कानून पास किया। आदिवासी संगठनों ने दो दशक से ज़्यादा आंदोलन किया। गोवा विधानसभा ने जुलाई 2023 में प्रस्ताव पारित किया, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च 2024 में विधेयक को मंज़ूरी दी, और 2024 में और फिर 2025 के मध्य में लोकसभा में अटकने के बाद अगस्त 2025 में संसद ने इसे पारित कर दिया। गोवा राज्य के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व का पुनर्समायोजन अधिनियम अगस्त 2026 में लागू हुआ।
कानून दो चरणों में काम करता है। पहले, धारा 3(1) के तहत जनगणना आयुक्त गोवा की आबादी में एसटी का अनुपात आंकते हैं और उसे सरकारी गज़ट में प्रकाशित करते हैं। फिर चुनाव आयोग जनता की आपत्तियां मंगाने के बाद गोवा के निर्वाचन क्षेत्र तय करने वाले आदेश में बदलाव कर उसी अनुपात में सीटें आरक्षित करता है। यह बदलाव अगले विधानसभा चुनाव से लागू होगा, जो 2027 की शुरुआत में होने हैं।
गोवा के नेताओं को उम्मीद है कि करीब चार सीटें आरक्षित होंगी, बड़ी आदिवासी आबादी वाले इलाकों में, जैसे सांगे, केपे, प्रियोळ और नुवें।
हाई कोर्ट ने क्या रोका?
पहला चरण। गोवा के निवासी एडविन लूसियो फर्नांडिस ने इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी है। उनकी याचिका का तर्क है कि 2026 के बाद की पहली जनगणना पूरी होने तक आरक्षित सीटें दोबारा तय नहीं की जा सकतीं, और कोई खास कानून इस नियम को दरकिनार नहीं कर सकता। उनके वकीलों ने यह भी कहा कि एक बार आबादी का आंकड़ा अधिसूचित हो गया तो वह अंतिम हो जाएगा और किसी अदालत में उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकेगा।
29 अक्टूबर को न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेज़ेस और न्यायमूर्ति अमित एस जामसांडेकर की पीठ ने आदेश दिया कि याचिका के निपटारे तक जनगणना आयुक्त भारत के गज़ट में यह अनुमान अधिसूचित नहीं करेंगे।
अदालत को अनुमान पर शक क्यों हुआ?
क्योंकि जनगणना आयुक्त की अपनी चिट्ठी में माना गया था कि आंकड़े कमज़ोर हैं। 10 सितंबर को केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेजे पत्र में आयुक्त ने कहा था कि उपलब्ध जानकारी गोवा की मौजूदा आबादी तय करने या आंकने के लिए काफी नहीं है। फिर भी उसी पत्र में कहा गया कि 2001 की जनगणना के आधार पर एसटी का अनुपात करीब 9.9% “उचित रूप से माना जा सकता है”। पीठ ने पूछा कि आयुक्त की अपनी स्वीकारोक्ति के बावजूद यह नतीजा कैसे निकाला जा सकता है।
आदिवासी सीटों तक गोवा का लंबा सफर
- 2001जनगणना में गोवा में 566 आदिवासी दर्ज; बाद में इसी गिनती पर सीटों का नक्शा बना।
- जनवरी 2003गावड़ा, कुणबी और वेळीप समुदाय गोवा की एसटी सूची में जुड़े।
- 2011जनगणना में 1.49 लाख एसटी, गोवा की आबादी का करीब 10.2%।
- अगस्त 2025संसद ने गोवा एसटी पुनर्समायोजन कानून पारित किया।
- अगस्त 2026कानून लागू हुआ।
- 10 सितंबर 2026जनगणना आयुक्त ने एसटी अनुपात करीब 9.9% आंका।
- 29 अक्टूबर 2026गोवा में हाई कोर्ट ने अनुमान की अधिसूचना पर रोक लगाई।
- 4 नवंबर 2026सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की गोवा सरकार की समय-सीमा।
गोवा अब क्या कर रहा है?
लड़ाई सुप्रीम कोर्ट ले जा रहा है। विधानसभा अध्यक्ष गणेश गावकर और कला एवं संस्कृति मंत्री रमेश तावडकर समेत एक प्रतिनिधिमंडल सोमवार को नई दिल्ली गया। इसमें शामिल गोवा के एनआरआई आयुक्त नरेंद्र सवाईकर ने कहा कि राज्य रोक हटवाने की कोशिश करेगा और “बुधवार तक सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करेगा।”
मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत कह चुके हैं कि उनकी सरकार विधानसभा में आदिवासी समुदायों के आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और केंद्र से भी, जिसने यह कानून बनाया और जनगणना आयुक्त की नियुक्ति की, अदालत जाने का आग्रह करेगी।
समय इतना अहम क्यों है?
क्योंकि चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं। गोवा में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। चुनाव आयोग जनगणना आयुक्त के आंकड़े के बिना आरक्षित सीटें नहीं बना सकता, और उसके बाद उसे आपत्तियां मंगाकर सुननी होंगी। हर हफ्ते की देरी चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से पहले यह काम पूरा करना और मुश्किल बना देती है।
नई राष्ट्रीय जनगणना समय पर काम नहीं आएगी। ज़्यादातर भारत की गिनती फरवरी 2027 में होनी है, और उसके आंकड़े छपने में काफी ज़्यादा वक्त लगेगा।
सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?
रोक हटा सकता है, बनाए रख सकता है, या पूरा मामला खुद सुन सकता है। अगर रोक हटती है तो आयुक्त अनुमान अधिसूचित कर सकेंगे और चुनाव आयोग चार आदिवासी सीटों पर काम शुरू कर सकेगा। अगर रोक बनी रहती है तो गोवा शायद 2027 में पुराने नक्शे पर ही वोट डालेगा, और उसके आदिवासी समुदायों को 2026 के बाद की जनगणना और नए परिसीमन का इंतज़ार करना होगा। दोनों ही सूरत में अदालत को उन दो बातों को तौलना होगा जिनकी संविधान परवाह करता है: तारीखों के एक संयोग से छूट गए समूहों का उचित प्रतिनिधित्व, और यह नियम कि आरक्षित सीट गिनती से तय होती है, अनुमान से नहीं।