राज्यहिमाचल प्रदेश
सुप्रीम कोर्ट से जीत के बाद हिमाचल को 20 साल में मिलेगी बीबीएमबी की 11,973 मिलियन यूनिट बिजली, सुक्खू बोले लड़ाई जारी
अदालत ने 1996 से चल रहा विवाद यह कहकर निपटाया कि बकाया नकद नहीं, बिजली के रूप में चुकाया जाएगा। महाधिवक्ता अनूप कुमार रतन ने इसे दिवाली का तोहफा बताया; भाजपा का कहना है कि श्रेय केस लड़ने वाली हर सरकार को जाता है।

मुख्य बातें
- पंजाब और हरियाणा को 20 साल में बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देनी होगी।
- राज्य के महाधिवक्ता के अनुसार इससे हर साल ₹600 करोड़ से ₹800 करोड़ की आमदनी होगी।
- मुख्यमंत्री सुक्खू अब वॉटर सेस और शानन परियोजना की लड़ाई तेज करेंगे।
हिमाचल प्रदेश को अगले 20 साल में भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं से 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने वह विवाद निपटा दिया है जिसे यह पहाड़ी राज्य 1996 में अदालत ले गया था। राज्य के महाधिवक्ता अनूप कुमार रतन ने शुक्रवार शाम शिमला में प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस फैसले को हिमाचल के लिए “दिवाली का तोहफा” बताया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची व वी. मोहना की पीठ ने नकद रहित समझौते को मंजूरी दी: हिमाचल को दशकों का बकाया पैसे में देने के बजाय पंजाब और हरियाणा बीबीएमबी के बांधों से बिजली देंगे। पंजाब चाहता था कि यह बिजली 30 साल में दी जाए, हिमाचल 10 साल चाहता था और अटॉर्नी जनरल ने 15 साल का प्रस्ताव रखा था। अदालत ने 20 साल तय किए।
राज्य को कितनी कमाई की उम्मीद
रतन ने ₹10 प्रति यूनिट की औसत कीमत मानकर इस समझौते की कीमत हर साल ₹600 करोड़ से ₹800 करोड़ आंकी, यानी दो दशक में करीब ₹15,000 करोड़। उन्होंने कहा कि बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच ली जाएगी, जब दाम आमतौर पर ऊंचे रहते हैं, ताकि राज्य अपनी अतिरिक्त बिजली बेहतर दाम पर बेच सके।
रतन के मुताबिक बिजली की बढ़ती मांग और बाजार दरों को देखते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने ही तय किया कि राज्य नकद की जगह बिजली लेगा। हरियाणा ने अदालत के सामने अटॉर्नी जनरल के नोट पर सहमति दी थी, जबकि पंजाब आखिरी दौर तक दावे का विरोध करता रहा; पीठ ने उसकी आपत्तियां नहीं मानीं।

दिन में पहले चंबा में पत्रकारों से बात करते हुए सुक्खू ने कहा कि यह उनकी निजी जीत नहीं, बल्कि हिमाचल की जनता की जीत है। उन्होंने अनुमान लगाया कि ₹6 प्रति यूनिट पर राज्य सालाना करीब ₹500 करोड़ कमा सकता है, और बताया कि हिमाचल इस समय राजस्थान को ₹15.50, केरल को ₹14.50 और तमिलनाडु को ₹13.50 प्रति यूनिट बिजली बेच रहा है।
उन्होंने साफ किया कि वह इस केस को मामले का अंत नहीं मानते। उन्होंने कहा कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और सरकार अब कानूनी मोर्चे पर प्रयास तेज करेगी। उन्होंने पनबिजली पर वॉटर सेस और मंडी के जोगिंदरनगर में शानन पनबिजली परियोजना की वापसी का जिक्र किया, जिसे पंजाब चलाता है।
विवाद की शुरुआत
हिमाचल का दावा पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 पर टिका है, जिसने उसे उत्तराधिकारी राज्य बनाया। सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बीबीएमबी परियोजनाओं में उसका हिस्सा 7.19% तय किया, जो भाखड़ा के लिए नवंबर 1966 से और देहर व पौंग परियोजनाओं के लिए 1970 के दशक के आखिर से देय था। पंजाब और हरियाणा ने बकाया कभी नहीं चुकाया। जुलाई की सुनवाई में अदालत ने पंजाब से कहा था कि उसके डिक्री का पालन करना होगा, और केंद्र ने बिजली की यूनिटों में समझौते का प्रस्ताव रखा था।
भाजपा: श्रेय हर सरकार का
विपक्षी भाजपा ने फैसले का स्वागत किया, लेकिन मुख्यमंत्री के श्रेय लेने पर आपत्ति जताई। पार्टी के प्रवक्ता और विधायक रणधीर शर्मा ने शिमला में पत्रकारों से कहा कि 1996 से सभी दलों की सरकारों ने यह केस लड़ा है, और याद दिलाया कि शांता कुमार की भाजपा सरकार ने राज्य के लिए 12% मुफ्त बिजली हासिल की थी। उन्होंने कहा कि पूरा आकलन फैसले की पूरी प्रति पढ़ने के बाद ही हो सकेगा।
जुलाई में खुद अदालत ने कहा था कि अपनी नदियों के अलावा कमाई के कम साधनों वाले हिमाचल के पास पड़ोसी राज्यों जितने संसाधन नहीं हैं। रतन ने कहा कि इस फैसले से राज्य को आने वाले वर्षों में राजस्व का स्थायी स्रोत मिलेगा।