समझिएऊर्जा
ऊर्जा भंडारण वीजीएफ क्या है: सौर बिजली को शाम के लिए बचाने पर भारत ₹14,500 करोड़ क्यों खर्च कर रहा है
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को 92 गीगावाट-घंटे ग्रिड भंडारण के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग को मंज़ूरी दी, जो अब तक का सबसे बड़ा दौर है, और लिथियम व निकल संयंत्रों के लिए अलग योजना भी। वायबिलिटी गैप फंडिंग क्या होती है, भारत की सौर कहानी में भंडारण अब सबसे बड़ी कमी क्यों है, और पैसा कैसे बंटेगा।
संक्षेप में
वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) सरकार का एकमुश्त अनुदान है, जो ऐसी परियोजना की लागत का एक हिस्सा उठाता है जो बननी चाहिए, लेकिन खरीदारों की पहुंच वाली कीमत पर अपना खर्च नहीं निकाल पाती। भारत के ग्रिड को भंडारण की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि सौर बिजली दोपहर में भरपूर आती है, जबकि मांग सूरज ढलने के बाद चरम पर होती है। मंत्रिमंडल की ₹14,500 करोड़ की योजना 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी और 92 गीगावाट-घंटे भंडारण जोड़ने का लक्ष्य रखती है: 60 गीगावाट-घंटे पंप्ड हाइड्रो से और 30 गीगावाट-घंटे बैटरी से। परियोजनाएं प्रतिस्पर्धी बोली से दी जाएंगी और बैटरी के लिए 40% स्वदेशी सामग्री ज़रूरी होगी। ₹2,814 करोड़ की दूसरी योजना चार लिथियम और निकल प्रसंस्करण संयंत्रों का खर्च आंशिक रूप से उठाएगी ताकि बैटरी की आपूर्ति श्रृंखला का ज़्यादा हिस्सा देश में बने।
मंत्रिमंडल ने क्या मंज़ूरी दी?
दो योजनाएं, जो मिलकर भारत की बैटरी और भंडारण श्रृंखला खड़ी करना चाहती हैं। पहली योजना 2026-27 से 2030-31 के बीच 92 गीगावाट-घंटे (जीडब्ल्यूएच) ग्रिड-स्तर का ऊर्जा भंडारण बनाने के लिए ₹14,500 करोड़ की वायबिलिटी गैप फंडिंग देती है। यह देश की मौजूदा ग्रिड-स्तर भंडारण क्षमता का 170% है। ₹2,814 करोड़ की दूसरी योजना पांच साल में लिथियम और निकल, यानी बैटरी में लगने वाली धातुओं, का प्रसंस्करण करने वाले संयंत्रों का खर्च आंशिक रूप से उठाएगी।
भंडारण का लक्ष्य तीन हिस्सों में बंटा है: 60 गीगावाट-घंटे पंप्ड हाइड्रो से, 30 गीगावाट-घंटे बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (बीईएसएस) से और 2 गीगावाट-घंटे दूसरी तकनीकों से। सरकार को उम्मीद है कि इससे करीब ₹97,600 करोड़ का निवेश आएगा।
वायबिलिटी गैप फंडिंग क्या है?
एकमुश्त अनुदान, जो परियोजना की लागत और खरीदार की भुगतान क्षमता के बीच का फासला भरता है।
कुछ परियोजनाएं देश के लिए फायदेमंद होती हैं, लेकिन उपभोक्ता जो कीमत दे सकता है उस पर मुनाफा नहीं कमा पातीं। भंडारण संयंत्र इसका सटीक उदाहरण है: अगर डेवलपर को पूरी लागत बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) से वसूलनी हो, तो टैरिफ इतना ऊंचा होगा कि वे करार नहीं करेंगी। सरकार पूंजीगत लागत का एक हिस्सा पहले ही दे देती है, आमतौर पर क्षमता की हर इकाई पर तय रकम के रूप में। तब डेवलपर कम टैरिफ पर भी लागत निकाल लेता है और परियोजना बन जाती है।
परियोजनाएं टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली से दी जाती हैं, यानी डेवलपर अनुदान को ध्यान में रखकर उस कीमत पर होड़ करते हैं जो वे वसूलेंगे।
भारत को भंडारण की ज़रूरत ही क्यों है?
क्योंकि जब मांग बढ़ती है, तभी सूरज ढल जाता है। भारत के ग्रिड पर सबसे तेज़ी से बढ़ रहा स्रोत, सौर ऊर्जा, ज़्यादातर बिजली दोपहर के आसपास बनाता है। मांग बाद में, शाम को चरम पर पहुंचती है, जब घरों में बत्तियां, पंखे और एसी चलते हैं। भंडारण के बिना दोपहर की सस्ती सौर बिजली कभी-कभी बर्बाद हो जाती है, जबकि शाम के लिए महंगे कोयला संयंत्रों को तैयार रखना पड़ता है।

भंडारण यही बेमेल दूर करता है: बिजली ज़्यादा होने पर उसे सोख लेता है और ज़रूरत पड़ने पर छोड़ देता है। केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पिछले साल साफ कहा था: “बीईएसएस बेहद ज़रूरी है, खासकर गैर-सौर घंटों में चरम मांग पूरी करने के लिए।” सरकार का अब अनुमान है कि भारत को 2031-32 तक 411 गीगावाट-घंटे भंडारण की ज़रूरत होगी।
गीगावाट और गीगावाट-घंटे में क्या फर्क है?
एक रफ्तार मापता है, दूसरा आकार। गीगावाट (जीडब्ल्यू) बताता है कि कोई संयंत्र किसी एक पल में कितनी बिजली दे सकता है। गीगावाट-घंटा (जीडब्ल्यूएच) बताता है कि वह कितनी ऊर्जा जमा रख सकता है। 1 गीगावाट की बैटरी अगर दो घंटे चले तो वह 2 गीगावाट-घंटे जमा करती है। भंडारण के लक्ष्य गीगावाट-घंटे में दिए जाते हैं क्योंकि असल सवाल यह है कि जमा बिजली कितनी देर तक बत्तियां जलाए रख सकती है।
इतना पंप्ड हाइड्रो क्यों?
क्योंकि यह बहुत ज़्यादा ऊर्जा लंबे समय तक जमा रख सकता है। पंप्ड हाइड्रो संयंत्र में अलग-अलग ऊंचाई पर दो जलाशय होते हैं। बिजली सस्ती होने पर पानी ऊपर पंप किया जाता है। मांग चरम पर होने पर वही पानी टर्बाइनों से होकर नीचे गिराया जाता है। ऐसे संयंत्र दशकों चलते हैं और कई घंटे लगातार बिजली दे सकते हैं, हालांकि इन्हें बनाने में बरसों लगते हैं और सही भू-भाग चाहिए।
बैटरियां जल्दी लग जाती हैं और पल भर में प्रतिक्रिया देती हैं, इसलिए कम अवधि में ग्रिड को स्थिर रखने में अच्छी हैं। योजना में ज़्यादातर क्षमता पंप्ड हाइड्रो को दी गई है, लेकिन बैटरी का हिस्सा भी बड़ा है।
मदद कैसे बढ़ी है?
एक छोटी शुरुआत से कहीं बड़े दौर तक। सितंबर 2023 में मंत्रिमंडल ने पहली बैटरी योजना मंज़ूर की थी: 4,000 मेगावाट-घंटे के लिए ₹3,760 करोड़ की बजटीय मदद, जो हर परियोजना की पूंजीगत लागत का 40% तक उठाती थी। तब के मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा था, “हमारे पास क्षमता नहीं है।” जून 2025 में बिजली मंत्रालय ने पावर सिस्टम डेवलपमेंट फंड से 30 गीगावाट-घंटे बैटरी के लिए ₹18 लाख प्रति मेगावाट-घंटा की दर से ₹5,400 करोड़ और जोड़े।
ग्रिड भंडारण के लिए भारत की मुहिम
- सितंबर 2023मंत्रिमंडल ने 4,000 मेगावाट-घंटे बैटरी के लिए ₹3,760 करोड़ की वीजीएफ मंज़ूर की
- जून 2025बिजली मंत्रालय ने 15 राज्यों और एनटीपीसी में 30 गीगावाट-घंटे बैटरी के लिए ₹5,400 करोड़ जोड़े
- 4 नवंबर 2026मंत्रिमंडल ने 92 गीगावाट-घंटे भंडारण के लिए ₹14,500 करोड़ मंज़ूर किए, ज़्यादातर पंप्ड हाइड्रो
- 4 नवंबर 2026लिथियम और निकल प्रसंस्करण के लिए अलग ₹2,814 करोड़ की योजना
- 2031-32सरकार के अनुमान में भारत को 411 गीगावाट-घंटे भंडारण चाहिए
पैसा किसे और किन शर्तों पर मिलेगा?
बैटरी और पंप्ड हाइड्रो परियोजनाओं के लिए सरकारी और निजी डिस्कॉम को। दूसरी तकनीकों वाली परियोजनाओं के लिए सरकारी और निजी कंपनियां भी मदद पा सकती हैं। बैटरी परियोजनाओं में कम से कम 40% स्वदेशी सामग्री होनी चाहिए, यानी उपकरणों का बड़ा हिस्सा भारत में बना हो। सरकारी बयान के मुताबिक इससे “भारत के घरेलू ऊर्जा भंडारण विनिर्माण तंत्र” को मज़बूती मिलेगी।
लिथियम और निकल की बात कहां आती है?
बैटरियों को इनकी ज़रूरत है, और भारत इनमें से किसी का भी बहुत कम शोधन करता है। भारत परिष्कृत, उच्च शुद्धता वाले लिथियम, निकल और कोबाल्ट के लिए अब भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है। नई प्रसंस्करण योजना कम से कम 30 किलोटन क्षमता वाले दो लिथियम संयंत्रों और कम से कम 50 किलोटन क्षमता वाले दो निकल संयंत्रों को 30% पूंजीगत सब्सिडी देगी, जिसकी सीमा प्रति संयंत्र क्रमशः ₹500 करोड़ और ₹900 करोड़ है।
भंडारण की तरह यहां भी सबसे कम मदद मांगने वाले बोलीदाता जीतेंगे, और पैसा तीन किस्तों में तय पड़ाव पूरे होने पर जारी होगा। दोनों फैसलों को साथ पढ़ें तो लक्ष्य साफ है: परिष्कृत धातु से बैटरी सेल तक, और ऐसे ग्रिड तक जो अंधेरा होने के बाद भी सौर बिजली बहाता रहे।