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यूजीसी के जातिगत भेदभाव विरोधी नियम सुधारने हों तो सुधारें, पर किसी समिति में दफ़न न होने दें

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह कैंपसों के लिए बने समानता नियमों पर दोबारा विचार के लिए समिति बना सकता है। हर छात्र तक सुरक्षा बढ़ाना जायज़ लक्ष्य है। लेकिन रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौतों से निकले सुरक्षा उपायों को समीक्षा के बहाने टालना जायज़ नहीं होगा।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक जायज़ सवाल पूछा। “आप यूजीसी नियमों पर दोबारा विचार क्यों नहीं करते?” मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने केंद्र से पूछा, और कहा कि हर छात्र के हित की रक्षा होनी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि सरकार कैंपसों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों की समीक्षा के लिए समिति पर विचार कर रही है, ताकि कोई वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस न करे।

समीक्षा नियमों को बेहतर बना सकती है। वह वह जगह भी बन सकती है जहां ये नियम चुपचाप दम तोड़ दें। इनमें से क्या होगा, यह इस पर निर्भर है कि सरकार आगे क्या करती है।

नियम यहां तक कैसे पहुंचे

यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 को 13 जनवरी को 2012 की अधिसूचना की जगह लेने के लिए अधिसूचित किया गया था। इनकी जड़ में 2019 की वह जनहित याचिका है जो रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दायर की थी। दोनों छात्रों के परिवारों का कहना है कि जातिगत भेदभाव ने उन्हें अपनी जान लेने पर मजबूर किया। नए नियम हर कॉलेज और विश्वविद्यालय से समान अवसर केंद्र और समानता समितियां बनाने और शिकायतों की जांच करने को कहते हैं।

सोलह दिन बाद अदालत ने नियमों को स्थगित रख दिया। उसने इन्हें प्रथम दृष्टया “अस्पष्ट” और “दुरुपयोग के लायक” बताया और चेताया कि इनसे “समाज बंट सकता है”। इस बीच 2012 के नियम लागू हैं, वही नियम जिन्हें बहुत कमज़ोर मानकर ये परिवार अदालत गए थे।

जायज़ आपत्ति

याचिकाकर्ताओं की एक बात गंभीरता से लेने लायक है। नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को कवर करती है, और उनकी दलील है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्र के पास कोई उपाय नहीं बचता। बराबरी सुनिश्चित करने वाला नियम ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि कुछ छात्रों की सुनवाई हो और कुछ की नहीं।

यह दलील सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की है, उसे कमज़ोर करने की नहीं। जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता या भाषा के आधार पर परेशान किए गए किसी भी छात्र को शिकायत करने का हक होना चाहिए। यह बदलाव कुछ पंक्तियों में हो सकता है, समान अवसर केंद्रों या जांच की ज़िम्मेदारी को खत्म किए बिना।

जो बात वापस नहीं आनी चाहिए, वह है “झूठी” शिकायतों पर सज़ा का विचार। इसे मसौदे से अच्छे कारण से हटाया गया था। दोनों परिवारों की वकील दिशा वाडेकर ने साफ़ कहा: “‘झूठे मामलों’ वाली धारा उन्हें कोई भी शिकायत दर्ज करने से रोकेगी।” समिति पहले ही चरण में किसी बेबुनियाद शिकायत को खारिज कर सकती है।

समीक्षा को क्या करना चाहिए

पहला, उसकी समय सीमा हफ़्तों में तय हो, खुला-छोड़ा काम नहीं। स्थगन को नौ महीने हो चुके हैं, और 2012 के नियमों के तहत बीता हर महीना ऐसा महीना है जिसमें परिवारों की याचिका व्यवहार में हारी हुई है।

दूसरा, समिति के सदस्य और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हों, और वह सिर्फ़ संस्थानों और याचिकाकर्ताओं को नहीं, भेदभाव झेल चुके छात्रों को भी सुने।

तीसरा, उसे उस कमज़ोरी को दूर करना चाहिए जिसकी ओर यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने इशारा किया है: शिकायतें संस्थान प्रमुखों के तहत निपटाई जाती हैं, जिनके पास उन्हें दबाने की वजहें हो सकती हैं। कॉलेज से बाहर किसी के पास अपील का रास्ता शब्दों के किसी भी बदलाव से ज़्यादा निष्पक्षता लाएगा।

पीठ ने कहा कि युवा पीढ़ी का ख्याल रखा जाना चाहिए। जिन छात्रों के लिए ये नियम लिखे गए थे, वे भी उसी पीढ़ी का हिस्सा हैं।