बुधवार, 4 नवंबर
भारत और दुनिया,
हिंदी और अंग्रेज़ी में
सेंसेक्स 77,301.40 +0.50%निफ्टी 50 23,960.60 +0.63%₹ / $ 94.64

रायहमारा मत

बाल श्रम पर विशेष प्रकोष्ठ स्वागत योग्य है, पर उसके साथ समय-सीमा, गिनती और सार्वजनिक रिपोर्ट भी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से बाल श्रम पर रोक लागू कराने के लिए एक प्रकोष्ठ बनाने को कहा है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों से हर तरह का काम कराना दस साल से कानूनन मना है। कमी नियम की नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले लोगों, आंकड़ों और इच्छाशक्ति की रही है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
गांधी न्यूज़ ग्राफ़िक: 2016 से कागज़ पर रोक, अब प्रकोष्ठ का आदेश
गांधी न्यूज़ ग्राफ़िक: 2016 से कागज़ पर रोक, अब प्रकोष्ठ का आदेशGraphic: Gandhi News

कानून दस साल से साफ है। 2016 के संशोधन के बाद से भारत में 14 साल से कम उम्र के किसी बच्चे से किसी भी पेशे या प्रक्रिया में काम नहीं कराया जा सकता, सिवाय स्कूल के बाद पारिवारिक काम में हाथ बंटाने की एक सीमित छूट के। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से मान लिया कि साफ कानून और लागू कानून एक बात नहीं है। उसने केंद्र से रोक पर नज़र रखने के लिए विशेष प्रकोष्ठ बनाने को कहा, और राज्यों को उनके मुख्य सचिवों के ज़रिए इसे सख्ती से लागू करने के निर्देश देने को कहा।

यह आदेश हेल्थ फॉर मिलियंस की 2009 से लंबित याचिका को बंद करता है। जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि अब बचा हुआ सवाल 2016 के संशोधन को “पूरी तरह और पूर्ण रूप से लागू करने” का है। कसौटी सही है। पर यह वही कसौटी है जिस पर देश अब तक खरा नहीं उतरा।

करोड़ों में नापी जाने वाली खाई

आखिरी पूरी गिनती, 2011 की जनगणना, में 5 से 14 साल के करीब 1.01 करोड़ बच्चे काम करते पाए गए थे, यानी हर सौ में लगभग चार। पुलिस के आंकड़े बिल्कुल अलग कहानी कहते हैं। 2016 से 2021 के बीच पूरे देश में बाल श्रम कानून के तहत 3,000 से भी कम मामले दर्ज हुए, यानी साल में कुछ सौ।

काम खत्म नहीं हुआ है, बस दर्ज नहीं हो रहा। एनफोल्ड और सिविकडेटालैब के 2025 के एक अध्ययन ने छह राज्यों के अदालती रिकॉर्ड खंगाले और पाया कि अध्ययन वाले राज्यों में अदालतों में पुलिस आंकड़ों से करीब आठ गुना ज़्यादा बाल श्रम के मामले थे। जब सरकारी आंकड़े अदालतों और परिवारों की हकीकत से इतने दूर हों, तो समस्या कानून की कमी नहीं, गिनने वाले की कमी है।

तीस साल के प्रकोष्ठ

अदालत पहली बार व्यवस्था नहीं मांग रही। 1996 में एमसी मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में उसने मालिकों को गैरकानूनी रूप से काम पर रखे हर बच्चे के लिए ₹20,000 एक कल्याण कोष में जमा करने का आदेश दिया था, और हर राज्य से अपने श्रम विभाग में अलग प्रकोष्ठ बनाने को कहा था, जिसमें ज़िला कलेक्टर निरीक्षकों पर निगरानी रखें। दिल्ली में बना नया प्रकोष्ठ भी उन आदेशों जैसा ही रह जाएगा, अगर उसे ताकत न दी गई।

यह सवाल भी है कि कमान किसके हाथ में होगी। अदालत ने प्रकोष्ठ महिला एवं बाल विकास सचिव के अधीन रखा है, जबकि कानून श्रम मंत्रालय चलाता है और उसे राज्यों के श्रम निरीक्षक लागू करते हैं। जो प्रकोष्ठ निरीक्षकों को निर्देश दिए बिना सिर्फ निगरानी करे, वह चिट्ठियां पैदा करेगा, बचाव नहीं।

एक जायज़ आपत्ति

बहुत से बच्चे इसलिए काम करते हैं क्योंकि उनके परिवार उस कमाई के बिना नहीं चल पाते। जो छापा किसी बच्ची को वर्कशॉप से निकालकर उसी गरीबी में घर भेज दे, वह ज़्यादा भला नहीं करता, और परिवार को उसे कहीं और छिपाकर काम कराने की ओर धकेल सकता है। पारिवारिक काम की छूट को खींचना भी आसान है। जो गरीबी और कमज़ोर स्कूल पैदा करते हैं, उसे सिर्फ सख्ती ठीक नहीं कर सकती।

यह ऐसी सख्ती की दलील है जिसके साथ पुनर्वास, पढ़ाई और परिवारों के लिए पैसा हो, सख्ती के खिलाफ दलील नहीं। 1996 का आदेश यह समझता था; उसने मुआवज़े को बच्चे की पढ़ाई से जोड़ा था।

केंद्र को क्या करना चाहिए

पहला, प्रकोष्ठ समय-सीमा, बजट और एक नामित अधिकारी के साथ बने, और राज्यों के श्रम निरीक्षणों के लिए जवाबदेह हो, सिर्फ उनकी रिपोर्ट लेने वाला नहीं।

दूसरा, फिर से गिनती हो। आने वाली जनगणना और घरेलू सर्वेक्षण काम करने वाले बच्चों को सीधे दर्ज करें, ताकि प्रगति को 15 साल पुराने आंकड़े से बेहतर किसी चीज़ से नापा जा सके।

तीसरा, हर साल राज्यवार सार्वजनिक रिपोर्ट आए: कितने निरीक्षण हुए, कितने बच्चे छुड़ाए गए, कितने मालिकों पर मुकदमा और जुर्माना हुआ, और छुड़ाए गए कितने बच्चे एक साल बाद स्कूल में थे।

चौथा, वे खामियां बंद हों जिन पर अदालत पहले से सुनवाई कर रही है। मई में एक अलग पीठ ने ऑर्केस्ट्रा, डांस बार, स्पा और सैलून में बच्चों के काम पर पूरी रोक की याचिका पर नोटिस जारी किया था। केंद्र को अपनी सूची कड़ी करने के लिए उस फैसले का इंतज़ार नहीं करना चाहिए।

करघे या ढाबे के काउंटर पर खड़ी बच्ची को ढूंढना मुश्किल नहीं है। राज्य के पास कानून है, अदालत का आदेश है और अब एक प्रकोष्ठ भी। उसे भी वह बच्ची मिल जानी चाहिए।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 2016वह साल जब संसद ने 14 से कम उम्र के बच्चों के हर काम पर रोक लगाई, पारिवारिक काम की छूट के साथ
  • 1.01 करोड़2011 की जनगणना में गिने गए 5 से 14 साल के काम करने वाले बच्चे
  • 2,9912016 से 2021 तक बाल श्रम कानून के तहत दर्ज मामले

मूल दस्तावेज़