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रायहमारा मत

बरसों से बसे शरणार्थियों के लिए नियमों में ढील सही कदम है। पर छूट के आदेश शरणार्थी कानून की जगह नहीं ले सकते

गृह मंत्रालय ने फिर उन विदेशियों की सूची बढ़ाई है जो वैध पासपोर्ट के बिना भारत में रह सकते हैं, सताए गए अल्पसंख्यकों से लेकर श्रीलंकाई तमिलों और तिब्बतियों तक। राहत असली है, पर यह अधिसूचना से मिलती है, धर्म और राष्ट्रीयता के हिसाब से बंटी है, और दशकों से यहां रह रहे लोगों को किसी मंजिल तक नहीं ले जाती।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
तमिलनाडु के वेम्बक्कोट्टई में श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों का शिविर (फ़ाइल फ़ोटो)
तमिलनाडु के वेम्बक्कोट्टई में श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों का शिविर (फ़ाइल फ़ोटो)European Commission DG ECHO / विकिमीडिया

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक मानवीय काम किया है, और चुपचाप किया है। गुरुवार को सामने आई राजपत्र अधिसूचना, आप्रवास और विदेशी (छूट) (संशोधन) आदेश, 2026, उन विदेशियों की सूची बढ़ाती है जो वैध पासपोर्ट या वीजा के बिना भी कानून तोड़े बगैर भारत में रह सकते हैं।

यह सूची 1 सितंबर 2025 के एक आदेश से शुरू हुई थी, जो नए आप्रवास और विदेशी अधिनियम के तहत जारी हुआ था। इस कानून ने औपनिवेशिक दौर के चार कानूनों की जगह ली और बिना वैध कागजात के प्रवेश पर पांच साल तक की कैद और ₹5 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया। उस आदेश ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2024 तक या उससे पहले आए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों और ईसाइयों, 9 जनवरी 2015 तक शरण लेने वाले पंजीकृत श्रीलंकाई तमिलों और तिब्बतियों को छूट दी थी। अब जोड़े गए समूहों में कुछ ऐसे पाकिस्तानी नागरिक हैं जो 2009 तक आए और अपना पासपोर्ट नवीनीकृत नहीं करा सकते, और मलेशियाई या सिंगापुरी पासपोर्ट की मियाद खत्म होने से फंसे भारतीय मूल के लोग।

जिन लोगों की बात है, उनके लिए यह मायने रखता है। तमिलनाडु के किसी शिविर में तीस साल से रह रहे परिवार को इस डर में नहीं जीना चाहिए कि जो दस्तावेज उसके पास कभी था ही नहीं, उसकी कमी से जेल हो सकती है।

भविष्य के बिना राहत

पर देखिए कि यह आदेश क्या नहीं करता। यह सजा हटाता है, कोई दर्जा नहीं देता। सताए गए अल्पसंख्यकों को यहां रहते रहने के लिए अब भी वीजा लेना होगा। श्रीलंकाई तमिलों को शरणार्थी नहीं माना जाता, वे नागरिकता संशोधन कानून की तेज राह से बाहर हैं, और विदेशी ही बने हुए हैं।

गृह मंत्रालय की अपनी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु और ओडिशा के शिविरों में उनकी संख्या 57,000 से ज्यादा है, और लगभग 33,000 तमिलनाडु में शिविरों के बाहर रहते हैं। उनके कई बच्चे भारत में ही पैदा हुए। अक्टूबर 2022 में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने श्रीलंकाई हिंदू तमिलों को “नस्लवाद के शिकार” कहा था और सुझाया था कि नागरिकता कानून का तर्क उन पर भी लागू होना चाहिए। चार साल बाद वे बस मुकदमे से बचे हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

तमिलनाडु में श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी शिविर में परिवार (फ़ाइल फ़ोटो)
तमिलनाडु में श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों का एक शिविर; 9 जनवरी 2015 तक आए पंजीकृत शरणार्थी छूट के दायरे में हैं, पर उनके लिए नागरिकता का कोई रास्ता नहीं।European Commission DG ECHO / Wikimedia

यह आदेश लोगों को धर्म और पासपोर्ट के आधार पर भी छांटता है। बांग्लादेश से आया सताया गया हिंदू पात्र है; म्यांमार से आया रोहिंग्या मुसलमान या पाकिस्तान से आया अहमदी, जिनका उत्पीड़न उतना ही असली है, पात्र नहीं। 2015 के बाद आए श्रीलंकाई तमिल रेखा से बाहर रह जाते हैं। कट-ऑफ तारीखें खुद अधिसूचना से तय होती हैं और उसी तरह खिसकाई या वापस ली जा सकती हैं।

वाजिब आपत्ति

सरकार कुछ हद तक ठीक कहेगी कि भारत 1951 के शरणार्थी समझौते का पक्षकार नहीं है, उसकी सीमाएं लंबी और खुली हैं, और यह तय करने का हक उसे रखना ही चाहिए कि कौन रहे। सुरक्षा जांच अहम है, और आदेश कुछ श्रेणियों में साफ पुलिस रिपोर्ट मांगकर ठीक करता है।

पर इसमें से कोई बात कानून के खिलाफ नहीं जाती। कानून से संसद, न कि कोई राजपत्र अधिसूचना, तय करेगी कि शरणार्थी कौन माना जाए, किस सबूत पर, और राष्ट्रीय सुरक्षा के किन सुरक्षा उपायों के साथ। उसे मनमर्जी से पलटना भी कठिन होगा।

आगे क्या हो

पहला, केंद्र धर्म से परे कसौटियों वाला राष्ट्रीय शरण कानून लाए: उत्पीड़न का ठोस डर, हर मामले की अलग जांच, और अपील की साफ प्रक्रिया।

दूसरा, दशकों से यहां रह रहे श्रीलंकाई तमिलों को दीर्घकालिक वीजा और फिर नागरिक के रूप में देशीकरण का पात्र बनाया जाए, जैसे तिब्बतियों को अपने पहचान पत्र दिए गए हैं। शिविरों में जन्मे बच्चों को माता-पिता की अधर में लटकी स्थिति विरासत में नहीं मिलनी चाहिए।

तीसरा, हर छूट के साथ एक सीधा-सादा दस्तावेज मिले जिसे पुलिस अफसर, बैंक और स्कूल मानें, ताकि कागज पर मिली राहत काउंटर पर भी मिले।

गृह मंत्रालय ने दिखाया है कि वह समझता है कि बरसों से बसे लोग सुरक्षा के हकदार हैं। अब उसे यह सुरक्षा कानून में लिखनी चाहिए, हर उस व्यक्ति के लिए जिसे इसकी जरूरत है।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 57,000+श्रीलंकाई तमिल तमिलनाडु और ओडिशा के शरणार्थी शिविरों में (गृह मंत्रालय वार्षिक रिपोर्ट 2023-24)
  • 31 दिसंबर 2024तीन पड़ोसी देशों के छह सताए गए अल्पसंख्यकों के आगमन की कट-ऑफ
  • 5 साल2025 के कानून के तहत बिना वैध कागजात प्रवेश पर अधिकतम कैद