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रायहमारा मत

तोता, शकुनि और 'विदेशी ताकतें': मतदाता सूची की लड़ाई दोनों पक्षों से बेहतर भाषा की हकदार है

रविवार को इंडिया गठबंधन की रैली और भाजपा के जवाबों में जुमले तो खूब थे, पर ऐसा बहुत कम था जिसे कोई मतदाता परख सके। मतदाता सूची से किसके नाम कटे, यह गंभीर विवाद तानों के नीचे दबता जा रहा है। रैलियों के अगले दौर से पहले दोनों खेमे और चुनाव आयोग बेहतर कर सकते हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा (फ़ाइल फ़ोटो)
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा (फ़ाइल फ़ोटो)Photos: Himanshu Arya Khowal / Wikimedia Commons; Singhchetan 1998 / Wikimedia Commons, CC BY 4.0, CC BY-SA 4.0

रविवार को राहुल गांधी रामलीला मैदान में एक तोता लेकर पहुंचे। इंडिया गठबंधन की रैली में उन्होंने कहा, “राजा की जान तोते में थी, और मोदी जी की जान ज्ञानेश कुमार में है।” मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि वे “चोरी की सरकार” नहीं चलने देंगे। ममता बनर्जी ने “वोट-चोरी यस पापा” का नारा लगवाया और मुख्य चुनाव आयुक्त को भाजपा का आज्ञाकारी बच्चा बताया, तो तेजस्वी यादव ने शकुनि और उसके छल वाले पासों की याद दिलाई।

भाजपा ने उसी अंदाज़ में जवाब दिया। भाषण शुरू होने से पहले ही जे पी नड्डा ने इस जुटान को “देश को अराजकता में धकेलने की सोची-समझी साज़िश” कहा और बताया कि इसका चौथा चरण “विदेशी ताकतों के इशारे पर चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की कोशिश” है। शाम तक संबित पात्रा राहुल गांधी को “अवैध नेता प्रतिपक्ष” और रैली को फ्लॉप शो बता रहे थे, और पार्टी के नेता दिन भर कांग्रेस को 1984 की याद दिलाते रहे।

जुमलों के लिहाज़ से यह लंबा दिन था। पर उन मतदाताओं के लिए यह खराब दिन रहा जो जानना चाहते हैं कि सूची में उनका नाम सुरक्षित है या नहीं।

किस पक्ष की बात में दम है

ताने हटा दें तो दोनों खेमे ऐसी बातें उठाते हैं जिनका जवाब बनता है।

विपक्ष की शिकायत का ढांचा असली है, उसके आकार पर कोई कुछ भी सोचे। उसका कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में 13.2 करोड़ नाम काटे गए। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का नोटिस, जिस पर 193 सांसदों के दस्तखत थे, अप्रैल में बिना सार्वजनिक कारण बताए नामंज़ूर कर दिया गया। जब औपचारिक रास्ता बंद हो, तो विरोध सड़क पर आता है, और सड़क पर नाटक ही चलता है।

भाजपा का सबसे तीखा जवाब उसका सबसे वाजिब जवाब भी था। पात्रा ने कहा कि अगर 2024 का चुनाव चुराया गया, तो यह बात अदालत में कहनी चाहिए, और पूछा कि क्या किसी ने एक भी याचिका दायर की। उन्होंने सही याद दिलाया कि 2024 में ज्ञानेश कुमार सीईसी नहीं थे; उन्होंने 2025 में पद संभाला। राहुल गांधी का यह दावा कि ज्ञानेश कुमार के बिना “न नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते, न अमित शाह गृह मंत्री”, इस तारीख के आगे टिकता नहीं।

दोनों कहां हद पार करते हैं

किसी नामित बूथ पर एक भी गलत तरीके से कटा नाम दिखाए बिना चुनी हुई सरकार को “चोरी की सरकार” और चुनाव आयुक्त को कठपुतली कहना, मतदाताओं से एक बहुत बड़े दावे पर आंख मूंदकर भरोसा करने को कहना है। देश के मुख्य विपक्षी दलों को बिना कोई सबूत दिए किन्हीं अनाम “विदेशी ताकतों” का एजेंट बताना इससे भी बुरा है: यह मतदाता सूची के विवाद को वफ़ादारी का सवाल बना देता है। दोनों में से कोई भी बात पीलीभीत या बंगाल की किसी महिला को यह जानने में मदद नहीं करती कि वह वोट डाल पाएगी या नहीं।

वाजिब आपत्ति

रैलियां सेमिनार नहीं होतीं। सत्ता में हो या विपक्ष में, हर दल भीड़ के सामने रंगीन भाषा बोलता है, और भारतीय राजनीति ने तोते या बाल कविता से कहीं कड़वे शब्द झेले हैं। संयम की मांग कभी-कभी कमज़ोर पक्ष से चुप रहने की मांग जैसी लगती है।

यह बात एक हद तक ठीक है। तीखे शब्द लोकतंत्र का हिस्सा हैं; पर बिना सबूत के गद्दारी और चोरी के आरोप उस भरोसे को घिसते हैं जिस पर चुनाव टिके हैं।

अब क्या होना चाहिए

पहला, विपक्ष अपने शब्दों के साथ सबूत रखे: उन मतदाताओं की नामवार सूची जिनके नाम उसके मुताबिक गलत कटे, बूथवार, आयोग के सामने, और जहां उसे लगता है कि किसी चुनाव पर असर पड़ा, अदालत में।

दूसरा, भाजपा नेता या तो उन “विदेशी ताकतों” को सामने लाएं जिनकी वे बात करते हैं, या यह कहना बंद करें। गुरुवार को करनाल में पदयात्रा करने जा रहे अमित शाह के पास लहजा तय करने का मौका है।

तीसरा, चुनाव आयोग, जो कहता है कि उसने बिना पक्षपात काम किया, एसआईआर में हर नाम कटने की वजह बूथवार सार्वजनिक करे, ताकि दोनों पक्ष एक ही आंकड़ों पर बहस करें।

चौथा, शाह ने पिछले हफ़्ते संसद के जिस विशेष सत्र की पेशकश की थी, वही इस झगड़े की सही जगह है। लाउडस्पीकर वाली रैली का सबसे अच्छा इलाज रिकॉर्ड पर होने वाली बहस है।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 13.2 करोड़मतदाता, जिनके नाम विपक्ष के मुताबिक विशेष गहन पुनरीक्षण में कटे
  • 193सांसद, जिन्होंने सीईसी को हटाने के नोटिस पर दस्तखत किए; अप्रैल में नामंज़ूर
  • 2025वह साल जब ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला