रायहमारा मत
जो जमानत जेल का दरवाज़ा न खोले, वह जमानत नहीं। उत्तर प्रदेश इंतज़ार कर रहे 106 लोगों को रिहा करे और अगले 264 को रोके
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से कहा है कि जमानत पा चुके विचाराधीन कैदियों को रिहा कराने की ज़िम्मेदारी राज्य की है, सभी 75 ज़िलों में। अदालत का आदेश कुछ ही दिनों में जेल के फाटक तक पहुंचे, और जो ज़मानतदार कोई गरीब कैदी जुटा न सके, वह उसके जेल में रहने की वजह कभी न बने।

जमानत का आदेश अदालत का यह फ़ैसला है कि मुकदमा चलने तक किसी व्यक्ति को जेल में रखने की ज़रूरत नहीं। उत्तर प्रदेश में सैकड़ों लोगों के लिए यह फ़ैसला कागज़ पर ही रह गया।
जब राज्य ने अपने 75 में से सिर्फ़ 20 ज़िलों की जांच की, तो उसे 264 ऐसे विचाराधीन कैदी मिले जिन्हें जमानत मिल चुकी थी पर वे सलाखों के पीछे थे, ज़्यादातर इसलिए कि वे ज़मानतदार पेश नहीं कर सके या अदालत की दूसरी शर्तें पूरी नहीं कर सके। राज्य ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) को बताया कि इनमें से 158 अब बाहर आ चुके हैं। बाकी 106 अब भी फ़ैसले के इंतज़ार में हैं। बचे 55 ज़िलों का आंकड़ा अभी किसी को नहीं पता।
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने अब अपने निर्देश पूरे राज्य पर लागू कर दिए हैं और बोझ वहीं डाला है जहां उसे होना चाहिए। पीठ ने कहा, “इन लोगों को हिरासत से रिहा कराना सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी राज्य की है।” उसने निचली अदालतों से ज़रूरत हो तो जमानत की शर्तें बदलने को कहा और यह भी साफ़ किया कि निजी वकील वाला कैदी भी विधिक सहायता का उतना ही हकदार है: “विचाराधीन कैदियों के बीच कोई भेदभाव नहीं हो सकता।”
कागज़ी चूक नहीं
इसे प्रशासनिक देरी कह देना आसान है। मामला इससे गंभीर है। जमानत पा चुके व्यक्ति का जेल में बीता हर दिन ऐसी हिरासत है जिसकी किसी अदालत ने इजाज़त नहीं दी। संविधान का वादा है कि किसी की आज़ादी कानून द्वारा तय प्रक्रिया के बिना नहीं छीनी जाएगी; यहां प्रक्रिया पहले ही हां कह चुकी है।
इसी हफ़्ते एक और तीखा मामला सामने आया। 3 नवंबर को जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने पाया कि बागपत का सद्दाम नाम का व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट से 28 सितंबर को जमानत मिलने के हफ़्तों बाद भी जेल में था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) में उसकी जमानत याचिका 12 बार टली थी। जजों ने इसे “बेहद परेशान करने वाला” बताया और राज्य से पूछा कि उसे मुआवज़ा क्यों न दिया जाए।
अगर देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश हफ़्तों तक अमल में न आए, तो किसी ज़िला कस्बे के मजिस्ट्रेट से जमानत पाए दिहाड़ी मज़दूर की हालत इससे भी खराब होगी।
असली वजह गरीबी है
वाजिब आपत्ति यह है कि ज़मानतदार की शर्त बेवजह नहीं है: इससे अदालत को कुछ भरोसा मिलता है कि आरोपी लौटकर आएगा। यह सही है। पर जो ज़मानतदार कैदी जुटा ही न सके, वह उसकी हाज़िरी पक्की नहीं करता; वह बस जमानत को एक फ़ीस बना देता है जिसे कुछ ही लोग चुका सकते हैं। शर्तें बदलने का अदालत का अपना निर्देश यही मानता है।
पैमाना इसे और ज़रूरी बनाता है। 2024 के अंत में भारत के करीब 73% कैदी विचाराधीन थे, और जेलों में 4.53 लाख की जगह पर 5.11 लाख लोग बंद थे। कानून के नए औज़ार, जैसे अधिकतम सज़ा का एक हिस्सा काट लेने पर रिहाई वाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479, अब भी कम ही इस्तेमाल होते हैं।
राज्य को क्या करना चाहिए
पहला, हर जमानत आदेश के साथ घड़ी चालू हो। अगर व्यक्ति सात दिन में बाहर न आए, तो जेल अधीक्षक वजह लिखित में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण और जमानत देने वाली अदालत को बताए।
दूसरा, विधिक सहायता के वकील हर हफ़्ते हर जेल जाएं, अंदर बंद जमानत पाए कैदियों की सूची लेकर, और अदालत से ज़मानत की रकम कैदी की असली हैसियत तक घटाने या उसकी जगह निजी मुचलका लेने की अर्ज़ी दें।
तीसरा, उत्तर प्रदेश सुप्रीम कोर्ट को दिया जाने वाला ज़िलेवार आंकड़ा सार्वजनिक करे, हर महीने रिहा हुए लोगों की संख्या के साथ, ताकि 20 जनवरी 2027 तक राज्य ने जिस प्रगति का वादा किया है, वह सबको दिखे।
आखिर में, जहां किसी को जमानत के बाद बिना ठोस वजह के रोका गया, वहां मुआवज़ा अपवाद नहीं, नियम हो। जिस राज्य को गैरकानूनी हिरासत की कीमत चुकानी पड़े, वह जल्द ही फ़ाइलें चलाना सीख लेगा।
अदालत ने अपना काम कर दिया है। जेल के दरवाज़े खोलना सरकार का काम है।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 264उत्तर प्रदेश के 20 ज़िलों में जमानत के बावजूद जेल में मिले विचाराधीन कैदी
- 106पर 6 नवंबर 2026 तक फ़ैसला बाकी था
- 12बार एक कैदी की जमानत याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में टली