रायहमारा मत
कागज़ पर सस्ती कैंसर दवाएं आधा काम हैं। सोमवार से कटौती मरीज़ तक पहुंचनी चाहिए
137 कैंसर दवाओं की नई अधिकतम कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी। आदेश सही है, पर सरकार को अब दिखाना होगा कि केमिस्ट और अस्पताल यही कीमत लेते हैं, जो बड़े ब्रांड नहीं बदले उनकी वजह बतानी होगी, और बाकी दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल का जवाब देना होगा।

सोमवार से देश के हर केमिस्ट और अस्पताल को, जो सरकार की सूची की कोई कैंसर दवा बेचता है, कम कीमत लेनी होगी। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 17 अक्टूबर को आदेश दिया कि 137 कैंसर-रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30% तक सीमित रहे। केंद्र को कीमतों में 70% तक गिरावट की उम्मीद है और उसके मुताबिक मरीज़ों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी।
यह अच्छा आदेश है, और दबाव के बाद आया है। अक्टूबर में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि इन दवाओं पर मार्जिन 170% से 700% से ज़्यादा तक था। पहली संशोधित कीमतें दिखाती हैं कि इसका मतलब क्या था: स्तन कैंसर की एक दवा पैल्बोसिक्लिब, 21 कैप्सूल के पैक पर करीब 93% सस्ती होकर ₹40,421 से ₹2,720 पर आ गई।
कीमत की सूची कीमत नहीं होती
सीमा उतनी ही अच्छी है जितनी उस काउंटर पर जांची जाती है। निर्माताओं को राजपत्र अधिसूचना के सात दिन के भीतर नई कीमतें बतानी थीं। अनुपालन की निगरानी राज्यों के औषधि नियंत्रकों को करनी है, और जो कंपनी नियम न माने उससे अधिक वसूली की रकम ब्याज सहित वापस ली जा सकती है।
यह प्रक्रिया बहुत है, पर पर्ची लेकर केमिस्ट के काउंटर पर खड़े मरीज़ को इसमें से कुछ नहीं दिखता। एनपीपीए पहले से संशोधित कीमतों की सूचियां जारी कर रहा है। उसे अब पहले तीन महीने हर हफ्ते यह भी बताना चाहिए कि कितने ब्रांडों ने नई कीमतें बताईं, कितनों ने नहीं, अधिक कीमत की कितनी शिकायतें आईं और कितनी वसूली शुरू हुई। जो आंकड़ा हर हफ्ते आता है, उसका जवाब किसी को देना पड़ता है।
जो ब्रांड नहीं बदले
28 अक्टूबर तक के आंकड़ों वाली ताज़ा सूची में तीन जाने-माने ब्रांड की कीमत में कोई बदलाव नहीं है। कीट्रूडा (पेम्ब्रोलिज़ुमैब) 100 मिलीग्राम के लिए ₹2,16,500 पर है, टैग्रिसो ₹4,16,492 पर और इम्फिंज़ी ₹1,71,324 पर। सरकार ने जब यह कदम घोषित किया, तब तीनों के नाम लिए गए थे। ये महंगी इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड दवाएं हैं, यानी वही जिनका खर्च परिवारों के लिए सबसे भारी पड़ता है।
इसकी कोई जायज़ वजह हो सकती है। हो सकता है कंपनी ने कीमत पहले से सीमा से नीचे रखी हो, या अभी संशोधित कीमत दाखिल करनी हो। पर सूची निर्माताओं के बताने के साथ अद्यतन होती है, और मरीज़ नहीं जान सकता कि कौन-सी वजह लागू है। एनपीपीए को ब्रांड-दर-ब्रांड बताना चाहिए कि कीमत इसलिए नहीं बदली कि वह पहले से सीमा के भीतर है, या इसलिए कि कंपनी ने अभी बताया नहीं।
जायज़ आपत्ति
उद्योग कहेगा कि कम मार्जिन का मतलब कम आपूर्ति हो सकता है, और जिस दवा से कमाई घटे उसे वितरक रखना बंद कर सकते हैं। आदेश इसका अनुमान लगाता है: निर्माताओं को उत्पादन मौजूदा स्तर पर रखना होगा और किसी फॉर्मूलेशन को बंद करने से छह महीने पहले सूचना देनी होगी। घोषणा के बाद बात करने वाले एक दवा विश्लेषक को दवा कंपनियों पर असर बहुत कम रहने की उम्मीद है। अगर ऐसा है तो आपूर्ति का जोखिम छोटा है, और एनपीपीए किसी कमी की खबर आते ही उसे सार्वजनिक कर सकता है।
एक सीमा ऐसी भी है जिसे कोई आदेश नहीं हटा सकता। कम एमआरपी उस अस्पताल बिल को कम नहीं करती जिसमें प्रक्रिया, कमरे और फार्मेसी का अपना शुल्क जुड़ा हो। अस्पतालों को नई कीमतें अपनी वेबसाइट पर दिखानी होंगी। उन्हें इन्हें मद-वार बिल में भी दिखाना चाहिए।
अदालत का सवाल
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 12 अक्टूबर को सही सवाल पूछा: सीमा सिर्फ कैंसर दवाओं पर क्यों रुकती है? उसने एक हृदय स्टेंट का उदाहरण दिया जो करीब ₹5,000 में आपूर्ति होता है और ₹25,000 की एमआरपी पर बिकता है। परिवार को कंगाल करने वाली बीमारी सिर्फ कैंसर नहीं है।
केंद्र को अदालत में तारीखों वाली योजना लेकर लौटना चाहिए, उन बाकी दवाओं और उपकरणों के लिए जिन पर मार्क-अप इतना ऊंचा है, और शुरुआत आवश्यक दवाओं की सूची से होनी चाहिए। 137 दवाओं से उसने दिखा दिया कि तरीका काम करता है। अगला कदम यह दिखाना है कि हर बार अदालत को कहना न पड़े।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 137गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाएं, एनपीपीए के 17 अक्टूबर 2026 के मार्जिन सीमा आदेश में
- 30%एमआरपी के हिस्से के रूप में ट्रेड मार्जिन की सीमा, 9 नवंबर से लागू
- 643एनपीपीए की ताज़ा सूची में संशोधित ब्रांड प्रविष्टियां, 28 अक्टूबर तक के आंकड़ों के साथ