रायहमारा मत
दिल्ली-एनसीआर में महिला सुरक्षा पर केंद्र का जवाब सुघड़ मसौदा नहीं, काम करने वाला मॉडल हो
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वे अपने ही मसौदा हलफनामों से संतुष्ट नहीं हैं, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को 23 नवंबर तक का समय दिया है। जवाब की कसौटी यह है कि कोई और शहर उसे सोमवार सुबह से लागू कर सके।

शुक्रवार को सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली-एनसीआर में महिला सुरक्षा पर केंद्र के मसौदा हलफनामे तैयार हैं, पर वे खुद उनसे संतुष्ट नहीं हैं। अदालत ने बेहतर जवाब के लिए 23 नवंबर तक का समय दिया। तुषार मेहता ने कहा, “हमें ऐसा कुछ चाहिए जो देश के बाकी हिस्सों में दोहराया जा सके।” जस्टिस जेबी पारदीवाला ने उसी लहजे में कहा, “अगर सॉलिसिटर जनरल अपने तैयार किए जवाब से संतुष्ट नहीं हैं, तो पूरी कवायद बेकार होगी।”
दोनों सही हैं, और इस बातचीत ने सरकारी जवाबों के लिए आम तौर पर तय होने वाले मानक से बेहतर कसौटी रखी है। सवाल यह है कि उस कसौटी पर खरा उतरना कैसा दिखता है।
अदालत किस बारे में पूछ रही है
अदालत ने 28 सितंबर को खुद संज्ञान लिया, जब आस्था कुंज के एक पार्क में कथित सामूहिक दुष्कर्म और चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग लड़की से कथित यौन उत्पीड़न की खबरें आईं। उसने कहा कि खराब रोशनी, कमजोर निगरानी और ढीली गश्त के कारण सार्वजनिक जगहें जोखिम भरी नहीं बननी चाहिए। 5 अक्टूबर को उसने दिल्ली पुलिस से बीट गश्त बढ़ाने को कहा और निर्देश दिया कि बस, कैब, टैक्सी और ऑटो-रिक्शा, ऐप से बुक होने वाले भी, केवल पंजीकृत और सत्यापित चालक ही चलाएं।
ये व्यावहारिक चूकें हैं। इनके लिए नया कानून नहीं चाहिए। हर चूक को कोई जिम्मेदार व्यक्ति, तय तारीख तक, ऐसे ढंग से ठीक करे जिसे नागरिक जांच सकें।
जायज आपत्ति
दिल्ली-एनसीआर एक सरकार नहीं है। दिल्ली पुलिस केंद्र को रिपोर्ट करती है, पर स्ट्रीट लाइट, पार्क और बस स्टॉप नगर निकायों, दिल्ली सरकार और हरियाणा व उत्तर प्रदेश की सरकारों के पास हैं। केंद्र का हलफनामा वह वादा नहीं कर सकता जो उसके नियंत्रण में नहीं है, और सब कुछ का वादा करने वाला जवाब बेकार होगा।
इसीलिए आश्वासनों की सूची के बजाय मॉडल की जरूरत है। मॉडल बता सकता है कि हर काम किसका है और जिम्मेदार के चूकने पर क्या होगा।
दोहराने लायक जवाब में क्या हो
पहला, किसकी क्या जवाबदेही है का नक्शा: हर स्ट्रीट लाइट, गश्त बीट, पार्क, बस अड्डे और बस मार्ग के लिए एजेंसी तय हो, ताकि शिकायत का अंत “यह हमारा क्षेत्राधिकार नहीं” पर न हो।
दूसरा, अंधेरे और असुरक्षित स्थानों का प्रकाशित रजिस्टर, वार्ड दर वार्ड, हर प्रविष्टि के आगे मरम्मत की तारीख और काम पूरा होने पर सार्वजनिक निशान। इसमें भीड़ वाले स्टॉप और पार्क भी हों, केवल सड़कें नहीं।
तीसरा, सत्यापित चालकों का रिकॉर्ड, जिसे यात्री सवारी शुरू होने से पहले देख सके, ऐप से बुक और सड़क पर रोकी गई दोनों गाड़ियों के लिए, और बिना सत्यापन चालक रखने वाले प्लेटफॉर्म पर जुर्माना।
चौथा, शिकायतों और आपातकालीन कॉल के लिए प्रतिक्रिया समय का मानक, जिसके आंकड़े हर महीने प्रकाशित हों, ताकि अदालत और जनता देख सकें कि गश्त और मदद समय पर पहुंचती है या नहीं।
पांचवां, चूक पर जवाबदेही की साफ रेखा। जब असुरक्षित बताई गई जगह ठीक नहीं की जाती और वहां कुछ होता है, तो फाइल संभालने वाले अधिकारी का नाम अगली रिपोर्ट में हो।
यह सब उन रातों की कीमत के सामने महंगा नहीं है जिनके कारण अदालत को आना पड़ा। इसे लिखा जा सकता है और वह शहर भी दोहरा सकता है जिसने आस्था कुंज का नाम नहीं सुना।
अदालत आगे क्या कर सकती है
न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू ने जवाब दाखिल होने के बाद एक सप्ताह मांगा है। मामला 2 दिसंबर को सूचीबद्ध है। अदालत उस तारीख पर क्षेत्र की हर एजेंसी से सीधा सवाल पूछ सकती है: 28 सितंबर के बाद क्या ठीक हुआ, और उसका सबूत कहां है। जो जवाब इसका उत्तर दे सके, वह मॉडल है। जो न दे सके, वह बेहतर आवरण वाला मसौदा भर है।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 23 नवंबरकेंद्र के जवाब की नई समय सीमा, 6 नवंबर से बढ़ाई गई (सुप्रीम कोर्ट, 6 नवंबर 2026)
- 5 अक्टूबरबीट गश्त और सत्यापित चालकों पर अदालत के निर्देश की तारीख
- 2 दिसंबरअगली सुनवाई, जब न्याय मित्र के पास जवाब के साथ एक सप्ताह होगा